मॉनसून के लिए विलेन बना ‘अल नीनो’

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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जून का महीना मानसून के आगमन का रहता है। महीना बीतने को है, लेकिन मानसून का कोई अता-पता नहीं। मौसम विभाग ने मानसून देरी का कारण ‘अल नीनो’ को बताया है

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डॉ. रमेश ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार

मानसून की उदासीनता केरल से लेकर भारत के विभिन्न हिस्सों में बरकरार है। 64 फीसदी बारिश अभी तक कम हुई है। पिछले माह 26 मई को केरल में मानसून आने का अनुमान था, वह भी धराशायी हुआ। जून का महीना मानसून के आगमन का रहता है, पर महीना बीतने को है, लेकिन मानसून का कोई अता-पता नहीं है? अभी लापता है। मौसम विभाग ने मानसून देरी का कारण ‘अल नीनो’ को बताया है।

‘स्टेट यूनिवर्सिटीज ऑफ न्यूर्याक’ में इस महीने की रिसर्च से वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मौजूदा ‘अल नीनो’ का प्रभाव 140 वर्ष पूर्व के अभी तक के सबसे खतरनाक मोड़ पर है। मानसून वर्षा पर भारत की तकरीबन 70 फीसदी खेती-बाड़ी निर्भर रहती है, जो अब प्रभावित होती दिखने लगी है। पिछले 11 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ है, जब इतनी कम बारिश दर्ज की गई हो, हालांकि पिछले दिनों बारिश हुई, लेकिन बारिशें सामान्य ‘पूर्वमेघ’ थी, उसे ‘उत्तरमेघ’ यानी मानूसन से नहीं जोड़ा जा सकता।

अलनीनो है क्या? दरअसल, यह एक ‘स्पेनिश’ शब्द है, जो प्रशांत महासागर में उत्पन्न कर देना वाला अप्राकृतिक मौसम का ‘विलेन’ होता है। इसके प्रभाव से मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय महासागर का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है, जो मानसून पर सीधा अटैक करता है। ‘अलनीनो’ के प्रभाव से दक्षिणी गोलार्ध से उठने वाली हवाओं का दबाव भूमध्यीय रेखाओं के निकट कम हुआ है, जिसके चलते ही भीषण गर्मी का जनमानस सामना कर रहे हैं। 

अलनीनो को तबाही भी कहते हैं, जो मानसूनी हवाओं पर भूमध्य और कैस्पियन सागर के ऊपर बहने वाली प्रवाहमान गति को अपने प्रभाव से थामता है। यही कारण है, वायुमंडलीय क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थितियां बनती हैं, तो मानसून के रूख में बदलाव होने लगता है। अलनीनो का बुरा प्रभाव कब दिखता है, इस संबंध में वैज्ञानिकों का मानना है कि जब पर्यावरण असंतुलित होता है, तो अलनीनो का विपरीत प्रभाव दिखने लगता है। लगातार होता पर्यावरणीय दोहन, कटते जंगल, सिकुड़ते पहाड़ और असंतुलित होता कुदरती माहौल मुख्य कारण है।

मानसून कब दस्तक देगा, इसका इंतजार सबसे ज्यादा अन्नदाता कर रहे हैं, क्योंकि ये महीना खरीफ फसलों की बुआई का रहता है, जो लगातार प्रभावित हो रहा है। मानसून की बेरुखी के चलते समूचे देश में न सिर्फ भीषण गर्मी का दौर है, बल्कि सूखे की आहट भी सुनाई देने लगी है। मानूसन के चलते अगर खेती प्रभावित हुई, तो पूरक व्यवसाय के लिहाज से बाजार में मंदी का साया भी पड़ सकता है। 

मानसून के रूठने से कपास की बुआई एकदम अधर में पड़ी है। बदरा बरसे, इसको लेकर लोग देसी परंपराओं का इस्तेमाल भी करने लगे हैं? इंद्रदेव को मनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों ने पूजा-पाठ शुरू की है, क्योंकि ‘मृग नक्षत्र’ बीत चुका है, जिसमें बारिश इस बार नहीं हुई। मानसून की अविलंबता ने न सिर्फ भारतीयों को परेशान किया हुआ है, बल्कि वैश्विक जलवायु मौसम चक्र के मिजाज को भी गड़बड़ा दिया है।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार प्रशांत महासागर में 28 मई से सक्रिय हुए ‘अलनीनो’ के प्रभाव के चलते मानसून ने बेरुखी अख्तियार की है। वहीं, ‘विश्व मौसम संगठन’ ने भी चेताया है कि अलनीनो इस बार अपना बुरा प्रभाव पूरे संसार में दिखाएगा, जिससे सूखे का संकट बढ़ेगा। ‘नासा’ के जरिए उपग्रह से जो तस्वीरें फिलहाल ली गई हैं, उनमें भी दक्षिण-पश्चिम जलीय भू-भागों में बदलाव के कोई संकेत नहीं मिले। मानसून की देरी के चलते सूखते जलस्त्रोत, अधर में पड़ती खेती की बुआई और भीषण गर्मी से जनजीवन पर बुरा प्रभाव पड़ना आरंभ हो गया है।

वर्तमान हालात को देखते हुए मौसम विभाग ने किसानों को फिलहाल इंतजार करने को कहा है, लेकिन अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो इससे न केवल किसान आर्थिक रूप से परेशान होंगे, बल्कि फसल उत्पादन पर भी विपरीत असर पड़ेगा। सभी जानते हैं कि भारत की संपूर्ण अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र तकरीबन 20 से 25 फीसदी की भूमिका निभाता है। कृषि का गड़बड़ाना, यानी कई व्यवस्थाएं एक साथ चरमराना? कृषि के लिए वैकल्पिक सुविधाएं अब इतनी नहीं जितनी होनी चाहिए। नाले, नदियां, तालाब, पोखर, जलाशय आदि सूखे पड़े हैं, जबकि किसी जमाने में यह जलीय संसाधन बारिश न होने की भरपाई करते थे।

लापता होते मानसून को मनाने का माध्यम अब सिर्फ और सिर्फ पर्यावरण सुधार कर ही किया जा सकता है। महासागरों की सतहों को प्रभावित करने वाली सभी मानवीय गतिविधियों पर रोक लगाने की जरूरत है। जंगलों को काटने से बचाना होगा। अरावली के पहाड़ सुरक्षित रखने होंगे। इन्हीं, वजहों से मानसून को लेकर वैज्ञानिक अनुमान सही साबित नहीं हो पाते, क्योंकि प्र्यावरण की गति लगातार बिगड़ती जा रही है। मानसून की बेरुखी सिर्फ किसानों को ही प्रभावित नहीं करेगी, जनमानस को भी तहस-नहस करने पर आमादा है। बिगड़े मौसम के मिजाज ने ही अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में मानसून को आगे नहीं बढ़ने दिया है। इस कारण मध्य और उत्तर-पश्चिम की शुष्क हवाएं भी सुस्त पड़ी हैं।

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