एल्गोरिद्म, मानसिक स्वास्थ्य और जवाबदेही का प्रश्न

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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सोशल मीडिया कंपनियां अक्सर यह तर्क देती हैं कि वे केवल वही दिखाती हैं, जो उपयोगकर्ता देखना चाहता है, लेकिन वास्तविकता इससे अधिक जटिल है।

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डॉ. शिवम् भारद्वाज,
असिस्टेंट प्रोफेसर

तकनीक का इतिहास मानव बुद्धि की विजय का इतिहास रहा है। पहिए से लेकर इंटरनेट तक, हर आविष्कार ने मनुष्य को अधिक सक्षम बनाया है, लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां प्रश्न यह नहीं रह गया कि तकनीक हमारे लिए क्या कर सकती है। प्रश्न यह है कि तकनीक हमारे साथ क्या कर रही है। विशेष रूप से यह कि डिजिटल प्लेटफॉर्म हमारे व्यवहार, हमारी पसंद और हमारी मानसिक दुनिया को किस हद तक प्रभावित कर रहे हैं।

हाल के दिनों में सामने आई दो खबरों ने इस प्रश्न को नई गंभीरता दी है। पहली, युवाओं में बढ़ती चिंता, अवसाद और वास्तविक जीवन से कटकर डिजिटल दुनिया में शरण लेने की प्रवृत्ति। दूसरी, इटली में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ दायर वह मुकदमा, जिसमें आरोप लगाया गया है कि एक किशोरी को लगातार आत्म-क्षति और अवसाद से जुड़ी सामग्री दिखाई गई, जिससे उसकी मानसिक स्थिति और खराब हुई तथा वह आत्महत्या जैसे घातक कदम की ओर बढ़ी। यह मुकदमा केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है; यह उस व्यापक बहस का हिस्सा है, जिसमें दुनिया भर में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की भूमिका और जिम्मेदारी पर प्रश्न उठ रहे हैं।

उपरोक्त दोनों को अलग-अलग देखना उचित नहीं लगता, क्योंकि वे एक ही डिजिटल व्यवस्था के दो परिणाम हैं। आज अधिकांश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का कारोबार विज्ञापनों पर आधारित है। इसकी आर्थिक नींव ‘अटेंशन इकोनॉमी’ पर आधारित है। उनकी कमाई इस बात पर निर्भर करती है कि उपयोगकर्ता कितनी देर तक स्क्रीन पर बना रहता है। दूसरे शब्दों में, डिजिटल अर्थव्यवस्था में उपयोगकर्ता का ध्यान स्वयं एक मूल्यवान संसाधन बन चुका है। जितनी देर कोई व्यक्ति किसी प्लेटफॉर्म पर रहेगा, उसके व्यावसायिक लाभ की संभावना उतनी ही बढ़ेगी।

यहीं से एल्गोरिद्म की भूमिका शुरू होती है। कंपनियां अक्सर यह तर्क देती हैं कि वे केवल वही दिखाती हैं, जो उपयोगकर्ता देखना चाहता है, लेकिन वास्तविकता इससे अधिक जटिल है। प्लेटफॉर्म का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य हमेशा सबसे उपयोगी या सबसे विश्वसनीय जानकारी दिखाना नहीं होता, बल्कि ‘एंगेजमेंट ऑप्टिमाइजेशन’ होता है। अर्थात ऐसी सामग्री दिखाना, जो लोगों का ध्यान अधिक समय तक बांधे रख सके। वे यह देखते हैं कि हम किस प्रकार की सामग्री पर अधिक समय बिताते हैं, किस पर प्रतिक्रिया देते हैं और किसे बार-बार देखते हैं। इसके बाद वे उसी तरह की और सामग्री प्रस्तुत करते हैं।

यहीं ‘एल्गोरिद्मिक रिइनफोर्समेंट’ की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि कोई व्यक्ति उदासी, असफलता या अकेलेपन से जुड़ी सामग्री अधिक देखता है, तो उसके सामने वैसी ही सामग्री की मात्रा बढ़ सकती है। धीरे-धीरे एक ऐसा डिजिटल वातावरण बन जाता है, जहां व्यक्ति बार-बार उन्हीं भावनाओं और विचारों से घिरा रहता है। कई अध्ययनों ने संकेत दिया है कि ऐसी प्रणालियां चिंता, सामाजिक तुलना और मानसिक दबाव को बढ़ा सकती हैं, विशेषकर किशोरों और युवाओं में।

यहीं सामान्य सोशल मीडिया उपयोग और एल्गोरिद्मिक प्रभाव के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। समस्या केवल यह नहीं है कि युवा सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं। समस्या यह है कि प्लेटफॉर्म की संरचना किस प्रकार की सामग्री को बढ़ावा देती है। पारंपरिक मीडिया में दर्शक सामग्री चुनता था; आज कई मामलों में सामग्री दर्शक को चुनती है, जो सामग्री अधिक ध्यान आकर्षित करती है, वही अधिक लोगों तक पहुंचती है। ऐसे में सनसनी, तुलना, उत्तेजना और तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करने वाली सामग्री को स्वाभाविक बढ़त मिल जाती है।

विडंबना यह है कि हम इतिहास के सबसे अधिक ‘कनेक्टेड’ समाज में रहते हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से शायद सबसे अधिक ‘डिस्कनेक्टेड’ हो चुके हैं। घरों में इंटरनेट की गति बढ़ी है, लेकिन संवाद की गति घट गई है। परिवार एक ही छत के नीचे रहते हैं, परंतु अलग-अलग स्क्रीन में कैद हैं। मित्रों की संख्या हजारों में है, पर मन की बात कहने वाला कोई एक व्यक्ति भी नहीं मिलता। यह अकेलापन ही वह खाली जगह है, जहां एल्गोरिद्म अपना साम्राज्य खड़ा करते हैं। 

युवाओं पर इसका प्रभाव इसलिए अधिक पड़ता है, क्योंकि वे जीवन के ऐसे दौर में होते हैं जहां पहचान, आत्मविश्वास और सामाजिक स्वीकृति की तलाश सबसे अधिक होती है। प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, करियर की अनिश्चितता, सामाजिक तुलना और सफलता की निरंतर दौड़ पहले से ही मानसिक तनाव बढ़ा रही है। ऐसे में वह राहत के लिए स्क्रीन की ओर देखता है। यहीं से एक अदृश्य चक्र शुरू होता है। डिजिटल मंच अगर तुलना, असुरक्षा या नकारात्मक भावनाओं को बढ़ाने वाली सामग्री को आगे बढ़ाएं, तो उसका प्रभाव और गहरा हो सकता है।

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