भूकंप के विकराल होने में मानव भी जिम्मेदार
पर्यावरणविदों की मानें तो सभी भूकंप प्राकृतिक नहीं होते, बल्कि उन्हें विकराल बनाने में मानवीय हस्तक्षेप भी शामिल है।
दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में एक मिनट के अंतराल पर आए दो शक्तिशाली भूकंपों ने बड़ी ताबाही मचा दी है। 24 जून 2026 को शाम को आए 7.2 और 7.5 तीव्रता वाले भूकंपों ने पूरे देश की बुनियाद को हिला दिया है। इसे वेनेजुएला का एक सदी में आए सबसे ज्यादा विनाशकारी भूकंप का दर्जा दिया गया है। इस शक्तिशाली भूकंप के प्रभाव से राजधानी कराकस और उसके आसपास की सैंकड़ों इमारतें कंक्रीट और स्टील के मलबे में बदल गईं। 188 लोगों की मृत्यु हो गई और हजारों लोग मलबे में दबे हुए हैं। यूएस भूगर्भीय सर्वेक्षण में कहा गया है कि आशंका है कि 10,000 से भी अधिक लोग इस विनाशलीला में समा गए हों?
7.2 तीव्रता का पहला भूकंप कैरिबियन तट पर मोरोन के पश्चिम में आया। राजधानी कराकस से करीब 170 किमी की दूरी पर यह स्थल है। भूकंप का केंद्र धरती से 22 किमी नीचे था। ठीक एक मिनट बाद 7.5 तीव्रता का दूसरा भूकंप आया, यह धरती की 10 किमी गहराई से उभरा था। यह जगह मोरोन से 16 किमी दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। चूंकि यह भूकंप छुट्टी के दिन आया था, इस कारण ज्यादातर लोग बहुमंजिला इमारतों वाले घरों में थे। इस कारण मौतों का अनुमान 10,000 तक लगाया जा रहा है। इसकी आशंका इसलिए की जा रही है, क्योंकि गुमशुदा लोगों की जानकारी के लिए बनाई गई वेबसाइट पर 66 हजार से भी अधिक लापता लोगों की सूची सामने आई है। इस भूकंप के झटके जापान और नेपाल में भी दर्ज किए गए हैं।
उथले भूकंप गर्भ से भूमि की सतह पर फूटने के साथ भीषण बर्बादी का कारण बनते हैं। वेनेजुएला का भूकंप 10 और 22 किमी की गहराई से फूटे, इसलिए नुकसान ज्यादा होने की आशंका है। भूकंप की चेतावनी संबंधी प्रणालियां अनेक देशों में संचालित हैं, लेकिन वह भू-गर्भ में हो रही दानवी हलचलों की सटीक जानकारी समय पूर्व देने में लगभग असमर्थ हैं, क्योंकि प्राकृतिक आपदाओं की जानकारी देने वाले अमेरिका, जापान, भारत, नेपाल, अफगानिस्तान, चीन और अन्य देशों में भूकंप आते ही रहते हैं।
यहां लाख टके का सवाल उठता है कि चांद और मंगल जैसे ग्रहों पर मानव बस्तियां बसाने का सपना और पाताल की गहराइयों को नाप लेने का दावा करने वाले वैज्ञानिक आखिर पृथ्वी के नीचे उत्पात मचा रही हलचलों की जानकारी प्राप्त करने में क्यों असफल हैं? जबकि वैज्ञानिक इस दिशा में लंबे समय से कार्यरत हैं। अमेरिका एवं भारत समेत अनेक देशों के मौसम व भू-गर्भीय हलचल की जानकारी देने वाले सैंकड़ों उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित कर चुके हैं। हिंदूकुश क्षेत्र में आया यह भूकंप भारत के लिए भी चेतावनी है।
दुनिया के नामचीन विषेशज्ञों व पर्यावरणविदों की मानें तो सभी भूकंप प्राकृतिक नहीं होते, बल्कि उन्हें विकराल बनाने में मानवीय हस्तक्षेप शमिल है, इसीलिए इस भूकंप को स्थानीय भू-गर्भीय विविधता का कारण माना गया है। दरअसल प्राकृतिक संसाधनों के अकूत दोहन से छोटे स्तर के भूकंपों की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। भविष्य में इन्हीं भूकंपों की व्यापकता और विकरालता बढ़ जाती है। यही कारण है कि भूकंपों की आवृत्ति बढ़ रही है। पहले 13 सालों में एक बार भूकंप आने की आशंका बनी रहती थी, लेकिन अब यह घटकर चार साल हो गई है।
यही नहीं, आए भूकंपों का वैज्ञानिक आकलन करने से यह भी पता चला है कि भूकंपीय विस्फोट में जो ऊर्जा निकलती है, उसकी मात्रा भी पहले की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली हुई है। 25 अप्रैल 2015 को नेपाल में जो भूकंप आया था, उनसे 20 थर्मोन्यूक्लियर हाइड्रोजन बमों के बराबर ऊर्जा निकली थी। यहां हुआ प्रत्येक विस्फोट हिरोशिमा-नागाशाकी में गिराए गए परमाणु बमों से भी कई गुना ज्यादा ताकतवर था। जापान और फिर क्वोटो में आए सिलसिलेवार भूकंपों से पता चला है कि धरती के गर्भ में अंगड़ाई ले रही भूकंपीय हलचलें महानगरीय आधुनिक विकास और आबादी के लिए अधिक खतरनाक साबित हो रही हैं।
ये हलचलें भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश की धरती के नीचे भी अंगड़ाई ले रही हैं, इसलिए इन देशों के महानगर भूकंप के मुहाने पर खड़े हैं। विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण की अनदेखी प्रकृति को प्रकोप में बदल रही है, इसलिए बाढ़, भू-स्खलन, सूखा, हिमनदों का पिघलना, भूकंप और सुनामी जैसे तूफानों का आना निरंतर बना हुआ है।
भूकंप के लिए जरूरी ऊर्जा के एकत्रित होने की प्रक्रिया को धरती की विभिन्न परतों के आपस में टकराने के सिद्धांत से आसानी से समझा जा सकता है। ऐसी वैज्ञानिक मान्यता है कि करीब साढ़े पांच करोड़ साल पहले भारत और आस्ट्रेलिया को जोड़े रखने वाली भूगर्भीय परतें एक-दूसरे से अलग हो गईं और वे यूरेशिया परत से जा टकराईं। इस टक्कर के फलस्वरूप हिमालय पर्वतमाला अस्तित्व में आई और धरती की विभिन्न परतों के बीच वर्तमान में मौजूद दरारें बनीं। हिमालय पर्वत उस स्थल पर अब तक अटल खड़ा है, जहां पृथ्वी की दो अलग-अलग परतें परस्पर टकराकर एक-दूसरे के भीतर घुस गई थीं। परतों के टकराव की इस प्रक्रिया की वजह से हिमालय और उसके प्रायद्वीपीय क्षेत्र में भूकंप आते रहते हैं। इसी प्रायद्वीप में ज्यादातर एशियाई देश बसे हुए हैं।
