संपादकीय : तनाव की वापसी
अमेरिका और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम यदि दस दिन के भीतर ही गंभीर सैन्य टकराव में बदलने लगे, तो यह केवल दो देशों के बीच तनाव नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की अस्थिरता का संकेत है। अमेरिका ने ईरानी सैन्य ठिकानों पर नए हवाई हमले किए, जबकि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों और क्षेत्रीय लक्ष्यों पर। यदि बहरीन, कुवैत या अन्य खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी अड्डे लगातार लक्ष्य बनते हैं, तो युद्ध का दायरा स्वतः इन देशों तक फैलने का खतरा बढ़ जाएगा।
ध्यातव्य है कि अमेरिका-ईरान और इज़राइल-हिज़्बुल्लाह के संघर्ष परस्पर जुड़े अवश्य हैं, पर दोनों पूर्णतः एक ही युद्ध विराम व्यवस्था के अधीन नहीं हैं, इसलिए किसी एक मोर्चे पर हिंसा दूसरे मोर्चे को भी अस्थिर कर देती है। ट्रंप का यह बयान कि यदि ईरान युद्ध विराम तोड़ता रहा तो ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान का अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है’, अत्यंत गंभीर और अस्थिरता बढ़ाने वाला बयान है। किसी भी संप्रभु राष्ट्र के अस्तित्व पर सार्वजनिक धमकी अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की भाषा नहीं मानी जाती और इससे समझौते की संभावनाएं कमजोर होती हैं।
ईरान होर्मुज को खोल भले दे, लेकिन उस पर अपना नियंत्रण नहीं छोड़ेगा। वह यहां के समुद्री यातायात पर कड़े नियम लागू करने की कोशिश करेगा। ऐसे में होर्मुज पर समझौता दूर की कौड़ी है, इसलिए जब तक सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक समझौते पर स्थायी सहमति नहीं बनती, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर अनिश्चितता बनी रहेगी। ईरान की परमाणु सुविधाओं की अंतर्राष्ट्रीय जांच पर अमेरिकी जिद बेकार है, ईरान इसके लिए कभी राजी नहीं होगा। अमेरिका, ईरान पर लगे प्रतिबंधों में राहत दे भी तो 28 लाख करोड़ के मुआवजे को ले कर पेच है। खाड़ी के किसी देश ने इसमें सहयोग की सहमति नहीं जताई है और उनके अनुसार वे ईरान के हमले से नुकसान उठा चुके हैं।
असल में मुआवजे के हकदार तो वे हैं। वे एक ऐसे युद्ध का मुआवजा क्यों दें, जो उन्होंने छेड़ा ही नहीं। जब तक उन्हें सुरक्षित भविष्य की गारंटी नहीं मिलती, वे मुआवजा नहीं देंगे। असल में क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों की भूमिका और होर्मुज़ की सुरक्षा- ये सभी मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन्हीं पर दोनों पक्षों के बीच सबसे गहरे मतभेद हैं, इसलिए यह मान लेना कि शीघ्र ही स्थायी युद्ध विराम हो जाएगा, यथार्थवादी नहीं होगा। स्थायी शांति तभी संभव है, जब दोनों पक्ष अपनी अधिकतम मांगों से पीछे हटने को तैयार हों, जिसकी संभावना नहीं दिखती और मौजूदा हालात ने युद्ध विराम अथवा स्थायी शांति की उम्मीदों को और धुंधला कर दिया है।
भारत के लिए इस संकट का सबसे उपयुक्त मार्ग वही है, जो उसकी पारंपरिक विदेश नीति का आधार रहा है— रणनीतिक संतुलन। भारत को किसी सैन्य ध्रुव का हिस्सा बनने के बजाय संवाद, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता और अंतर्राष्ट्रीय कानून पर जोर देना चाहिए। साथ ही तेल आयात के स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का सुदृढ़ीकरण और भारतीय नागरिकों व समुद्री व्यापार की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पश्चिम एशिया में स्थिरता केवल क्षेत्रीय आवश्यकता नहीं, भारत की ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा प्रश्न है।
