बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की बढ़ती भूमिका
भारतीय सरकारी बॉन्ड वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक सुलभ हुए हैं। नतीजे में दुनिया भर के केंद्रीय बैंक और वैश्विक एसेट मैनेजर भारतीय ऋण बाजार की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ
भारत में निवेश की चर्चा होते ही अधिकांश लोगों के मन में शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड और बैंक एफडी का विचार आता है, लेकिन भारतीय वित्तीय प्रणाली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा ऐसा भी है, जो वर्षों से अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा है। यह हिस्सा है भारत का बॉन्ड या ऋण बाजार। आज यह बाजार एक ऐसे ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जो आने वाले वर्षों में सरकार, उद्योग, निवेशकों और संपूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
हाल के वर्षों में भारतीय सरकारी बॉन्ड वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक सुलभ हुए हैं। भारत के कुछ सरकारी बॉन्ड प्रमुख वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में शामिल किए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप दुनिया भर के पेंशन फंड, बीमा कंपनियां, सॉवरेन वेल्थ फंड, केंद्रीय बैंक और वैश्विक एसेट मैनेजर भारतीय ऋण बाजार की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यह केवल विदेशी पूंजी का प्रवाह नहीं है, बल्कि भारतीय वित्तीय बाजार के वैश्वीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
विभिन्न अनुमानों के अनुसार भारत का कुल बॉन्ड बाजार 230 से 250 लाख करोड़ रुपये से अधिक का माना जाता है। इसमें सरकारी प्रतिभूतियों का हिस्सा सबसे बड़ा है, जबकि कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार भी धीरे-धीरे विस्तार कर रहा है। इसके बावजूद भारतीय बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी अभी भी कई विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अपेक्षाकृत कम है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे भारत के वित्तीय क्षेत्र का अगला बड़ा अवसर मान रहे हैं।
भारत के सरकारी बॉन्ड पहले ही JPMorgan Government Bond Index-Emerging Markets तथा Bloomberg Emerging Market Local Currency Index जैसे प्रमुख वैश्विक सूचकांकों में शामिल हो चुके हैं, हालांकि कुछ अन्य वैश्विक सूचकांकों में पूर्ण शामिलीकरण की प्रक्रिया अभी भी विभिन्न परिचालन और नियामकीय सुधारों पर निर्भर है। फिर भी यह स्पष्ट है कि भारत वैश्विक ऋण निवेशकों के लिए तेजी से एक महत्वपूर्ण गंतव्य बनता जा रहा है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों की बढ़ती भागीदारी का सबसे पहला प्रभाव बॉन्ड की मांग पर पड़ता है। जब किसी बॉन्ड को खरीदने वाले निवेशकों की संख्या बढ़ती है, तो उसकी कीमत बढ़ती है और उसकी यील्ड अर्थात प्रतिफल दर कम हो जाती है। इस स्थिति से सरकार और कंपनियों दोनों को लाभ मिल सकता है, क्योंकि उन्हें अपेक्षाकृत कम लागत पर पूंजी जुटाने का अवसर प्राप्त होता है।
यदि सरकार की उधारी लागत पर सकारात्मक दबाव पड़ता है, तो आधारभूत संरचना, रेल, सड़क, ऊर्जा, जल प्रबंधन और विनिर्माण क्षेत्र में निवेश को गति मिल सकती है। भारत अगले कुछ वर्षों में दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में विकास परियोजनाओं के लिए दीर्घकालिक पूंजी की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। एक मजबूत बॉन्ड बाजार इस आवश्यकता को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस परिवर्तन का प्रभाव केवल सरकार या कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा।
म्यूचुअल फंड निवेशकों को भी इसका लाभ मिल सकता है। विशेष रूप से गिल्ट फंड, टारगेट मैच्योरिटी फंड, कॉर्पोरेट बॉन्ड फंड और भारत बॉन्ड ईटीएफ जैसे निवेश साधनों में निवेश करने वालों के लिए यह सकारात्मक अवसर हो सकता है। यदि बॉन्ड यील्ड में गिरावट आती है, तो पहले से जारी बॉन्ड की कीमतों में वृद्धि होती है, जिससे कई डेट फंडों के एनएवी में सुधार देखने को मिल सकता है।
विदेशी पूंजी प्रवाह का एक अन्य संभावित प्रभाव भारतीय रुपये पर पड़ सकता है, जब विदेशी निवेशक भारतीय बॉन्ड खरीदते हैं, तो उन्हें रुपये की आवश्यकता होती है, जिससे भारतीय मुद्रा की मांग बढ़ती है, हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि इससे रुपया अनिवार्य रूप से मजबूत होगा, क्योंकि मुद्रा की दिशा तेल कीमतों, व्यापार घाटे, वैश्विक डॉलर प्रवृत्तियों और भारतीय रिजर्व बैंक की नीतियों सहित अनेक कारकों पर निर्भर करती है।
फिर भी विदेशी निवेश प्रवाह रुपये पर दबाव कम करने और बाहरी स्थिरता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है, लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विदेशी निवेश अवसरों की तलाश में आता है और जोखिम बढ़ने पर तेजी से बाहर भी निकल सकता है। यदि अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंका पैदा होती है या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो विदेशी निवेशक भारतीय बॉन्ड बाजार से धन निकाल सकते हैं। ऐसी स्थिति में बॉन्ड कीमतों में गिरावट और यील्ड में वृद्धि देखी जा सकती है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
