संपादकीय : टैरिफ की राजनीति

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Edited By Pradeep Kumar
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रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अधिकतम 100 प्रतिशत तक टैरिफ

संपादकीय: रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका के 100% टैरिफ बिल का भारत के व्यापार, रक्षा और विदेश नीति पर क्या असर होगा? पढ़ें सटीक विश्लेषण।

रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अधिकतम 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का संशोधित अमेरिकी विधेयक व्यापार का कम भू-राजनीति का औजार ज्यादा है। यह अभी विचाराधीन है पर इसके पारित होने की अधिक आशंका भारत के लिए चिंतनीय है। कम ही संभावना है कि प्रतिनिधि सभा की प्रक्रिया, राष्ट्रपति के विवेकाधिकार और व्यावहारिक कठिनाइयों के चलते इसको बदला जाए। जहां पूर्व प्रस्तावित 500 फीसद का टैरिफ अव्यावहारिक था, वहीं अधिकतम 100 प्रतिशत का टैरिफ भी कठोर और बस दबाव बाने के काम का है। वास्तव में विधेयक का उद्देश्य राजस्व जुटाना नहीं, भारत, चीन जैसे तेल खरीदारों को रूस से ऊर्जा आयात घटाने पर मजबूर करना है। 

100 प्रतिशत टैरिफ लागू हुआ, तो भारत का अमेरिका को निर्यात बुरी तरह प्रभावित होगा। विशेष रूप से फार्मा, वस्त्र, रत्न एवं आभूषण, इंजीनियरिंग सामान और रसायन जैसे क्षेत्रों की हमारी प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर पड़ेगी। भारत पर टैरिफ की धमकी, व्यापार वार्ता में दबाव बनाने और अमेरिकी शर्तों पर समझौता कराने की व्यापक रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है। भारत ने रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदकर अरबों डॉलर की बचत की है, लेकिन भविष्य में अमेरिकी टैरिफ लागू हुए तो निर्यात हानि, ऊंचे व्यापार लागत और आपूर्ति शृंखला व्यवधान के चलते बचत का दस गुना नुकसान संभव है। रक्षा क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहेगा, क्योंकि भारत की सैन्य प्रणालियों का महत्वपूर्ण हिस्सा अभी भी रूसी मूल का है। यदि रूस से रक्षा उपकरणों और पुर्जों के लेन-देन पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगते हैं, तो रखरखाव और आधुनिकीकरण की लागत बढ़ सकती है। अमेरिका ने अपने कथित मित्र और घोषित शत्रु, भारत और चीन को एक ही श्रेणी में इसलिए रखा है, क्योंकि दोनों रूस के सबसे बड़े तेल खरीदारों में हैं। वह खरीदार देशों पर द्वितीयक आर्थिक दबाव बनाना चाहता है, लेकिन कुछ यूरोपीय देशों के लिए छूट का प्रावधान इस बहाने से रखा गया है कि वे रूस पर अपनी ऊर्जा निर्भरता कम करने की दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं। यह यूरोपीय सहयोगियों के साथ टकराव सीमित रखने के लिए शुद्ध कूटनीतिक उपक्रम है, समान मानदंड नहीं। भारत को यह भी समझना होगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही व्यक्तिगत स्तर पर प्रधानमंत्री से दोस्ताना जताएं, पर जब बात व्यापार या विदेश नीति की आती है, तो वे भारत को उस नजरिए से नहीं देखते। ट्रंप कभी भारत को पाकिस्तान के समकक्ष रख देते हैं, तो कभी चीन के खाने में।

यदि यह टैरिफ वास्तव में लागू होता है, तो उसका अंतिम बोझ केवल निर्यातकों पर नहीं, बल्कि आम नागरिकों पर भी पड़ेगा— रोजगार, निवेश, विनिर्माण और आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में भारत की प्रतिक्रिया न तो टकरावपूर्ण होनी चाहिए और न ही दबाव के आगे झुकने वाली। भारत को स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी ऊर्जा और रक्षा खरीद उसके राष्ट्रीय हितों पर आधारित है, किसी तीसरे देश के विरुद्ध नहीं। साथ ही अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की वार्ता जारी रखते हुए निर्यात बाजारों का विविधीकरण, ऊर्जा स्रोतों का विस्तार और रक्षा आयात का स्वदेशीकरण तेज करना होगा।