भारत की विरासत पर बड़ा सवाल: 5000 साल पुरानी सभ्यता के बावजूद राष्ट्रीय धरोहर स्थलों की नई सूची क्यों नहीं?
भारत की हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक विरासत के बावजूद राष्ट्रीय धरोहर स्थलों के व्यापक दस्तावेजीकरण की मांग उठ रही है। लेख में नए सर्वे, 'नेशनल रजिस्टर ऑफ हेरिटेज साइट्स' और ऐतिहासिक, धार्मिक व प्राकृतिक स्थलों को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
अयोध्याः ऐसा कैसे हो गया कि भारत जैसा देश, जिसका 5000 साल से भी पुराना इतिहास और समृद्ध विरासत रही है, वह धरोहर स्थलों के मामले में अमेरिका जैसे देश से बुरी तरह पिछड़ गया, जिसका कुल इतिहास मुश्किल से तीन सौ साल पुराना है। इस पिछड़ेपन के पीछे की सच्चाई क्या है? जब विकास के आधुनिक संकेतकों जैसे पुल, अस्पताल, स्टेडियम और कल कारखानों की बात हो, तो हमें आश्चर्य नहीं होता। यदि कोई कहे कि हम इन मामलों में अमेरिका जैसे विकसित देशों से बहुत पीछे हैं, लेकिन बात तब हजम नहीं होती, जब कोई कहे कि भारत ऐतिहासिक धरोहर स्थलों के मामले में भी ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता। मन में तुरंत सवाल उठता है कि ऐसा कैसे हो सकता है बात बड़ी सीधी है। देश के धरोहर स्थल, जो हमारे चारों ओर बहुतायत में फैले हैं, उन्हें सूचीबद्ध करने का हमने कोई व्यवस्थित प्रयास ही नहीं किया। यह एक बहुत बड़ी विडंबना है कि आजादी के 70 साल बाद भी हमने कुछ नहीं किया। अंग्रेजों की बनाई सूची को हम किसी धार्मिक ग्रंथ की तरह पवित्र मानकर बैठ गए। हमने अपनी इतिहास और परंपरा के अनुरूप देश के धरोहर स्थलों की राष्ट्रीय सूची बनाने का प्रयास ही नहीं किया, जब धरोहर स्थलों की सूची की बात आएगी, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि हम अभी भी ब्रिटिश राज में ही जी रहे हैं।
हनुमानगढ़ी
अयोध्या की प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर 18 वीं शताब्दी में बनाया गया था। इस स्थान का इतिहास त्रेता युग से जुड़ा है। लंका विजय के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे, तो उन्होंने बजरंग बली को अयोध्या की रक्षा करने का आदेश दिया था, तब हनुमानजी एक गुफा में निवास करते थे। बाद में किले के रूप में हनुमानगढ़ी का निर्माण कराया गया।
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गुलाबबाड़ी और बहू बेगम मकबरा
फैजाबाद स्थित गुलाबबाड़ी का इतिहास भी 18वीं शताब्दी से जुड़ा है। इसे अवध के तीसरे नवाब ने बनवाया था। यह केवल स्मारक नहीं है, उस समय की उत्कृष्ट स्थापत्य कला, सुसज्जित उद्यान शैली और सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक है। इसी तरह बहू बेगम मकबरे का निर्माण 18 वीं शताब्दी में अवध की बेगम उम्मतुज्जोहरा की याद में बनाया गया था। इसे पूरब का ताजमहल कहते हैं।
समकालीन होने के बावजूद सूची में अंतर
हनुमानगढ़ी और गुलाबबाड़ी दोनों लगभग 18 वीं शताब्दी के हैं, लेकिन गुलाबबाड़ी सूची में शामिल है। वहीं हनुमानगढ़ी उस सूची में शामिल नहीं है। ऐसे दर्जनों स्थान हैं, जो सूची में शामिल नहीं हैं।
विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष से जुड़े स्थानों और स्मारकों की अनदेखी
हल्दीघाटी का मैदान, जहां राणा प्रताप ने अकबर का लोहा लिया, जहां गुरु तेगबहादुर जी ने अपना शीशदान दिया, चमकौर का यह स्थान जहां 40 सिखों ने वीरगति प्राप्त की, ऐसे ही अनगिनत स्थान हैं, जो हर दृष्टि से राष्ट्रीय धरोहर स्थल घोषित किए जाने के योग्य हैं, लेकिन दुर्भाग्य है कि इन्हें राष्ट्रीय धरोहर स्थल का दर्जा नहीं दिया गया है। 1857 की लड़ाई की याद में सैकड़ों स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची में हैं, लेकिन ये सभी अंग्रेज सैनिकों के सम्मान में हैं। भारतीय सेनानियों की याद में कुछ ढूंढे भी नहीं मिलता है। फतेहपुर का वह इमली का पेड़, जहां 1858 में अंग्रेजों ने 52 स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी पर लटका दिया, झारखंड के वे स्थान जहां तिलका मांझी, सिधो-कान्हू और बिरसा मुंडा ने अपने प्राणों की आहुति दी, बाबू कुंवर सिंह की याद दिलाता उनका खंडहर घर और ऐसे ही अनगिनत स्थानों को हमने अब तक राष्ट्रीय धरोहर स्थल क्यों नहीं माना?
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सूची में उपेक्षित अयोध्या, मथुरा और काशी
अयोध्या, मथुरा और काशी देश के साथ सभ्यता की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन शहरों की विरासत धरोहर स्थलों की सूची को मौजूदगी के सापेक्ष न के बराबर कहा जा सकता है। मथुरा में कुल 44 स्थान हैं। इनमें कुछ मंदिर हैं। वाराणसी में अब कुल 17 स्थान है, लेकिन अयोध्या में केवल छह स्थान इस सूची में शामिल हैं। इनमें तीन टीले पहला मणि पर्वत, कुबेर पर्वत और सुग्रीव पर्वत, दूसरा बेनी खानम का मकबरा, तीसरा गुलाबबाड़ी, चौथा बहू बेगम मकबरा, पांचवा हाजी इकबाल का मकबरा और परिसर और अंतिम शुजाउद्दौला का मकबरा है। अयोध्या आज से नहीं अतीत से मंदिरों की नगरी रही है, जबकि यहां के कई मंदिर कई सौ साल पुराने हैं। श्रीराम जन्मभूमि, हनुमानगढ़ी, त्रेता नाथ मंदिर, बड़ी जगह दशरथ महल, राजद्वार, श्री नागेश्वर नाथ, लक्ष्मण मंदिर शेषावतार,रंगमहल, रत्न सिंहासन राजगद्दी, छोटी देवकाली, लक्ष्मण किला, सदगुरू सदन गोलाघाट, हनुमत निवास, हनुमत सदन, तपस्वी जी की छावनी, श्री मणिराम जी की छावनी, कालेराम मंदिर, तुलसीदास जीकी छावनी, तीन कलश तिवारी मंदिर जैसे कई ऐसे मंदिर हैं, जो कई सौ साल से अपनी आभा बिखेर रहे हैं, लेकिन सूची में इनका नामो निशान नहीं है। यह तब है, जब सभ्यता और संस्कृति ने यहीं जन्म लिया, लेकिन अयोध्या का एक भी मंदिर इस सूची में नहीं है। पुरातत्व की दृष्टि इसे उपेक्षित ही नहीं घोर उपेक्षित कहा जा सकता है।
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इस्लामी एवं ब्रिटिश स्मारकों को विशेष महत्व
भारत के हजारों साल के इतिहास में इस्लामी और ब्रिटिश शासनकाल की अवधि मुश्किल से एक हजार वर्ष रही। वह भी पूरे भारत में नहीं रही। ऐसा कभी नहीं हुआ कि पूरा भारत सीधे तौर पर इस्लामी या ब्रिटिश शासन के अधीन हो गया हो। इसके बावजूद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची में अधिकतर स्थान इस्लामी और ब्रिटिश शासनकाल से ही जुड़े हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची पर इस्लामी और ब्रिटिश शासनकाल के अत्यधिक प्रभाव को दर्शाने के लिए बनारस का उदाहरण देखने लायक है। हिंदुओं के इस प्राचीन शहर में पुराने मंदिरों और उनके अवशेषों की भरमार है, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने बनारस के जिन 20 स्थानों को अपनी सूची में शामिल किया है, उसमें एक भी मंदिर नहीं है, जबकि 20 चयनित स्थानों में अंग्रेजों की पांच कब्रगाहें, एक मस्जिद, एक मकबरा और अन्य स्थान शामिल है।
प्राकृतिक स्थलों को कोई मान्यता नहीं
यूनेस्को ने जिन विश्व धरोहर स्थलों की सूची बनाई है, उनमें विशिष्ट प्राकृतिक स्थलों जैसे उत्तराखंड में फूलों की घाटी के साथ-साथ बंगाल, असम और राजस्थान के अभयारण्य शामिल किए गए हैं, लेकिन हमने ऐसी कोई राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर सूची नहीं बनाई, जिनमें विशिष्ट जलस्रोतों, वनों, पर्वतों एवं अन्य महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्थलों को शामिल किया गया हो। जब केवल ईंट और पत्थर से बने स्मारकों को महत्व दिया जाएगा, तब भारत के वनाच्छादित क्षेत्र जैसे झारखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के राज्य पिछड़ जाएंगे, लेकिन प्राकृतिक धरोहर स्थलों के मामले में ये राज्य अन्य राज्यों से बहुत आगे साबित होंगे।
परंपरा का प्रतिनिधित्व की आवश्यकता
जितनी समस्याओं का जिक्र किया गया है, उनका समाधान बड़ा सीधा है। वास्तव में हमें अपने धरोहर स्थलों की एक बिल्कुल नई सूची तैयार करनी होगी, एक ऐसी सूची जो हमारे इतिहास और हमारी परंपरा का सही मायने में प्रतिनिधित्व करे। इस सूची में उन सभी स्थानों और स्मारकों को शामिल किया जाना चाहिए, जो हमें अपनी प्राचीन सभ्यता से जोड़कर रखने में मदद करते हों। इस नई सूची के कई फायदे हैं। मसलन हमारी राष्ट्रीय पहचान मजबूत होगी। इनके संरक्षण में मदद मिलेगी। उनकी निगरानी संभव बनेगी। पर्यटन को भरपूर प्रोत्साहन मिलेगा। इतिहास को विकृत करने के प्रयास कमजोर होंगे। लोग समझदार और सहनशील होंगे।
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मान्यताओं से जुड़े स्थानों का कोई स्थान नहीं
भारत के चप्पे-चप्पे से ऋषि-मुनियों एवं पौराणिक पात्रों का जुड़ाव रहा है। अति प्राचीन होने के कारण इस जुड़ाव को साबित करने के लिए किसी प्राचीन इमारत के अवशेष प्रायः नहीं मिलते, लेकिन लोक परंपरा में रखा है। यदि इमारत को छोड़ दें, तो ऐसे कई बातें हैं, जिनसे इन स्थानों की प्राचीनता सिद्ध होती है। कर्नाटक में कोप्पल जिले में स्थित किष्किंधा पर्वत, हरियाणा में कुरुक्षेत्र का युद्ध स्थल, अयोध्या में रामजन्मभूमि, मथुरा में गोवर्धन पर्वत, आजमगढ़ में दुर्वासा ऋषि का आश्रम ऐसे न जाने कितने स्थान हैं, जिन्हें हम अपनी धरोहर का अटूट हिस्सा मानते हैं। दुर्भाग्य वश इन्हें हमारे राष्ट्रीय धरोहर स्थलों की सूची में शामिल नहीं किया गया है।
राष्ट्रीय स्मारक तथा पुरावशेष मिशन
इस पर काम करने के लिए साल 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने राष्ट्रीय स्मारक तथा पुरावशेष मिशन के गठन का निर्देश दिया। साल 2007 में गठित हुआ। 2012 में पूरा काम करने के लिए कहा गया, लेकिन मिशन अपना काम पूरा नहीं कर पाया।
काशी में दो हजार से ज्यादा धरोहर स्थल चिह्नित
दिल्ली के रहने वाले विमल कुमार सिंह ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के साथ मिलकर काशी में एक पायलट प्रोजेक्ट पर काम किया। नौ साल में पूरे हुए इस प्रोजेक्ट के तहत काशी में दो हजार से ज्यादा धरोहर स्थलों को चिंहित किया गया।
नेशनल रजिस्टर ऑफ हेरिटेज साइट्स की जरूरत
अपने पायलट प्रोजेक्ट को पूरा करने के बाद देश की धरोहरों को सहेजने के लिए विमल कुमार सिंह ने नेशनल रजिस्टर ऑफ हेरिटेज साइट्स की जरूरत बताई। यह रजिस्टर भारत के समृद्ध इतिहास और परंपरा को सही अर्थो में अभिव्यक्ति प्रदान करे।
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धरोहर स्थल की विस्तृत परिभाषा की जरूरत
पायलट प्रोजेक्ट के बाद विमल कुमार सिंह ने धरोहर स्थल की विस्तृत परिभाषा की जरूरत महसूस की। उन्होंने अपने मंतव्य में कहा कि धरोहर स्थलों की हमें एक ऐसी परिभाषा पर सहमत होना चाहिए, जो एक सनातन सभ्यता के रूप में हमारे अस्तित्व को आधार प्रदान करे। इसके लिए हमें अंग्रेजों की बनाई संकुचित परिभाषा से बाहर निकलना चाहिए। एक स्वतंत्र देश और एक प्राचीन सभ्यता के वारिस के रूप में हमें धरोहर स्थल के रूप में ऐसे स्थानों को स्वीकार करना चाहिए।
-वे सभी स्थान या स्मारक, जिन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया है। हमें किसी चयनित स्थान को सूची से हटाने की जरूरत नहीं है।
-वे सभी स्थान या स्मारक, जिन्हें राज्य सरकारों ने राज्य द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया है।
-वे स्थान जो किसी प्रमुख ऐतिहासिक घटना जैसे युद्ध या किसी विशिष्ट आयोजन आदि के गवाह रहे हैं। जैसे हल्दी घाटी का मैदान, फतेहाबाद का वह ईमली का पेड़, जहां 52 स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दी गई आदि।
-लोक स्मृति से जुड़े स्थान, जिनका संबंध किसी पौराणिक घटना या व्यक्ति से बताया जाता है। जैसे किष्किंधा पर्वत जहां राम और सुग्रीव के बीच मित्रता हुई थी, कुरुक्षेत्र जहां महाभारत का युद्ध हुआ था आदि। जिन स्थानों पर लोग पारंपरिक रूप से निश्चित तिथि में मेला लगाकर या कोई उत्सव मनाकर इकट्ठा होते हैं, उन पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
-कोई भी स्मारक या ढांचा, जो हमारे इतिहास की किसी प्रमुख घटना, व्यक्ति या कालखंड से जुड़ा रहा है या जो अतीत की किसी कला शिल्प या जीवनशैली को समझने में मदद करता हो।
-सौ साल के भीतर बना हुआ कोई ढांचा या स्मारक, जिसका निर्माण किसी प्राचीन पद्धति से किया गया हो या जो अपनी असाधारण विशिष्टता के कारण स्थान विशेष की पहचान का हिस्सा बन गया हो। इस श्रेणी में हम दिल्ली स्थित अक्षरधाम, बिड़ला मंदिर आदि को भी एक धरोहर स्थल मान सकते हैं।
-विशिष्ट प्राकृतिक या भौगोलिक स्थान, जो सैकड़ों वर्ष से अस्तित्व में हैं और अपने आप में दुर्लभ है।

प्रधानमंत्री को सौंपा पत्र
पायलट प्रोजेक्ट करने वाले विमल कुमार सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भेजा। पत्र में उन्होंने बताया कि दुनिया के सभी सभ्य देश अपने धरोहर स्थलों की आधिकारिक सूची बनाते हैं। यह सूची उनकी सांस्कृतिक पहचान को एक औपचारिक स्वरूप और गरिमा प्रदान करती है। इसलिए भारत के धरोहर स्थलों को सहेजने के लिए नए सिरे से सर्वे के साथ गंभीर काम की आवश्यकता बताई।
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