संपादकीय : समुद्री संप्रभुता का संघर्ष
होर्मुज जलडमरूमध्य अब केवल तेल आपूर्ति का मार्ग नहीं रहा, बल्कि समुद्री संप्रभुता, अंतर्राष्ट्रीय कानून और शक्ति-संतुलन की नई प्रयोगशाला बन चुका है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव के बीच ओमान और ईरान द्वारा जहाजों की आवाजाही के लिए वैकल्पिक नौवहन गलियारे तथा अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन की मध्यस्थता में अस्थायी समुद्री कॉरिडोर की पहल यह संकेत देती है कि युद्ध के बीच भी कूटनीति पूरी तरह समाप्त नहीं होती, किंतु इन प्रयासों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष इन्हें सुरक्षा व्यवस्था मानते हैं या अपनी-अपनी संप्रभुता का विस्तार।
जहाजों के आवागमन को अलग-अलग दिशा में नियंत्रित करने के लिए दो नौवहन गलियारों का विचार तकनीकी दृष्टि से व्यावहारिक है। इससे दुर्घटना तथा सैन्य टकराव की आशंका घटती है। व्यवस्था अस्थाई ही सही पर आईएमओ के समन्वय से अब तक 136 फंसे हुए जहाजों तथा लगभग 2,900 नाविकों को चरणबद्ध तरीके से सुरक्षित बाहर निकाला जाना सुखद है, किंतु सबसे बड़ी चुनौती यह है कि होर्मुज के उत्तरी तट पर प्रभावी नियंत्रण ईरान का है, जबकि दक्षिणी जलक्षेत्र ओमान के अधिकार में आता है। यदि ईरान जहाजों की आवाजाही पर अपनी स्वीकृति या शुल्क व्यवस्था लागू करना चाहता है और अमेरिका, ओमान निर्बाध नौवहन की व्यवस्था पर जोर देता है, तो यह विवाद यातायात प्रबंधन का नहीं, बल्कि अधिकार-क्षेत्र का बन जाता है। फलस्वरूप होर्मुज के भीतर एक प्रकार का ‘दूसरा होर्मुज’ के उभरने से एक मामूली समुद्री घटना भी व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का कारण बन सकती है। इतिहास बताता है कि अनेक बड़े युद्ध छोटे समुद्री विवादों से ही शुरू हुए थे। भारत के लिए यह संकट अत्यंत संवेदनशील है। देश के ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा फारस की खाड़ी से आता है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो युद्ध जोखिम बीमा, मालभाड़ा और सुरक्षा लागत में 40 से 50 प्रतिशत तक की वृद्धि का बोझ अंततः भारतीय रिफाइनरियों और उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। कुछ भारतीय जहाजों को पहले ही अपना मार्ग बदलना पड़ा है तथा कई टैंकरों ने यात्रा स्थगित या वापस लौटने का निर्णय लिया है। इसके अलावा भारतीय नाविकों की सुरक्षा की चिंता सामने है। हजारों भारतीय समुद्री कर्मचारी खाड़ी क्षेत्र में कार्यरत हैं। मिसाइल, ड्रोन, समुद्री सुरंगों और जहाजों पर हमलों के बीच उनका जीवन सीधे तौर पर जोखिम में है, इसलिए सरकार की प्राथमिकता केवल तेल नहीं, अपने नागरिकों की सुरक्षा भी होनी चाहिए।
भारत की रणनीति बहुआयामी होनी चाहिए। पहला, दोनों पक्षों से समान दूरी रखते हुए ओमान, आईएमओ और खाड़ी देशों के साथ समुद्री सुरक्षा समन्वय बढ़ाया जाए। दूसरा, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विवेकपूर्ण उपयोग और रूस, अफ्रीका तथा अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों से आयात बढ़ाकर आपूर्ति का विविधीकरण किया जाए। तीसरा, भारतीय नौसेना की एस्कॉर्ट क्षमता तथा समुद्री निगरानी को और मजबूत किया जाए, ताकि भारतीय ध्वज वाले जहाज सुरक्षित आवागमन कर सकें। होर्मुज का संकट केवल समुद्री मार्ग का प्रश्न नहीं है। यह तय करेगा कि 21वीं सदी में वैश्विक समुद्री व्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय कानून से चलेगी या क्षेत्रीय शक्ति-राजनीति से। भारत जैसे समुद्री व्यापार पर निर्भर देश के लिए यही सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती है।
