Gas & Acidity Alert: बार-बार गैस और एसिडिटी को न करें नजरअंदाज, जानिए कारण, आयुर्वेदिक उपाय और बचाव के आसान तरीके

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Published By Muskan Dixit
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गलत खान-पान, तनाव और अनियमित दिनचर्या बना रही पाचन तंत्र को कमजोर, आयुर्वेद और स्वस्थ जीवनशैली से मिल सकता है स्थायी समाधान

बरेलीः स्वस्थ शरीर का आधार स्वस्थ पाचन तंत्र है। यदि हमारा पाचन तंत्र सही प्रकार से कार्य करता है, तो शरीर को पर्याप्त ऊर्जा, पोषण और रोगों से लड़ने की क्षमता प्राप्त होती है। किंतु वर्तमान समय में बदलती जीवनशैली, असंतुलित भोजन, मानसिक तनाव, अनियमित दिनचर्या तथा फास्ट फूड के बढ़ते चलन के कारण पाचन संबंधी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। इनमें पेट में गैस, एसिडिटी, अपच, कब्ज तथा पेट फूलने की समस्या सबसे सामान्य है। आज लगभग प्रत्येक आयु वर्ग का व्यक्ति किसी न किसी समय इन समस्याओं का सामना करता है। कई लोग इसे सामान्य मानकर बार-बार एंटासिड दवाओं का सेवन कर लेते हैं, जबकि यह केवल अस्थायी राहत देती है। यदि बार-बार गैस और एसिडिटी होती रहे, तो यह पेट के अल्सर, गैस्ट्रो-इसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज (GERD), गैस्ट्राइटिस तथा अन्य गंभीर रोगों का संकेत भी हो सकता है।

आयुर्वेद में कहा गया है कि सभी रोगों की उत्पत्ति का मूल कारण जठराग्नि का असंतुलन है। जब भोजन उचित प्रकार से नहीं पचता, तब शरीर में “आंव” नामक विषैले तत्व का निर्माण होता है, जो अनेक रोगों की जड़ माना गया है। इसलिए आयुर्वेद केवल रोग का उपचार नहीं करता, बल्कि पाचन शक्ति को मजबूत बनाकर रोग के मूल कारण को समाप्त करने का प्रयास करता है।

गैस और एसिडिटी क्या है

गैस और एसिडिटी दो अलग-अलग समस्याएं हैं, लेकिन अक्सर दोनों एक साथ दिखाई देती हैं। गैस तब बनती है, जब भोजन का पाचन पूर्ण रूप से नहीं हो पाता और आंतों में गैस का अत्यधिक निर्माण होने लगता है। इसके कारण पेट फूलना, डकार आना, पेट में दर्द तथा भारीपन महसूस होता है। दूसरी ओर एसिडिटी वह स्थिति है, जिसमें पेट में बनने वाला हाइड्रोक्लोरिक अम्ल आवश्यकता से अधिक मात्रा में बनने लगता है या भोजन नली में ऊपर की ओर आने लगता है। इससे सीने में जलन, खट्टी डकारें, गले में जलन और मुंह में खट्टापन महसूस होता है। आयुर्वेद में इस रोग को मुख्य रूप से अम्लपित्त कहा गया है। जब पित्त दोष बढ़ जाता है तथा जठराग्नि विकृत हो जाती है, तब अम्लपित्त उत्पन्न होता है। यदि इसके कारणों पर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह रोग धीरे-धीरे गंभीर रूप धारण कर सकता है।

सबसे बड़ा कारण गलत खान-पान 

आज अधिकांश लोग स्वाद के लिए भोजन करते हैं, स्वास्थ्य के लिए नहीं। अधिक तेल, मसाले, मिर्च, तला भोजन, फास्ट फूड, प्रोसेस्ड फूड, पैकेट बंद स्नैक्स, बेकरी उत्पाद तथा अत्यधिक मिठाइयों का सेवन पेट में अम्ल के निर्माण को बढ़ाता है। इन खाद्य पदार्थों को पचाने में अधिक समय लगता है, जिससे भोजन पेट में अधिक देर तक रहता है और गैस बनने लगती है। इसके अतिरिक्त अत्यधिक मसाले पेट की अंदरूनी परत को भी प्रभावित करते हैं, जिससे जलन और एसिडिटी की समस्या उत्पन्न होती है।

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अनियमित भोजन और गलत दिनचर्या

व्यस्त जीवनशैली के कारण कई लोग नाश्ता छोड़ देते हैं, दोपहर का भोजन देर से करते हैं या रात में बहुत देर से खाना खाते हैं। लंबे समय तक भूखे रहने पर पेट में बनने वाला अम्ल भोजन के अभाव में पेट की अंदरूनी सतह को प्रभावित करने लगता है। वहीं देर रात भारी भोजन करने पर पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है और गैस तथा एसिडिटी की संभावना बढ़ जाती है। बार-बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में अस्वास्थ्यकर स्नैक्स खाना भी पाचन तंत्र पर अतिरिक्त भार डालता है।

चाय, कॉफी और कैफीन का  अधिक सेवन

कई लोग दिन की शुरुआत चाय से करते हैं और पूरे दिन में चार से छह कप चाय या कॉफी पी लेते हैं। कैफीन पेट में अम्ल स्राव को बढ़ाता है, जिससे एसिडिटी होने की संभावना बढ़ जाती है। खाली पेट चाय या कॉफी पीना विशेष रूप से हानिकारक माना जाता है, क्योंकि इससे पेट की श्लेष्मा परत प्रभावित होती है। इसी प्रकार तथाकथित एनर्जी ड्रिंक कोल्ड ड्रिंक और कार्बोनेटेड पेय भी गैस बनने की समस्या को बढ़ाते हैं।

धूम्रपान और शराब का प्रभाव

धूम्रपान तथा शराब दोनों ही पाचन तंत्र के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। निकोटिन भोजन नली और पेट के बीच स्थित वाल्व को कमजोर कर देता है, जिससे पेट का अम्ल ऊपर आने लगता है। वहीं शराब पेट की अंदरूनी परत में सूजन उत्पन्न करती है तथा अम्ल के निर्माण को बढ़ाती है। लंबे समय तक इनका सेवन गैस्ट्राइटिस, अल्सर तथा लीवर संबंधी रोगों का कारण भी बन सकता है।

मानसिक तनाव और पाचन

वर्तमान समय में तनाव, चिंता और अवसाद केवल मानसिक समस्याएं नहीं रह गई हैं, बल्कि ये पाचन तंत्र को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। जब व्यक्ति तनाव में होता है, तब शरीर में कोर्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे हार्मोन अधिक मात्रा में बनने लगते हैं। ये हार्मोन पाचन क्रिया को अत्यधिक प्रभावित करते हैं, जिससे भोजन ठीक प्रकार से नहीं पचता। परिणामस्वरूप गैस, एसिडिटी, कब्ज और पेट दर्द जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध पाचन स्वास्थ्य से माना जाता है। 

कम पानी पीना और फाइबर की कमी

शरीर में पर्याप्त पानी न होने पर पाचन क्रिया धीमी हो जाती है। भोजन अच्छी तरह नहीं पचता और कब्ज की समस्या उत्पन्न होने लगती है। कब्ज स्वयं गैस बनने का प्रमुख कारण है। इसी प्रकार यदि भोजन में फल, हरी सब्जियां, सलाद, अंकुरित अनाज तथा साबुत अनाज कम हों, तो शरीर को पर्याप्त फाइबर नहीं मिल पाता। फाइबर आंतों की गति को सामान्य बनाए रखता है और पाचन को बेहतर बनाता है।

गैस और एसिडिटी के प्रमुख लक्षण

गैस और एसिडिटी के लक्षण व्यक्ति-व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। सामान्यतः सीने में जलन, खट्टी डकारें, पेट फूलना, पेट दर्द, भारीपन, भूख कम लगना, मुंह का स्वाद खराब होना, गले में जलन, बार-बार डकार आना, कब्ज तथा कभी-कभी मतली की शिकायत होती है। यदि यह समस्या लंबे समय तक बनी रहे या इसके साथ वजन कम होना, खून की उल्टी, काला मल या भोजन निगलने में कठिनाई हो, तो इसे गंभीर संकेत मानकर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

आयुर्वेद के अनुसार गैस और एसिडिटी मुख्यतः पित्त एवं वात दोष के असंतुलन का परिणाम हैं। जब व्यक्ति विरुद्ध आहार, अत्यधिक तीखा भोजन, अनियमित भोजन, देर रात जागना, क्रोध, चिंता तथा तनाव जैसी आदतों का पालन करता है, तब जठराग्नि विकृत हो जाती है। इससे भोजन पूरी तरह नहीं पचता और “आंव” का निर्माण होता है। यही आंव धीरे-धीरे अनेक रोगों का कारण बनता है। आयुर्वेद उपचार में केवल औषधियों पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि आहार-विहार, दिनचर्या, योग तथा मानसिक संतुलन को भी समान महत्व देता है।

आयुर्वेदिक घरेलू उपाय

सौंफ, अजवाइन, जीरा, धनिया, आंवला, नारियल पानी और छाछ जैसे प्राकृतिक पदार्थ पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में अत्यंत उपयोगी माने जाते हैं। भोजन के बाद सौंफ चबाने से पाचन सुधरता है। अजवाइन और काला नमक गैस कम करने में सहायक हैं। जीरे का पानी पाचन शक्ति बढ़ाता है। आंवला पित्त को शांत करता है, जबकि छाछ आंतों के लिए लाभकारी जीवाणुओं की वृद्धि में सहायक होती है। हालांकि यदि समस्या बार-बार हो रही हो, तो केवल घरेलू उपचारों पर निर्भर रहने के बजाय योग्य आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श लेना आवश्यक है।

योग और प्राणायाम की भूमिका

योग केवल शरीर को लचीला बनाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह पाचन तंत्र को भी मजबूत बनाता है। वज्रासन भोजन के बाद किया जाने वाला सबसे प्रभावी आसन माना जाता है। इसके अतिरिक्त पवनमुक्तासन, मंडूकासन, भुजंगासन, मकरासन तथा अनुलोम-विलोम, भ्रामरी और कपालभाति (विशेषज्ञ की देखरेख में) पाचन शक्ति को बढ़ाने तथा गैस और एसिडिटी को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं।

भोजन के तुरंत बाद लेटने की आदत

बहुत से लोग भोजन करते ही आराम करने या सोने चले जाते हैं। इससे भोजन का पाचन धीमा हो जाता है और पेट का अम्ल ऊपर भोजन नली में आने लगता है। यही कारण है कि भोजन के बाद सीने में जलन और खट्टी डकारें आती हैं। विशेषज्ञ भोजन के कम से कम दो से तीन घंटे बाद सोने की सलाह देते हैं।

कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव

दर्द निवारक दवाएं, कुछ एंटीबायोटिक्स, आयरन की गोलियां, स्टेरॉयड तथा अन्य कुछ औषधियां पेट की अंदरूनी परत को प्रभावित कर सकती हैं। यदि इनका लंबे समय तक सेवन किया जाए, तो एसिडिटी, गैस्ट्राइटिस तथा अल्सर होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए चिकित्सकीय सलाह के बिना लंबे समय तक ऐसी दवाओं का सेवन नहीं करना चाहिए। ज्यादा दिनों तक प्रयुक्त होने पर एसिडिटी की सभी दवाएं वास्तव में एसिडिटी बढ़ाने लगती हैं और शरीर भी एसिड से लड़ने की प्राकृतिक ताकत को खत्म कर देती हैं।

बचाव ही सबसे अच्छा उपचार

गैस और एसिडिटी से बचने के लिए नियमित दिनचर्या अपनाना अत्यंत आवश्यक है। समय पर भोजन करना, भोजन को अच्छी तरह चबाना, पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, नियमित व्यायाम करना, तनाव कम करना, धूम्रपान और शराब से दूरी बनाना तथा पर्याप्त नींद लेना ऐसी आदतें हैं जो पाचन तंत्र को लंबे समय तक स्वस्थ बनाए रखती हैं। भोजन के तुरंत बाद लेटने के बजाय कुछ देर टहलना भी अत्यंत लाभकारी होता है। पेट में गैस और एसिडिटी आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी सबसे सामान्य समस्याओं में से हैं, लेकिन इन्हें सामान्य समझकर अनदेखा करना उचित नहीं है। यह शरीर का संकेत है कि हमारी भोजन शैली, दिनचर्या या मानसिक स्थिति में सुधार की आवश्यकता है। यदि समय रहते उचित आहार-विहार, नियमित योग, तनाव प्रबंधन तथा आयुर्वेद के सिद्धांतों को अपनाया जाए तो इन समस्याओं से काफी हद तक बचा जा सकता है। स्वस्थ पाचन ही स्वस्थ जीवन की पहचान है, इसलिए दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय अपनी जीवनशैली को संतुलित बनाना ही सबसे प्रभावी और स्थायी समाधान है।

रोहिलखंड आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, बरेली की भूमिका, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने और आयुर्वेद को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से निरंतर कार्य कर रहा है। रोगों का स्थायी समाधान केवल औषधियों तक सीमित नहीं है, संतुलित आहार, स्वस्थ जीवनशैली, नियमित योग एवं आयुर्वेदिक दिनचर्या अपनाने से ही संभव है। इसी उद्देश्य से संस्थान समय-समय पर स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम, निःशुल्क चिकित्सा एवं परामर्श शिविर, योग एवं जीवनशैली संबंधी कार्यशालाओं तथा जनहित व्याख्यानों का आयोजन करता है, जहां आमजन को पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने के वैज्ञानिक एवं आयुर्वेदिक उपायों की जानकारी दी जाती है।

संस्थान के कायचिकित्सा, पंचकर्म, योग चिकित्सा तथा अन्य आयुर्वेदिक विभागों में अनुभवी चिकित्सकों द्वारा रोगियों की प्रकृति, दोषों की अवस्था एवं रोग की गंभीरता का सम्यक मूल्यांकन कर व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार की जाती है। आवश्यकता अनुसार आयुर्वेदिक औषधियों, पंचकर्म चिकित्सा, आहार-विहार परामर्श तथा योगाभ्यास के माध्यम से रोग के मूल कारण को दूर करने का प्रयास किया जाता है। लक्ष्य केवल रोगों का उपचार करना नहीं, बल्कि “स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकार प्रशमनम्” के आयुर्वेदिक सिद्धांत को व्यवहार में लाकर समाज को स्वस्थ एवं रोगमुक्त बनाने में सक्रिय योगदान देना है। 

  • रोहिलखंड आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं चिकित्सालय, सेक्टर-7, रामगंगा नगर योजना, डोहरा रोड, बरेली, उत्तर प्रदेश +91 8077808309

-अमृत विचार, लोकदर्पण

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