क्या यही शिक्षा का भविष्य है!
NEET की पुनर्परीक्षा सफलता के साथ संपन्न हो गई, लेकिन क्या निष्पक्षता की यह कीमत युवाओं की गरिमा और मानसिक शांति से वसूली जानी चाहिए?
21 जून 2026 को नीट-यूजी की पुनर्परीक्षा समाप्त हुई। परीक्षा केंद्रों से बाहर निकलते लाखों विद्यार्थियों के चेहरों पर राहत थी, लेकिन आंखों में एक अनकहा बोझ भी झलक रहा था। देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं में शामिल इस परीक्षा को अभूतपूर्व सुरक्षा घेरे में आयोजित किया गया। 22 लाख से अधिक अभ्यर्थियों, 95 हजार परीक्षा कक्षों, 1.38 लाख सीसीटीवी कैमरों, 51 हजार जैमरों, हजारों बायोमेट्रिक कर्मचारियों और कड़ी फ्रिस्किंग के बीच परीक्षा शांतिपूर्वक संपन्न हुई। पेपर लीक की आशंकाएं लगभग समाप्त रहीं और परिणामों पर विश्वास बहाल होने की उम्मीद जगी। इस सफलता के बीच एक सवाल खड़ा है— क्या निष्पक्षता की यह कीमत हमारी युवा पीढ़ी की गरिमा और मानसिक शांति से वसूली जानी चाहिए?
पिछले वर्षों में बार-बार हुए पेपर लीक ने परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाई है। मई 2026 की घटना के बाद सरकार और एनटीए ने पूरे तंत्र को लगभग रीसेट कर दिया। प्रश्न-पत्र तैयार करने से लेकर उनके परिवहन तक अभूतपूर्व गोपनीयता बरती गई। रिपोर्ट्स के अनुसार कुछ स्थानों पर भारतीय वायुसेना की सहायता से प्रश्न-पत्र पहुंचाए गए, जीपीएस ट्रैकिंग, पुलिस एस्कॉर्ट और एआई आधारित निगरानी तंत्र सक्रिय किए गए।
राष्ट्रीय, राज्य और मंत्रालय स्तर पर रियल-टाइम मॉनिटरिंग हुई। हजारों पर्यवेक्षक, साइबर निगरानी दल और खुफिया एजेंसियों का त्रिस्तरीय सुरक्षा नेटवर्क परीक्षा की हर गतिविधि पर नजर रखे रहा। यह व्यवस्था किसी शैक्षणिक आयोजन से अधिक एक राष्ट्रीय सुरक्षा अभियान जैसी प्रतीत होती थी। निष्पक्षता किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की आत्मा है और उसे बचाने के लिए कठोर कदमों का औचित्य स्वीकार किया जा सकता है, किंतु हर सफलता कुछ ऐसे प्रश्न भी छोड़ जाती है, जिन्हें केवल आंकड़ों और प्रशंसा से ढका नहीं जा सकता।
सबसे बड़ा प्रश्न उस अनुभव का है, जिससे विद्यार्थी गुजरे। आधार आधारित फेस रिकग्निशन, फिंगरप्रिंट सत्यापन, जेबों, कानों, जूतों और यहां तक कि कपड़ों की चेन, जिप तथा धागों तक की जांच— यह सब उस युवा पीढ़ी के साथ हुआ, जो डॉक्टर बनने का सपना लेकर परीक्षा केंद्र पहुंची थी। 38,795 फ्रिस्किंग कर्मी और 48,448 बायोमेट्रिक कर्मचारी व्यवस्था की आवश्यकता रहे होंगे, लेकिन विद्यार्थियों के मन में यह अनुभव भी दर्ज हुआ कि उन पर पहले संदेह किया गया, बाद में विश्वास। कई अभ्यर्थियों ने स्वयं को अपराधियों की तरह टटोला जाता महसूस किया। यह भावना किसी परीक्षा की सफलता का हिस्सा नहीं होनी चाहिए।
इस पूरी प्रक्रिया का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। विशेषकर छात्राओं के लिए फ्रिस्किंग कई बार असहजता और तनाव का कारण बनी। यद्यपि महिला कर्मियों की नियुक्ति की गई थी, फिर भी मानसिक दबाव पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका। माता-पिता दूर खड़े अपने बच्चों को डिजिटल और भौतिक निगरानी के घेरे में प्रवेश करते देखते रहे। शिक्षा का मंदिर कई स्थानों पर सुरक्षा चौकी जैसा दिखाई देने लगा। यह दृश्य केवल परीक्षा व्यवस्था का नहीं, बल्कि उस सामाजिक अविश्वास का भी प्रतीक है, जो धीरे-धीरे संस्थाओं और नागरिकों के बीच बढ़ता जा रहा है। जब एक छात्र परीक्षा देने से पहले स्वयं को संदिग्ध साबित होने से बचाने की प्रक्रिया से गुजरता है, तब कहीं न कहीं शिक्षा का मूल उद्देश्य भी आहत होता है।
समस्या का मूल कारण विद्यार्थी नहीं हैं। समस्या उस व्यवस्था में है, जिसने पेपर लीक, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक कमजोरियों को पनपने दिया। यदि परीक्षा प्रणाली पारदर्शी, जवाबदेह और तकनीकी रूप से मजबूत होती, तो शायद इतनी कठोर सुरक्षा की आवश्यकता न पड़ती। राधाकृष्णन समिति की सिफारिशें, कंप्यूटर आधारित परीक्षा प्रणाली की ओर संक्रमण, उन्नत डिजिटल सुरक्षा उपाय तथा एनटीए में संरचनात्मक सुधार लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। इस बार की सफलता सिद्ध करती है कि इच्छाशक्ति हो तो व्यवस्था सुधर सकती है, लेकिन यदि सुधार केवल सुरक्षा तक सीमित रहेगा और मूल समस्याएं जस की तस रहेंगी, तो हर वर्ष विद्यार्थियों को इसी प्रकार की कठिन और तनावपूर्ण प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।
देश को अब तय करना होगा कि भविष्य की परीक्षा प्रणाली कैसी हो? क्या हम हर वर्ष युद्ध जैसी तैयारियां करेंगे, या ऐसे तकनीकी और संस्थागत सुधार विकसित करेंगे, जिनसे सुरक्षा और सम्मान दोनों साथ चल सकें? फ्रिस्किंग को अधिक संवेदनशील और कम अपमानजनक बनाया जा सकता है। बायोमेट्रिक सत्यापन में मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है। परीक्षा प्रक्रिया को चरणबद्ध, डिजिटल और लीक-प्रूफ बनाया जा सकता है। सुरक्षा का उद्देश्य भय नहीं, विश्वास पैदा करना होना चाहिए। यदि कोई व्यवस्था निष्पक्ष तो हो जाए, पर उसमें मानवीय गरिमा खो जाए, तो वह अधूरी सफलता ही कहलाएगी। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
