दोष सिद्धि और विधायिकी : जनप्रतिनिधित्व का सियासी सच

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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जब कानून के बनाने वाले ही दोषी साबित होते हैं, तो संकट लोकतांत्रिक शुचिता का होता है। राजनीति के शुद्धिकरण का स्थायी समाधान अदालतों में नहीं, दलों की नैतिक इच्छाशक्ति में है।

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डॉ. कैलाश चंद सैनी, लेखक

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो लोग कानून बनाते हैं, वही कई बार कानून तोड़ने के अपराध में न्यायपालिका के कठघरे में खड़े दिखाई देते हैं। ऐसे क्षण केवल किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत विफलता नहीं होते, बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था के चरित्र पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। हाल ही में चार जुलाई, 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत का एक ऐसा ही फैसला बिहार की राजनीति में हलचल का कारण बना।

अदालत ने साहेबगंज सीट से भाजपा विधायक राजू कुमार सिंह को वर्ष 2018 के नववर्ष समारोह में हुई हर्ष फायरिंग के दौरान एक महिला चिकित्सक की मृत्यु के मामले में दोषी मानते हुए चार वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। यह फैसला केवल एक आपराधिक मुकदमे का निर्णय भर नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और सार्वजनिक आचरण पर न्यायपालिका की एक सख्त टिप्पणी भी है।

इस सजा के साथ ही लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(3) स्वतः सक्रिय हो जाती है। यह प्रावधान स्पष्ट करता है कि यदि किसी सांसद या विधायक को न्यायालय द्वारा दो वर्ष या उससे अधिक की सजा सुनाई जाती है, तो उसकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जाती है। सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013) निर्णय ने इस सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा था कि केवल ऊपरी अदालत में अपील लंबित रहने मात्र से किसी जनप्रतिनिधि की सदस्यता सुरक्षित नहीं रह सकती।

साहेबगंज के विधायक का यह मामला कोई अकेली घटना नहीं है। यह उस व्यापक राष्ट्रीय प्रवृत्ति की एक नई कड़ी है, जिसमें न्यायपालिका का यह विधिक प्रहार समय-समय पर राज्य विधानसभाओं के भीतर सक्रिय होता दिखाई देता है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में इसके प्रभाव ने प्रांतीय राजनीति की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित किया है।

उत्तर प्रदेश में धारा 8(3) का प्रयोग सबसे अधिक चर्चा और सियासी उलटफेर का केंद्र रहा है। देश की सबसे बड़ी 400 सदस्यों वाली विधानसभा में इस प्रावधान ने कई बड़े राजनीतिक चेहरों के भविष्य को प्रभावित किया। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान को भड़काऊ भाषण के एक मामले में तीन वर्ष की सजा हुई और उनकी सदस्यता समाप्त हो गई। इसके बाद उनके पुत्र अब्दुल्ला आजम भी अयोग्यता के दायरे में आए। इसी प्रकार खतौली से भाजपा विधायक विक्रम सैनी को मुजफ्फरनगर दंगा प्रकरण में दोषसिद्धि के बाद अपनी विधायिकी गंवानी पड़ी।

उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय ऐसे मामलों में अपनी त्वरित कार्रवाई के लिए जाना जाता है। सजा की प्रमाणित प्रति मिलते ही सदस्यता निरस्तीकरण की अधिसूचना जारी कर दी जाती है, हालांकि सत्तापक्ष के प्रचंड बहुमत के कारण इन अयोग्यताओं से सरकार की स्थिरता पर कोई विशेष असर नहीं पड़ता, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह घटनाएं सहानुभूति, जातीय समीकरणों और तीखे राजनीतिक ध्रुवीकरण को जन्म देती हैं।

राजस्थान की स्थिति उत्तर प्रदेश से भिन्न और कहीं अधिक संवेदनशील रही है। 200 सदस्यीय राजस्थान विधानसभा में राजनीतिक संतुलन कई बार अत्यंत नाजुक मोड़ पर खड़ा रहता है, जहां सत्ता और विपक्ष के बीच सीटों का मामूली अंतर भी सरकार की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।

राजस्थान के संसदीय इतिहास में ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहां न्यायिक निर्णयों ने सदन के भीतर के संतुलन को प्रभावित दिया। वर्ष 2016 में धौलपुर के तत्कालीन बसपा विधायक बीएल कुशवाह को दोषसिद्धि के बाद अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी। इसके बाद हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी शोभारानी कुशवाह भाजपा के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुईं। यह इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कानून व्यक्ति को हटा सकता है, लेकिन उसके राजनीतिक प्रभाव को समाप्त करना इतना सरल नहीं होता।

इसी क्रम में राजस्थान का एक और चर्चित मामला भाजपा विधायक कंवर लाल मीणा का रहा। लगभग दो दशक पुराने एक प्रकरण में, जिसमें उन्होंने एक उपखंड अधिकारी को धमकाया और राजकार्य में बाधा डाली थी, उच्च न्यायालय ने उनकी तीन वर्ष की सजा को बरकरार रखा। ऊपरी अदालतों से राहत न मिलने पर अंततः उनकी सदस्यता समाप्त हुई और उस रिक्त सीट पर उपचुनाव भी कराना पड़ा।

राजस्थान के ये उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि यहां सजा के बाद केवल जमानत पा लेना पर्याप्त नहीं होता। विधायिकी को बचाने की असली लड़ाई ऊपरी अदालतों से ‘दोषसिद्धि पर रोक’ प्राप्त करने की होती है, क्योंकि केवल सजा के स्थगन मात्र से सदस्यता सुरक्षित नहीं रहती। दोषसिद्धि पर स्पष्ट रोक ही विधायिकी को अस्थायी जीवनदान दे सकती है।

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