संपादकीय : पीओके का प्रतिरोध
यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स नेशनल पार्टी जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की साजिशों और मानवाधिकार हनन का कड़ा विरोध करती है, उसका कहना है कि गुलाम कश्मीर में पाकिस्तानी दमन को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र हस्तक्षेप करे, अन्वेषण दल भेज कर तथ्यों की जांच कराए। उसने स्विस ह्यूमन राइट कमीशन और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को अपनी आपातकालीन अपील सौंपी है, जिसमें कहा गया है कि पाकिस्तान ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी हैं तथा यहां लाखों लोगों का जीवन खतरे में है।
पाकिस्तानी दमन के खिलाफ बगावत में बदले इस अभियान ने ईरान-अमेरिका के बीच वार्ताकार की भूमिका निभा कर सुर्खरू बन रहे पाकिस्तान के चेहरे पर राख मल दी है। जिस कश्मीर क्षेत्र को वह अपना बताता हो, उसमें ही उसकी नृशंसता और दमन ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के 'कश्मीर नैरेटिव' की धज्जियां उड़ा दी हैं। अब यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स नेशनल पार्टी द्वारा इस मामले को अंतर्राष्ट्रीय करने की कोशिशों ने उसकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। सच तो यह है कि संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में तकरीबन महीने भर से चल रहे विरोध-प्रदर्शनों को कुचलने के लिए पाकिस्तानी सेना और पुलिस ने जिस बर्बरता का सहारा लिया, उससे यह जन-आंदोलन उग्रतर होता गया। यहां राशन और दवाओं की किल्लत है, बिजली पानी पर संकट है। जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं सुलभ नहीं हैं, ऊपर से इंटरनेट बंद है।
भीषण दमन का सामना करने वाले आंदोलनकारियों की यह मांग जायज है कि 27 जुलाई को यहां होने वाले चुनावों में उन 12 सीटों को खत्म किया जाए, जिसके जरिए इस्लामाबाद की हुकूमत हर बार सत्ता पर काबिज होकर पूरे क्षेत्र को पाकिस्तान के बंधक अथवा बंधुआ की तर्ज पर व्यवहार करती है। आंदोलन सफल रहा तो बरसों से चली आ रही उसकी यह चाल नाकाम हो जाएगी। बेशक पीओके अब पाकिस्तान के नियंत्रण से बाहर है।
आंदोलनकारियों ने साफ कह दिया है वे पाकिस्तानी नहीं हैं। भारत का आधिकारिक और संवैधानिक रुख साफ है कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर जिसमें पाक अधिकृत कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान शामिल हैं, भारत का अविभाज्य अंग है। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री, विदेशमंत्री इसे लगातार दोहराते रहे हैं। भारत में केवल शासक दल ही नहीं, सभी राजनीतिक दल पीओके को भारत में मिलाने के लिए एक स्वर से राजी हैं और वे सत्ता के द्वारा इस मामले में किए जाने वाले हर प्रयास के साथ होंगे। पीओके को वापस भारत गणराज्य का हिस्सा बनाने के लिए जिन कारगुजारियों की जरूरत है, अभी संभव नहीं। ऐसी सियासी प्रतिबद्धताओं और जोशीले बयानों का तब तक कोई अर्थ नहीं जब तक कि सतह पर दिखने वाला कोई सार्थक सक्रियता न दिखे।
फिलहाल इन परिस्थितियों के मद्देनजर अचूक रणनीति के तहत इस ओर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। भारत को मानवता और लोकतांत्रिक मूल्यों के नाते इस मामले में सीधे हस्तक्षेप कर गुलाम कश्मीरियों की सहायता करनी चाहिए। वैश्विक स्तर पर नैतिक, वैचारिक समर्थन और कूटनीतिक समर्थन देना भी बेहतर विकल्प है। निश्चित रूप से पीओके का जनाक्रोश भारत के लिए एक अनुकूल अवसर की खिड़की खोलता है।
