ईरान-यूएस संघर्ष भारत के लिए चुनौती में भी अवसर
ईरान और यूएस के बीच युद्ध का अंजाम क्या होगा और भारत को इसके साइड इफेक्ट से निपटने के लिए कैसे तैयार रहना चाहिए, इस पर गंभीरता से विचार नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
ईरान और यूएस के बीच युद्ध अब बेहद खतरनाक मोड़ की तरफ मुड़ चुका है। वैश्विक तौर पर इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता, हालांकि भारत आज के समय में इतना सक्षम हो चुका है कि वह हर वैश्विक चुनौती का सफलतापूर्वक सामना कर सकता है, लेकिन फिर भी इस युद्ध का अंजाम क्या होगा और भारत को इसके साइड इफेक्ट से निपटने के लिए कैसे तैयार रहना चाहिए, इस पर गंभीरता से विचार नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने की जरूरत है। ठीक उसी तरह, जैसे कोरोना महामारी के दौरान भारत ने देश ही नहीं, बल्कि दुनिया को कोविड संकट से उबारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
ईरान-यूएस युद्ध का सबसे संभावित अंजाम लंबा, महंगा और अनिश्चित तनाव है। यह फुल वॉर नहीं, लेकिन शांति भी नहीं है। भारत के लिए ये संकट भी है और अवसर भी। संकट की बात करें तो यह सबसे ज्यादा महंगाई और तेल का है और अवसर पर चर्चा करें तो दुनिया को दिखाने का, कि भारत सिर्फ प्रभावित होने वाला देश नहीं, समाधान देने वाला देश भी है। बड़ा बाजार, डायवर्स सप्लाई चेन और न्यूट्रल कूटनीति हमारी ताकत है। अगर हम ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और डिप्लोमेसी- इन तीनों मोर्चों पर पहले से तैयारी रखेंगे तो इस वैश्विक तूफान को भी अवसर में बदल सकते हैं।
कथित तौर पर ईरानी हिटलिस्ट मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आने के बाद अंदाजा लगाया जा सकता है कि अभी यह तनाव कम होने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। यह युद्ध ठीक उस बीमारी की तरह होता जा रहा है, जिसका जितना उपचार हो रहा है, उतना ही वह नए वेरिएंट में जन्म ले रहा है। फरवरी 2026 से चल रहा यह संघर्ष अब शेडो वॉर यानी ‘छाया युद्ध’ से निकलकर सीधे होर्मुज स्ट्रेट की लड़ाई बन चुका है। इसे वैश्विक तौर पर अनदेखा करना संभव ही नहीं है, क्योंकि दुनिया की अर्थव्यवस्था की नब्ज इसी रास्ते से गुजरती है।
ईरान और पश्चिमी देशों के बीच युद्ध अब कूटनीतिक मैदान और बंदूक-गोले से ज्यादा ड्रोन, मिसाइल और शिपिंग ब्लॉकेड बेस पर चल रहे हैं। यूएस ने खुद को ‘होर्मुज का गार्जियन’ घोषित कर हर कार्गो पर 20 प्रतिशत फीस लगाने की बात कही तो ईरान ने पलटकर कहा कि हम ही इसके असली गार्जियन हैं। इसके बाद यूएस ने ईरान में सबमरीन बेस पर ड्रोन हमले किए। जवाब में ईरान ने भी बहरीन, कुवैत, ओमान और जॉर्डन में यूएस ठिकानों को निशाना बनाया। यह ऐसे समय पर हुआ, जब इन दोनों देशों के बीच पूरी दुनिया के सामने युद्ध विराम पर सहमति के दावे किए जा रहे थे।
अब अगर सारा खेल 'तेल पर कब्जे की कूटनीति' कहें तो गलत नहीं होगा, क्योंकि इन हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड पांच प्रतिशत उछला और बीती 10-12 जुलाई को होर्मुज से जहाजों की आवाजाही 52 प्रतिशत तक गिर गई। इसी के साथ पिछले महीने दोनों देशों के बीच हुई ‘अंतरिम डील’ टूट गई। फिर बयानों के जहर बुझे तीर चले। एक तरफ से कहा गया कि डील हमेशा तोड़ते हैं तो दूसरी तरफ से जवाब आया कि एकतरफा डील का जमाना खत्म।
अब सवाल यही है कि आखिर ऐसा कब तक चलता रहेगा, क्योंकि इन दोनों देशों की नूरा कुश्ती में भारत पर गहरा आर्थिक प्रभाव पड़ रहा है। यह अभी तक माना जा रहा है कि सीमित संघर्ष जारी रहेगा। ड्रोन-मिसाइल हमले इसी तरह से चलते रहेंगे, लेकिन फुल वॉर नहीं। होर्मुज भी आंशिक रूप से खुला रहेगा। यानी अभी 6-12 महीने तक तनाव जारी रह सकता है। हां, अगर बड़ा क्षेत्रीय युद्ध यानी अगर कोई बड़ा हमला हुआ तो इज़राइल, सऊदी, हूती सब कूदेंगे और होर्मुज पूरी तरह बंद हो जाएगा, हालांकि फुल वॉर की संभावना कम है, क्योंकि इतना भारी तनाव होने के बावजूद भी कूटनीति इस स्तर पर है कि यूएस और ईरान दोनों ही सीधे बड़ी जंग नहीं चाहते, लेकिन यह लंबी खिंचने वाली, महंगाई बढ़ाने वाली जंग की यह स्थिति सबसे खतरनाक साबित हो रही है।
इस छाया युद्ध के भारत के लिए कुछ बड़े साइड इफेक्ट हैं। पहला झटका ऊर्जा का है। भारत का 40 प्रतिशत से ज्यादा तेल होर्मुज से आता है। अगर रास्ता महंगा या बंद हुआ तो पेट्रोल और महंगाई दोनों बढ़ेंगे। ट्रांसपोर्ट महंगा हुआ तो सब कुछ महंगा हो जाएगा। देश के लिए यह बड़ा संकट होगा तो बड़ी जंग फैलने पर प्रवासी भारतीयों के लिए भी मुसीबत बढ़ेगी। सबसे बड़ा संकट तो गल्फ कंट्री में रहे रहे 80 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीयों के सामने आ सकता है। यही नहीं, भारत का ट्रेड कॉरिडोर भी प्रभावित हो सकता है।
यहां डराना मकसद नहीं है। हम देश-दुनिया के हर संकट का सामना करने में सक्षम हैं, बस हमें ‘प्रोएक्टिव’ यानी, हर संभावित समस्याओं की पहचान करने और उन्हें रोकने के लिए हर स्तर पर सक्रिय रहने की जरूरत है। हमें ऊर्जा सुरक्षा की तरफ निरंतर ध्यान देना होगा। तेल भले ही अभी सस्ता नहीं है, लेकिन कम से कम तीन महीने का रिजर्व टॉप-अप करना जरूरी होगा। ईरान पर निर्भरता घटाते हुए, दूसरे देशों से ज्यादा खरीद पर ध्यान देना होगा। हमें सोलर और ग्रीन हाइड्रोजन सिस्टम को फास्ट ट्रैक पर लाना होगा, तो आर्थिक ढाल को मजबूत करने के लिए महंगाई को कंट्रोल में रखना होगा। डॉलर के झटके से बचने के लिए एक्सपोर्ट बूस्ट पर ध्यान देना होगा।
इन सबसे अलग एक महत्वपूर्ण पक्ष अभी बाकी है। भारत कूटनीतिक स्तर पर इतना मजबूत है कि किसी भी वैश्विक संकट में ‘न्यूट्रल मध्यस्थ’ की भूमिका निभा सकता है, लेकिन हमें घरेलू मोर्चे पर ज्यादा जूझना होगा। घरेलू मोर्चा वाले इस संकट का वर्क फ्रॉम होम, वाहनों के सीमित प्रयोग, खर्चा कम से कम करने की आदत बढ़ाने जैसे हथियारों से मुकाबला तो किया जा सकता है, लेकिन हमें देश के अंदर ही साइबर युद्ध से निपटने की चुनौती को भी ध्यान में रखना होगा।
