संपादकीय : उम्मीदों का वैभव

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Published By Pradeep Kumar
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भारत में क्रिकेट केवल खेल नहीं, बल्कि सामाजिक आकांक्षाओं और राष्ट्रीय आत्मविश्वास का प्रतीक है। ऐसे में 15 वर्ष 99 दिन की आयु में इंग्लैंड के विरुद्ध टी20 अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण करने वाले वैभव सूर्यवंशी ने भारतीय क्रिकेट के भविष्य की नई उम्मीद जगाई है। किशोर खिलाड़ी का चयन बताता है कि चयनकर्ता केवल भविष्य नहीं देख रहे, बल्कि वर्तमान में भी उसे उपयोगी मानते हैं। यह भारतीय क्रिकेट की बदलती सोच का प्रमाण है, जहां उम्र नहीं बल्कि क्षमता को प्राथमिकता दी जा रही है। विश्व की सबसे मजबूत टी20 टीम में जगह बनाना स्वयं में बड़ी उपलब्धि है।  

वैभव ने सचिन तेंदुलकर के सबसे कम उम्र के भारतीय पदार्पण का रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिया, लेकिन केवल रिकॉर्ड तोड़ना ही महानता का प्रमाण नहीं होता। सचिन तेंदुलकर महान इसलिए बने, क्योंकि उन्होंने चौबीस वर्षों तक निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, इसलिए यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि भारत को दूसरा सचिन मिल गया है। प्रतिभा और महानता के बीच वर्षों की निरंतरता, अनुशासन, मानसिक मजबूती और परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता का लंबा सफर होता है। फिर भी वैभव को लेकर उत्साह का आधार ठोस है। अनुभवी, दिग्गज खिलाड़ियों ने भी उनकी बल्लेबाजी को केवल आक्रामक नहीं, बल्कि तकनीकी रूप से परिपक्व बताया है। उनका आक्रमण केवल ताकत पर आधारित नहीं, बल्कि गेंद की लंबाई जल्दी पढ़ने, पैरों के बेहतर उपयोग और शॉट चयन की समझ पर आधारित दिखाई देता है। यही गुण बड़े खिलाड़ियों को भीड़ से अलग करते हैं। सच है कि टी20 और टी10 के बढ़ते प्रभाव के बीच वैभव जैसे खिलाड़ियों के लिए अवसरों का दायरा लगातार बढ़ेगा, लेकिन लंबा करियर केवल छोटे प्रारूपों से नहीं बनता। महान खिलाड़ी वही कहलाते हैं, जो परिस्थितियों और प्रारूपों के अनुसार स्वयं को बदल सकें। यह मान लेना गलत होगा कि आक्रामक बल्लेबाज टेस्ट में सफल नहीं हो सकते। वीरेंद्र सहवाग इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।

यदि वैभव अपनी तकनीक को और परिष्कृत करें, ऑफ स्टंप के बाहर संयम विकसित करें तथा लंबी पारी खेलने का धैर्य रखें, तो वे तीनों प्रारूपों में सफल हो सकते हैं। आधुनिक टेस्ट क्रिकेट भी पहले की तुलना में कहीं अधिक सकारात्मक और आक्रामक हो चुका है। बिहार के छोटे शहर से निकलकर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट तक पहुंचने की उनकी यात्रा भारतीय क्रिकेट की सामाजिक क्रांति का भी प्रमाण है। बेहतर अकादमियां, डिजिटल विश्लेषण, आईपीएल का विशाल मंच, जिला स्तर पर बढ़ती प्रतियोगिताएं और आर्थिक अवसरों ने छोटे शहरों की प्रतिभाओं को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए महानगरों की मोहताज नहीं रही। भारतीय क्रिकेट के सामने भी जिम्मेदारी कम नहीं है। उसे वैभव को केवल सनसनी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखना होगा। उनके कार्यभार का वैज्ञानिक प्रबंधन, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान, घरेलू क्रिकेट से निरंतर जुड़ाव और तीनों प्रारूपों के लिए अलग-अलग विकास योजना बनाना आवश्यक होगा। उनकी शुरुआत असाधारण है, मंजिल अभी दूर है। यदि प्रतिभा के साथ धैर्य, अनुशासन और सही मार्गदर्शन जुड़ गया, तो भारतीय क्रिकेट को आने वाले दो दशकों के लिए केवल एक स्टार नहीं, बल्कि एक युगनिर्माता बल्लेबाज मिल सकता है।