संपादकीय : भारत पर युद्धभार
भारत पर युद्धभार: मिडिल ईस्ट क्राइसिस के बीच भारतीय हितों और नाविकों की रक्षा
पश्चिम एशिया में ईरान-अमेरिका टकराव से भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और नागरिकों पर गहरा असर पड़ रहा है। पढ़ें सटीक विश्लेषण।
भारत के लिए पश्चिम एशिया में ईरान–अमेरिका के सैन्य टकराव की कीमत बढ़ती ही जा रही है। इसका सीधा प्रभाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार, उर्वरक आपूर्ति, निर्यात, समुद्री कर्मियों की सुरक्षा और विदेश नीति पर दिखाई दे रहा है। भारत द्वारा ईरान के समक्ष होर्मुज क्षेत्र में जहाजों पर हमले रोकने का कड़ा विरोध इसी बढ़ते संकट का संकेत है। यह कूटनीतिक रूप से आवश्यक था, किंतु यथार्थ यह है कि युद्ध के बीच केवल विरोध दर्ज कराने से मिसाइलें और ड्रोन नहीं रुकते। यदि किसी अमेरिकी कार्रवाई से भारतीय जहाज या नागरिक प्रभावित होते हैं, तो भारत को उसी स्पष्टता और दृढ़ता के साथ अपना विरोध युद्ध में शामिल अमेरिका के समक्ष भी दर्ज कराना होगा।
भारत की विदेश नीति का आधार किसी पक्ष का समर्थन नहीं, बल्कि अपने नागरिकों और राष्ट्रीय हितों की रक्षा होना चाहिए। 28 फरवरी के बाद खाड़ी क्षेत्र में भारतीय नागरिकों की मौत, लापता होने और घायल होने की घटनाएं बताती हैं कि संकट अब गहरा रहा है। ऐसे में सरकार द्वारा प्रत्येक भारतीय नाविक की 24 घंटे निगरानी, परिवारों के लिए नोडल अधिकारियों की नियुक्ति तथा विदेश मंत्रालय, नौसेना, महानिदेशक नौवहन, पेट्रोलियम मंत्रालय और भारतीय दूतावासों के बीच समन्वित तंत्र बनाना स्वागतयोग्य कदम है। इससे संकट की स्थिति में त्वरित संपर्क, सूचना साझा करने और बचाव की गति बढ़ेगी, हालांकि यह व्यवस्था हमलों को रोक नहीं सकती; यह केवल उनके दुष्परिणामों को सीमित कर सकती है। भारत पहले भी संकल्प, राहत, गंगा, कावेरी और सिंधु जैसे अभियानों के माध्यम से अपने नागरिकों की सुरक्षित निकासी की क्षमता प्रदर्शित कर चुका है, किंतु यदि युद्ध क्षेत्र में सक्रिय रूप से अमेरिकी, ईरानी और संभवतः इजरायली सेनाएं आमने-सामने हों, तो भारतीय नौसेना की भूमिका मुख्यतः एस्कॉर्ट, निगरानी, मानवीय सहायता और सुरक्षित निकासी तक सीमित रहेगी। किसी सैन्य संघर्ष में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भारत की घोषित नीति नहीं है। समुद्री कर्मियों की जान के साथ ही आर्थिक कीमत भी चुकानी पड़ रही है। संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत और बहरीन जैसे खाड़ी देशों को भारत का लगभग 93 हजार करोड़ रुपये का निर्यात, होर्मुज मार्ग से होने वाला ऊर्जा आयात तथा उर्वरक कच्चे माल की निर्भरता दांव पर लगी है। भारत लगभग 43 प्रतिशत यूरिया, 44 प्रतिशत सल्फर और 25 प्रतिशत अमोनिया इसी समुद्री मार्ग से प्राप्त करता है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो खरीफ सीजन में उर्वरक आपूर्ति प्रभावित होगी। लंबा व्यवधान कीमतों और उपलब्धता दोनों पर दबाव बढ़ाएगा। भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता स्पष्ट है— अपने नागरिकों की सुरक्षा, ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति का विविधीकरण, रणनीतिक तेल भंडार का विस्तार, वैकल्पिक समुद्री मार्गों की तैयारी तथा सभी पक्षों से समान दूरी रखते हुए शांति की कूटनीति।
युद्ध में सबसे महंगी कीमत वही देश चुकाते हैं, जो युद्ध नहीं लड़ रहे होते, लेकिन जिनकी अर्थव्यवस्था और नागरिक उसकी चपेट में आ जाते हैं। भारत को इस चुनौती का सामना दूरदृष्टि, संयम और निर्णायक तैयारी के साथ करना होगा। सुरक्षित और स्वतंत्र नौवहन के लिए संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन, जी-20 तथा प्रमुख समुद्री शक्तियों को भी शीघ्र सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
