संपादकीय : पूर्व का नया पुल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जकार्ता यात्रा ने भारत-इंडोनेशिया संबंधों को नई दिशा दी है। ब्रह्मोस मिसाइल सौदा, समुद्री सुरक्षा, सबांग बंदरगाह, यूपीआई, रेयर-अर्थ खनिज और डिजिटल सहयोग से हिंद-प्रशांत में भारत की रणनीतिक भूमिका और मजबूत होगी।
भारत और इंडोनेशिया के संबंध तकरीबन दो हजार साल पुराने समुद्री संपर्क और सांस्कृतिक विश्वास की विरासत पर आधारित हैं। बोरोबुदुर मंदिर और प्रंबानन मंदिर आज भी इस ऐतिहासिक निकटता के साक्षी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जकार्ता यात्रा ने इस सांस्कृतिक आधार को 21 वीं सदी की सामरिक, आर्थिक और प्रौद्योगिकीय साझेदारी में बदलने की दिशा में एक निर्णायक कदम बढ़ाया है। रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल अवसंरचना, रेयर-अर्थ खनिज और भुगतान प्रणालियों से जुड़े समझौते इस बात का संकेत हैं कि दोनों लोकतंत्र अब केवल मित्र नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत की स्थिरता के साझेदार बन रहे हैं। 5,000 करोड़ रुपये के रक्षा समझौते का महत्व केवल हथियारों की बिक्री तक सीमित नहीं है।
इंडोनेशिया द्वारा भारत निर्मित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल खरीदने का निर्णय भारतीय रक्षा उद्योग के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। फिलिपींस और वियतनाम के बाद इंडोनेशिया ब्रह्मोस खरीदने वाला दक्षिण-पूर्व एशिया का दूसरा और कुल तीसरा देश बन गया है, जबकि अस्त्र मिसाइल का यह पहला विदेशी ग्राहक होगा। अस्त्र मिसाइलों को इंडोनेशिया के रूसी मूल के सुखोई-30 लड़ाकू विमानों के साथ एकीकृत करने के बाद भारतीय रक्षा तकनीक के लिए एशिया और अफ्रीका के उन देशों का बाजार खुलेगा, जो रूसी मूल के लड़ाकू विमान संचालित करते हैं। इस यात्रा का सबसे दूरगामी सामरिक पहलू मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार पर स्थित सबांग बंदरगाह का संयुक्त विकास है।
भारत के ग्रेट निकोबार द्वीप से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर मलक्का जलडमरूमध्य स्थित इस बंदरगाह से स्थित विश्व व्यापार का 25 फीसद यहीं से गुजरता है। सबांग में भारत की बढ़ती उपस्थिति उसे समुद्री व्यापार मार्गों की निगरानी, मानवीय सहायता, आपदा राहत और समुद्री सुरक्षा में नई क्षमता देगी। यह चीन की बढ़ती नौसैनिक सक्रियता के बीच हिंद-प्रशांत में शक्ति-संतुलन बनाए रखने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। रक्षा सहयोग के साथ-साथ डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, यूपीआई, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ईवीएम निर्माण और रेयर-अर्थ खनिजों पर हुए समझौते भारत की आर्थिक कूटनीति को नई दिशा देंगे। यदि इंडोनेशिया में यूपीआई जैसी प्रणालियां लागू होती हैं, तो व्यापार, पर्यटन और निवेश को नई गति मिलेगी। रेयर-अर्थ खनिजों में सहयोग भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है।
इंडोनेशिया में बसे लगभग एक लाख भारतीय मूल के लोगों के लिए भी यह यात्रा अवसर लेकर आई है। व्यापार, शिक्षा, डिजिटल सेवाओं और निवेश के बढ़ते सहयोग से प्रवासी भारतीयों की आर्थिक गतिविधियां और सांस्कृतिक भूमिका दोनों सशक्त होंगी। भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति अब केवल सांस्कृतिक संपर्क का कार्यक्रम नहीं रही, वह सामरिक साझेदारी, समुद्री सुरक्षा और तकनीकी सहयोग की व्यापक नीति बन चुकी है। इंडोनेशिया के साथ हुए ये समझौते बताते हैं कि भारत अब हिंद-प्रशांत में केवल एक भौगोलिक शक्ति नहीं, बल्कि विश्वसनीय सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और विकास साझेदार के रूप में उभर रहा है। समझौतों का प्रभावी क्रियान्वयन इस यात्रा को भारत-इंडोनेशिया संबंधों का स्वर्णिम अध्याय लिख सकता है।
