अर्थव्यवस्था के लिए भारी पड़ सकता है बिगड़ा मानसून

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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अल नीनो और कमजोर मानसून भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन गए हैं, जिससे खाद्य कीमतों में वृद्धि और महंगाई का खतरा बढ़ गया है।

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विवेक सक्सेना, अयोध्या

अल नीनो और कमजोर मानसून भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन गए हैं, जिससे खाद्य कीमतों में वृद्धि और महंगाई का खतरा बढ़ गया है। अभी शुरुआती दिन हैं, लेकिन मानसून की स्थिति अब तक अच्छी नहीं रही है। जून में पूरे भारत में 35-40 प्रतिशत की कमी (आईएमडी ने पूरे देश में इस मौसम के लिए 10 प्रतिशत की कमी का अनुमान लगाया है) के कारण खरीफ की बुवाई की शुरुआत कमजोर रही है, हालांकि खाद्य आपूर्ति को लेकर चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि सरकार के पास दालों का लगभग पांच मिलियन टन भंडार होने का अनुमान है। 

मानसून का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। इसके अलावा, मानसून की कमी का उत्पादन पर प्रभाव उसके भौगोलिक और सामयिक वितरण पर निर्भर करता है। सिंचित क्षेत्रों में तीव्र कमी का उतना नुकसान होने की संभावना नहीं है, जितना कि वर्षा आधारित क्षेत्रों में होने वाली ऐसी ही घटना का। इस अनिश्चितता की स्थिति में, केंद्र से लेकर राज्यों और जिलों तक, साथ ही बैंकों सहित, राज्य तंत्र के सभी अंगों का तैयार रहना सर्वोत्तम है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अल नीनो प्रभाव के चलते मानसून में कमी को देखते हुए सूखे की आशंका से निपटने के लिए बीते दिनों बैठक की। इसमें उन 315 जिलों की पहचान की गई, जो सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं।

इन जिलों में भी 111 ऐसे हैं, जहां सूखे का असर कहीं अधिक हो सकता है। निःसंदेह भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए बारिश में कमी एक गंभीर चुनौती है। सूखे की आशंका केवल किसानों की ही समस्या नहीं बढ़ाएगी, बल्कि कमजोर फसल के नतीजे में अनाज के महंगे होने से आम आदमी भी प्रभावित हो सकता है। चुनौती केवल सिंचाई के जल के अभाव के रूप में ही पैदा नहीं होगी, बल्कि देश के कुछ इलाकों में पेयजल संकट भी बढ़ सकता है। वैसे भी गर्मियों में देश के कई हिस्से इस संकट से दो-चार होते ही हैं। 

एक समय था जब किसानों और भारतीयों के लिए, बारिश खुशी का मौसम हुआ करती थी। खेतों के साथ-साथ गलियां, सड़कें पानी से लबालब रहती थीं, आज, मानसून के आने का इंतजार किया जाता है। हर वर्ग चिंतित होता है। देरी से आने वाला या कमजोर मानसून अब केवल किसानों को प्रभावित नहीं करता है। यह अब खाद्य पदार्थों की कीमतों, बिजली के बिलों, आय, महंगाई और यहां तक कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा लिए गए आर्थिक फैसलों को भी प्रभावित करता है। प्रशांत महासागर पर अल नीनो की स्थिति विकसित होने की वैज्ञानिकों की चेतावनी के साथ, अब यह चिंता बढ़ती जा रही है कि मौसम की यह घटना एक बहुत बड़ी आर्थिक चुनौती में बदल सकती है।

अनियंत्रित औद्योगीकरण, वनों की कटाई और कार्बन उत्सर्जन ने हमारी जलवायु को इस हद तक प्रभावित किया है कि मौसम का चक्र पूरी तरह से डगमगा गया है। पर्यावरण संरक्षण अब कोई केवल सैद्धांतिक चर्चा का विषय नहीं, बल्कि एक तात्कालिक आवश्यकता बन चुका है। वैश्विक तापमान में वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) के परिणाम आज हमारे सामने स्पष्ट हैं। कहीं भीषण सूखा, तो कहीं बेमौसम मूसलधार बारिश और बाढ़ की विभीषिका आम हो चुकी है। हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिसका सीधा असर समुद्र के जलस्तर और तटीय क्षेत्रों पर पड़ रहा है। जैव विविधता का तेजी से हो रहा ह्रास पारिस्थितिकी तंत्र के मूल ढांचे को कमजोर कर रहा है। 

बढ़ते वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण भारत का मानसून अब जीवनदायिनी से अधिक 'प्रकोप' का पर्याय बनता जा रहा है। एक ओर अनियंत्रित विकास और पर्यावरण दोहन से मौसम का चक्र गड़बड़ा गया है, वहीं दूसरी ओर अचानक भारी बारिश या लंबे सूखे की दोहरी मार ने कृषि, अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन को गहरे संकट में डाल दिया है। कभी पूरे देश में समान रूप से बरसने वाला मानसून अब खंडित और चरम रूप ले चुका है। जलवायु वैज्ञानिकों के विश्लेषण बताते हैं कि मानसूनी बादलों का मिजाज पूरी तरह बदल गया है। देश के एक हिस्से में सूखा पड़ता है, तो दूसरे हिस्से में कुछ ही घंटों में बादल फटने या अत्यधिक मूसलधार बारिश से बाढ़ जैसे भयावह हालात पैदा हो जाते हैं। यह पारिस्थितिकी तंत्र के अत्यधिक गर्म होने का सीधा परिणाम है।

भारतीय अर्थव्यवस्था आज भी काफी हद तक मानसून और वर्षा आधारित कृषि पर निर्भर है। मानसून की बेरुखी खरीफ की फसलों को नष्ट कर देती है, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ती है और आम जनता की थाली का बजट बिगड़ जाता है। किसानों की आय और रोजगार दोनों ही इस अनिश्चितता की भेंट चढ़ रहे हैं। मानसून को लेकर भारत की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं, क्योंकि इस वर्ष बारिश सामान्य से काफी कम है और अल नीनो का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

भारतीय जल प्रबंधन विभाग (आईएमडी) ने मंगलवार को कहा है कि माह जुलाई में भारत में मासिक औसत बारिश 280.4 मिमी. सामान्य से कम रहने की उम्मीद है। आईएमडी के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्रा ने कहा है कि देश के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होगी, हालांकि उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व, पूर्वी-मध्य भारत और पूर्वी प्रायद्वीपीय क्षेत्र के कुछ हिस्सों में सामान्य या उससे अधिक बारिश होने की उम्मीद है। 

विश्व मौसम विज्ञान संगठन का अनुमान है कि जून और अगस्त के बीच अल नीनो विकसित होने की 80 प्रतिशत और उसके बाद 90 प्रतिशत संभावना है। कृषि मंत्रालय के अनुसार, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु सहित 12 राज्यों में इसका प्रभाव काफी गंभीर हो सकता है। भारत के मानसून और अल नीनो के बीच एक लंबा और असहज रिश्ता रहा है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अनुसार 1950 के बाद से, भारत ने 16 अल नीनो वर्ष देखे हैं। उनमें से सात में मानसून की बारिश सामान्य से कम रही है। जो बात मौजूदा स्थिति को और अधिक चिंताजनक बनाती है, वह यह है कि ये प्राकृतिक चक्र ग्लोबल वार्मिंग की पृष्ठभूमि में सामने आ रहे हैं। जो तापमान की चरम सीमा और बारिश की अनिश्चितता को कई गुना बढ़ा रहे हैं।

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