सच का आईना: जब प्यार से बड़े निकले सच, तब विश्वास ने बचा लिया रिश्ता

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Published By Muskan Dixit
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“क्या तुम्हें कभी डर नहीं लगता, स्नेहा?” सुमित ने मोबाइल स्क्रीन पर उभरते उसके मुस्कराते चेहरे को देखते हुए धीमे स्वर में पूछा। स्नेहा ने हल्की हंसी बिखेरते हुए कहा, “डर तो तब लगता है, जब इंसान अपनों को खोने लगे। अनजान लोगों से क्या डरना? हां, अगर कोई दिल के बहुत करीब आ जाए, तब उसकी चुप्पी भी आंधी जैसी लगती है।” “और अगर वही अपना कोई सच छिपा ले?” स्नेहा कुछ क्षण मौन रही। उसके बाद बोली, “हर सच तलवार नहीं होता, सुमित। कुछ सच ऐसे भी होते हैं, जो वक्त से पहले कह दिए जाएं, तो रिश्तों की कोंपलें मुरझा जाती हैं।” सुमित ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “तो क्या प्रेम का दूसरा नाम विश्वास नहीं है?”

स्नेहा ने मुस्कराकर उत्तर दिया, “विश्वास है... पर विश्वास भी पौधे की तरह होता है। उसे पानी भी चाहिए और धूप भी। केवल एक चीज से वह जीवित नहीं रहता।” तभी स्नेहा को उसके पापा ने आवाज लगा दी, उनके दवाई का समय हो चला था। उसके बाद स्नेहा फोन रख कर चली गई। लगभग आठ महीने पहले दोनों की मुलाकात एक डेटिंग ऐप पर हुई थी। अनगिनत प्रोफाइलों के भीड़ में दोनों को एक-दूसरे का व्यक्तित्व किसी शांत नदी जैसा लगा। सुमित की भाषा में गंभीरता थी, तो स्नेहा के शब्दों में मधुरता। धीरे-धीरे चैट से बातचीत, बातचीत से वीडियो कॉल और फिर घंटों तक चलने वाले संवाद उनकी दिनचर्या बन गए। दोनों ने अपने सपनों की गठरी एक-दूसरे के सामने खोल दी। वे साहित्य, संगीत, यात्राओं और भविष्य के सुनहरे घर की कल्पनाओं में खो जाते। ऐसा लगता था मानो दो समानांतर रेखाएं अचानक मिलना सीख गई हों।

सुमित अक्सर कहता, “तुमसे बातें करके लगता है जैसे बरसों की वीरानी में पहली बारिश उतर आई हो।” स्नेहा मुस्कराकर जवाब देती, “और तुमसे मिलकर विश्वास होता है कि अभी भी दुनिया में संवेदनाएं जिंदा हैं।” धीरे-धीरे दोनों ने विवाह का निर्णय ले लिया। परिवारों को बताने का समय आ गया। तभी नियति ने ऐसा पन्ना पलटा कि दोनों के पैरों तले जमीन खिसक गई। सबसे पहले स्नेहा को पता चला कि सुमित ने अपनी प्रोफाइल में उम्र बत्तीस वर्ष लिखी थी, जबकि वह वास्तव में सैंतीस वर्ष का था। पांच वर्षों का यह अंतर उसके लिए केवल संख्या नहीं, बल्कि विश्वास की दीवार में पड़ी पहली दरार थी। उधर सुमित को भी एक परिचित के माध्यम से पता चला कि कि स्नेहा ने अपने पारिवारिक हालात छिपाए थे। उसने स्वयं को संपन्न और निश्चिंत परिवार की बेटी बताया था, जबकि वास्तविकता यह थी कि उसके पिता कई वर्षों से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे, परिवार भारी कर्ज में डूबा था और घर की अधिकांश जिम्मेदारियाँ उसी के कंधों पर थीं।

सच सामने आते ही दोनों के बीच जैसे शब्दों का अकाल पड़ गया, जो मोबाइल कभी घंटों गुनगुनाता था, अब उसकी स्क्रीन सूनी रहने लगी। आखिरकार एक दिन दोनों मिले। कैफे के कोने में बैठे दोनों के बीच ऐसी खामोशी पसरी थी, जिसमें हजारों प्रश्न दम तोड़ रहे थे। सबसे पहले सुमित ने मौन तोड़ते हुआ कहा, “तुमने मुझसे इतना बड़ा सच क्यों छिपाया, स्नेहा? क्या मैं तुम्हारे दुखों का भागीदार बनने योग्य भी नहीं था?”

स्नेहा की आंखें भीग उठीं, “भागीदार बनने योग्य थे, इसलिए तो डर गई थी। कहीं मेरे घर की परेशानियां सुनकर तुम भी बाकी लोगों की तरह मुंह न मोड़ लो। जब इंसान मुसीबतों के रेगिस्तान में चलता है, तब हर रिश्ता मरीचिका जैसा लगने लगता है।” सुमित ने पीड़ा से कहा, “लेकिन झूठ की नींव पर खड़ा महल कब तक टिकता?” स्नेहा ने सिर झुका लिया और कहा, “हां, मैंने भूल की। मगर तुमने भी तो अपनी उम्र छिपाई। क्या वह सच कम महत्वपूर्ण था?” सुमित कुछ पल तक उसकी ओर देखता रहा और कहा, “मैंने सोचा था कि अगर वास्तविक उम्र बता दूंगा, तो शायद तुम बात ही न करोगी। आजकल लोग इंसान से पहले उसकी प्रोफाइल पढ़ते हैं। मैं हार गया था इस दिखावे की दुनिया से।” स्नेहा ने धीमे स्वर में कहा, “और मैं हार गई थी परिस्थितियों से।” दोनों की आंखों में अपराधबोध था। किसी के पास दूसरे को दोष देने का नैतिक अधिकार शेष नहीं बचा था। उस दिन वे बिना किसी निर्णय के लौट आए।

अगले कुछ दिनों तक दोनों अपने-अपने भीतर झांकते रहे। उन्हें महसूस हुआ कि वे एक-दूसरे से नहीं, बल्कि अपने-अपने भय से हार गए थे। आधुनिक रिश्तों की चमकती दुनिया में सब स्वयं को निर्दोष, सफल और परिपूर्ण दिखाना चाहते हैं। मानो कमजोरी स्वीकार करना हार मान लेना हो। कुछ दिनों बाद सुमित ने स्नेहा को संदेश भेजा, “क्या हम एक बार फिर मिल सकते हैं? इस बार बिना किसी मुखौटे के।” स्नेहा ने केवल एक शब्द लिखा- “हां।”

इस बार मुलाकात किसी आलीशान कैफ़े में नहीं, बल्कि पटना के चिड़ियाघर में हुई। पेड़ों से छनती धूप जैसे उन्हें समझा रही थी कि प्रकृति कभी अपनी कमियां नहीं छिपाती। सूखे पत्ते भी उसी के हैं और नई कोंपलें भी। सुमित ने कहा, “मैंने पिछले कुछ दिनों में बहुत सोचा। गलती हमारी थी, पर उससे भी बड़ी गलती यह होती कि हम केवल एक-दूसरे के झूठ को देखते और उसके पीछे छिपे डर को कभी समझने की कोशिश न करते।”

स्नेहा ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “मैंने भी जाना कि सच देर से बोले जाने पर बोझ बन जाता है। मन में जितनी देर छिपाओ, उतना ही वह आत्मा को कचोटता रहता है।” सुमित ने मुस्कराते हुए कहा,“तो क्या हम फिर से शुरुआत कर सकते हैं? इस बार बिना किसी बनावट के। मेरी उम्र सैंतीस वर्ष है, कुछ असफलताएं हैं, कुछ अधूरे सपने हैं और ढेर सारी कमियां भी। यही मेरा सच है।” स्नेहा की आंखों से आंसू निकलने लगे। उसने कहा, “और मेरा सच यह है कि मेरा परिवार संघर्षों से भरा है। पिता बीमार हैं, कर्ज है, जिम्मेदारियां हैं, लेकिन मेरे पास मेहनत करने का साहस है और प्रेम निभाने का विश्वास भी।”

सुमित ने धीरे से उसका हाथ थामते हुए कहा, “फिर तो हमारे पास सब कुछ है। क्योंकि झूठ केवल भ्रम देता है, जबकि सच रास्ता दिखाता है।” स्नेहा मुस्कराते हुए बोली,“आज पहली बार लग रहा है कि मैं सचमुच तुम्हारे सामने खड़ी हूं। पहले तो केवल एक सजाई हुई तस्वीर थी।” उस दिन दोनों ने कोई बड़ी कसम नहीं खाई। उन्होंने केवल इतना वचन दिया कि अब जीवन में चाहे जितनी कठिनाइयां आएं, वे सच से मुंह नहीं मोड़ेंगे। कुछ महीनों बाद उनका विवाह सादगी से संपन्न हुआ। घर वैभवशाली नहीं था, पर विश्वास से भरा था। सुमित ने स्नेहा के पिता के इलाज की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली, और स्नेहा ने उसके अधूरे सपनों को अपना लक्ष्य बना लिया। जीवन में चुनौतियां कम नहीं थीं। कभी आर्थिक तंगी सामने खड़ी हो जाती, कभी परिस्थितियां धैर्य की परीक्षा लेतीं। किंतु अब उनके बीच कोई झूठ नहीं था। सच की मजबूत डोर ने उनके रिश्ते को ऐसा आधार दिया कि विपत्तियां भी उसे डिगा न सकीं।

एक दिन स्नेहा ने मुस्कराकर पूछा, “अगर उस दिन सच सामने न आता तो?” सुमित ने खिड़की से आती हुई धूप को देखते हुए उत्तर दिया, “तब शायद हम सुंदर भ्रम में जीते रहते, मगर सच्चा प्रेम कभी नहीं पा पाते।” स्नेहा ने कहा, “अब समझ में आया कि रिश्ते पूर्ण लोगों से नहीं, सच्चे लोगों से बनते हैं। पूर्णता तो केवल कल्पना है, लेकिन ईमानदारी जीवन का सबसे सुंदर आभूषण है।” सुमित ने सहमति में सिर हिलाया। उस क्षण दोनों को लगा कि प्रेम किसी निर्दोष चेहरे का नाम नहीं, बल्कि उस साहस का नाम है, जिसमें इंसान अपने सारे दोष, भय, आंसू और अधूरेपन के साथ किसी के सामने खड़ा हो सके। क्योंकि प्रेम तब सबसे अधिक पवित्र होता है, जब वह मुखौटों को नहीं, मनुष्य को स्वीकार करता है। पूर्णता क्षणिक आकर्षण दे सकती है, पर रिश्तों की असली नींव केवल सच, विश्वास और स्वीकार की मिट्टी पर ही टिकती है। यही वह आईना है, जिसमें प्रेम अपना सबसे सुंदर और सबसे सच्चा चेहरा देखता है।

-नृपेन्द्र अभिषेक नृप, अमृत विचार, लोकदर्पण

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