संपादकीय : विश्वास का विस्तार
एक ऐसे समय में जब विश्व व्यवस्था भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति शृंखलाओं की अस्थिरता, ऊर्जा असुरक्षा और प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा से जूझ रही है, जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची की भारत यात्रा भारत और जापान ने अपने संबंधों को व्यापार से आगे बढ़ाकर आर्थिक सुरक्षा, रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हिंद-प्रशांत रणनीति तक विस्तारित करने का संकेत देती है। दोनों देशों द्वारा आर्थिक सुरक्षा का साझा रोडमैप, रक्षा उपकरणों के सह-विकास, उच्च प्रौद्योगिकी व्यापार, ऊर्जा सहयोग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित 16 समझौतों पर सहमति इसी का प्रमाण है।
प्रधानमंत्री मोदी का इस बैठक में यह कहना नितांत उचित है कि ‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’, भारत की ‘इंडो-पैसिफिक ओशन्स इनिशिएटिव’ और ‘महासागर’ जैसी अवधारणाएं हिंद-प्रशांत क्षेत्र को स्वतंत्र, खुला, नियम-आधारित और सभी देशों के लिए समान अवसर वाला समुद्री क्षेत्र बना देंगी, जिससे समुद्री मार्ग किसी एक शक्ति के प्रभुत्व का माध्यम नहीं रहेगा। यह दृष्टिकोण किसी देश के विरुद्ध औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, संपर्क, पर्यावरण संरक्षण और क्षेत्रीय स्थिरता का साझा ढांचा है। सैन्य उपकरणों के संयुक्त विकास तथा नौसैनिक संचार प्रणालियों पर जापानी सहयोग भारत की सामरिक क्षमता को नई दिशा देगा। जापान की उच्च स्तरीय सेंसर, समुद्री निगरानी और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों की विशेषज्ञता तथा भारत की विनिर्माण क्षमता और विशाल रक्षा बाजार का मेल आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देगा। हिंद-प्रशांत में प्रस्तावित जापानी नौसैनिक संचार एवं निगरानी प्रणालियां भारत के लिए समुद्री गतिविधियों की बेहतर जानकारी, जहाजों की निगरानी और आपदा अथवा सुरक्षा चुनौतियों के समय त्वरित प्रतिक्रिया में सहायक हो सकती हैं। पश्चिम एशिया की अस्थिरता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल तेल आयात पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, हरित हाइड्रोजन, एलएनजी, नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा परिवहन सुरक्षा तथा महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला पर भारत-जापान सहयोग भविष्य की ऊर्जा अर्थव्यवस्था का आधार बनेगी। उच्च प्रौद्योगिकी व्यापार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिज और आर्थिक सुरक्षा पर जापान की सहमति भारत के लिए खास है। जापान के पास उन्नत विनिर्माण, मशीन इंजीनियरिंग और गुणवत्ता प्रबंधन की उत्कृष्ट क्षमता है, जबकि भारत सॉफ्टवेयर, डिजिटल नवाचार और कुशल मानव संसाधन में अग्रणी है। दोनों अर्थव्यवस्थाएं प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यही कारण है कि जहाज निर्माण, विमानन, स्मार्ट विनिर्माण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में साझेदारी दोनों देशों को वैश्विक मूल्य शृंखला में अधिक प्रभावशाली बनाएंगी।
महज समझौते पर्याप्त नहीं होते। भारत-जापान संबंधों का पुराना अनुभव बताता है कि अनेक परियोजनाएं भूमि अधिग्रहण, नियामकीय प्रक्रियाओं, निवेश स्वीकृतियों और क्रियान्वयन की धीमी गति से प्रभावित हुई हैं। यदि 16 समझौतों को वास्तविक सफलता में बदलना है, तो केंद्र और राज्य सरकारों को परियोजनाओं के लिए समयबद्ध स्वीकृतियां, स्थिर नीतियां, कुशल कार्यबल, अनुसंधान सहयोग, निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी और निरंतर उच्चस्तरीय समीक्षा सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही पर्यावरणीय संतुलन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को भी समान महत्व देना होगा। यदि घोषित समझौतों को समयबद्ध ढंग से धरातल पर उतारा गया, तो भारत और जापान के बीच हुई यह नई साझेदारियां आने वाले दशक में भारत की आर्थिक, सामरिक, स्वच्छ ऊर्जा और तकनीकी शक्ति को नई ऊंचाई देने वाली सिद्ध हो सकती है।
