बांग्लादेश ने बढ़ाई भारत की चिंता

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
On

2024 में आवामी लीग की मुखिया शेख हसीना के सत्ता से बेदखल होने के साथ ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में तल्खी का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है।

NAVEEN
नवीन गुप्ता, बरेली

बांग्लादेश की सत्ता में बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान की ताजपोशी के बाद नई दिल्ली को उम्मीद थी कि ढाका के साथ रिश्तों का एक नया और सकारात्मक अध्याय शुरू होगा, लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। बांग्लादेश अब रणनीतिक रूप से पूरी तरह चीन के पाले में खड़ा दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच बढ़ती कूटनीतिक नजदीकियां और नए समझौते न केवल भारत की बाहरी सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा हैं, बल्कि द्विपक्षीय व्यापारिक हितों को भी गहरी चोट पहुंचा रहे हैं।

इसके साथ ही बांग्लादेश की धरती पर फिर से पनपता कट्टरपंथ और भारत विरोधी माहौल हमारी आंतरिक शांति के लिए आने वाले समय में बड़ी बाधा बन सकता है, हालांकि कूटनीतिक मर्यादा के तहत भारत सरकार ने अभी भी रिश्ते सुधारने की उम्मीद नहीं छोड़ी है और लगातार प्रयास जारी हैं। साल 2024 में आवामी लीग की मुखिया शेख हसीना के सत्ता से बेदखल होने के साथ ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में तल्खी का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है।

शेख हसीना के लंबे कार्यकाल के दौरान दोनों देशों के रिश्ते बेहद मजबूत रहे और यही वजह थी कि उस दौर में वहां अमेरिका, चीन या पाकिस्तान जैसे देशों की दाल नहीं गल पाती थी। हसीना अपने फैसले हमेशा बांग्लादेश और भारत के साझा हितों को ध्यान में रखकर लेती थीं, जिससे अमेरिका और चीन जैसे देश उनसे लगातार चिढ़ते रहे। 

कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि सेंट मार्टिन द्वीप जैसे मुद्दों पर अपनी संप्रभुता न छोड़ने के कारण ही अमेरिका ने वहां हसीना के खिलाफ पर्दे के पीछे से तख्तापलट का खेल रचा। हसीना के बाद अंतरिम सरकार के मुखिया बने मोहम्मद यूनुस ने न सिर्फ भारत विरोधी फैसले लिए, बल्कि पाकिस्तान के साथ रक्षा सौदों और सैनिकों के प्रशिक्षण को लेकर समझौते भी कर लिए। भारत के सबसे संवेदनशील हिस्से यानी ‘चिकन नेक’ (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) को घेरने के लिए पाकिस्तान और चीन के साथ कूटनीतिक नींव उन्होंने ही रखी थी। 

चुनाव के बाद जब तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने, तो कूटनीतिक सुधारों की उम्मीद जगी, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है और आज ढाका की हुकूमत भारत की सुरक्षा को जोखिम में डालने वाले फैसले और तेजी से ले रही है। बांग्लादेश ने भारत की आपत्तियों को दरकिनार कर तीस्ता नदी जल प्रबंधन परियोजना के लिए चीन से तकनीकी और आर्थिक सहयोग मांग लिया है। चीन तो लंबे समय से वहां पैर जमाने की फिराक में था, जो उसे इस प्रोजेक्ट के बहाने मिल गया। 

तीस्ता नदी सिक्किम से निकलती है और इसके जल बंटवारे को लेकर भारत-बांग्लादेश में पुराना विवाद है, ऐसे में अब इसमें तीसरे पक्ष के रूप में चीन की एंट्री भारत की क्षेत्रीय कूटनीति को कमजोर करेगी। सबसे बड़ा खतरा यह है कि चीन इस परियोजना के बहाने अपने जिन तकनीकी विशेषज्ञों को वहां तैनात करेगा, वे भारत के ‘चिकन नेक’ की गतिविधियों पर सीधे और पर पैनी नजर रखेंगे। इतना ही नहीं, बांग्लादेश ने भारत को एक और बड़ा आर्थिक और रणनीतिक झटका देते हुए अपने मोंगला बंदरगाह को चीन के हवाले करने का फैसला किया है, जहां बीजिंग अब ‘स्पेशल इकोनॉमिक जोन’ विकसित करेगा। 

गौरतलब है कि साल 2015 में भारत ने मोंगला पोर्ट के विकास के लिए बांग्लादेश के साथ समझौता किया था, जिसका काम भारत के हिरानंदानी ग्रुप को सौंपना तय हुआ था, लेकिन साल 2025 में मोहम्मद यूनुस की सरकार ने यह प्रोजेक्ट भारत से छीन लिया और अब तारिक रहमान ने उसी भारत विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए इसे आधिकारिक तौर पर चीन को सौंप दिया है।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के महत्वाकांक्षी ‘बांग्लादेश-म्यांमार-चीन आर्थिक गलियारे’ के प्रस्ताव को तारिक रहमान सरकार ने लगभग स्वीकार कर लिया है। इस गलियारे के जरिए चीन भारत को रणनीतिक रूप से चारों तरफ से घेरना चाहता है, जिसमें तारिक रहमान एक मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं। इस कॉरिडोर से न केवल भारत की बल्कि अमेरिका की चिंताएं भी बढ़ेंगी, क्योंकि वाशिंगटन ने जिस मकसद से हसीना का तख्तापलट होने दिया, वह फेल हो गया है और चीन वहां अपनी जड़ें पूरी तरह मजबूत कर बड़े आर्थिक पैकेज का एलान कर रहा है। 

इस बीच, भारत ने सद्भावना के तौर पर बांग्लादेशी नागरिकों के लिए टूरिस्ट वीजा सेवा फिर से बहाल कर दी है, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर इसे संबंधों को पटरी पर लाने वाली कोई ठोस पहल नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत, बांग्लादेश सरकार चाहती है कि भारत पश्चिम बंगाल से बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजना बंद करे, लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण से भारत में ऐसा होना फिलहाल संभव नहीं है, क्योंकि पश्चिम बंगाल की राजनीति में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा बेहद संवेदनशील रहा है। वर्तमान में राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और केंद्र सरकार इस रुख पर कायम हैं कि अवैध घुसपैठियों को वापस भेजा जाएगा और अब तक 4800 से अधिक घुसपैठियों को डिपोर्ट भी किया जा चुका है। 

बांग्लादेश की संसद और वहां के कट्टरपंथी दल अब इस मुद्दे पर भारत के खिलाफ जमकर जहर उगल रहे हैं। इतिहास खुद को दोहरा रहा है। तारिक रहमान की मां बेगम खालिदा जिया ने भी अपने प्रधानमंत्रित्व काल में हमेशा भारत के हितों की अनदेखी की थी और पाकिस्तान-चीन की शह पर काम किया था। आज उनके पुत्र भी उसी राह पर चल पड़े हैं। ऐसे में भारत को अपनी पूर्वी सीमा की सुरक्षा और कूटनीति को लेकर अत्यंत सतर्क रहने की जरूरत है।

संबंधित समाचार