Bareilly News : जवाबदेही की कसौटी
राम मंदिर के चढ़ावा चोरी मामले की जांच कर रही एसआईटी को प्रकरण की सघन जांच और मंदिर ट्रस्ट को जवाबदेही की कसौटी पर परखने के लिए और समय लगेगा। प्रारंभिक जांच के निष्कर्ष निर्णायक नहीं हो सकते, क्योंकि राम मंदिर में आए दान में कथित चोरी की एसआईटी जांच का फोकस नकदी से आगे बढ़कर सोना, चांदी, हीरे-जवाहरात और अन्य बहुमूल्य दान सामग्री तक पहुंच चुका है। यह बदलाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि वास्तविक प्रश्न केवल नकदी की गिनती का नहीं, पूरे दान प्रबंधन तंत्र की पारदर्शिता का है। ट्रस्ट ने स्वयं स्वीकार किया था कि मंदिर को लगभग 13 क्विंटल चांदी और 20 किलोग्राम सोना दान में मिला, किंतु उन वस्तुओं के संग्रह, भंडारण और वर्तमान स्थिति का पूरा रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं है।
ट्रस्ट की नियमित बैठकों में सोने-चांदी, आभूषणों और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं की मात्रा, मूल्यांकन और उपलब्ध स्टॉक का विस्तृत ब्योरा प्रस्तुत नहीं किया जाना बताता है कि वित्तीय निगरानी की व्यवस्था कैसी थी? परिसंपत्तियों का नियमित मिलान, ऑडिट और प्रस्तुतीकरण अनिवार्य होना चाहिए। इस प्रक्रिया का व्यवस्थित न होना संस्थागत विफलता का संकेत है। जांच एजेंसी अब वास्तविक दानदाताओं से संपर्क कर जानने का प्रयास कर सकती है कि उन्होंने क्या दान किया था और उसका अभिलेखों में किस रूप में उल्लेख है। यदि किसी दानदाता के पास फोटो, वीडियो, रसीद, मीडिया कवरेज या अन्य प्रमाण उपलब्ध हैं, तो उनका मिलान अभिलेखों से करके उसका मूल्यांकन किया जा सकता है। इससे तथाकथित ‘रिवर्स ट्रैकिंग’ संभव होगी, जिसमें दानदाता से शुरू होकर वस्तु की पूरी यात्रा को ट्रेस करने का प्रयास संभव है, हालांकि इस प्रक्रिया की अपनी सीमाएं भी हैं।
भारत में गुप्त दान की परंपरा पुरानी है। अनेक श्रद्धालु बिना नाम बताए दान करते हैं। कई मामलों में न तो रसीद होती है और न ही कोई दृश्य प्रमाण, इसलिए प्रत्येक आभूषण या बहुमूल्य वस्तु की शत-प्रतिशत ट्रैकिंग कतई संभव नहीं होगी। फिर भी जहां प्रमाण उपलब्ध हैं, वहां यह तरीका जांच को मजबूत बना सकता है और कथित अनियमितताओं का वास्तविक आकार सामने ला सकता है। जांच का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू बैंकिंग व्यवस्था है, जिसकी तरफ इस समाचार पत्र ने विगत में प्रमुखता से अपनी खबर में इंगित किया था और फिर एसआईटी जवाबदेही की इसी श्रृंखला को खंगालने की ओर मुड़ी। दानपात्र खोलने, नकदी और आभूषणों की गणना, रिकॉर्डिंग, परिवहन और जमा करने की प्रक्रिया में ट्रस्ट, बैंक तथा आउटसोर्स एजेंसियां एक साथ मौजूद थीं। यदि इतने स्तरों की निगरानी के बावजूद गड़बड़ियां हुईं, तो प्रश्न केवल व्यक्तियों पर नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था पर उठता है। आशंका यह है कि कहीं जांच केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित न रह जाए।
यदि निर्णय, निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था उच्च स्तर पर केंद्रित थी, तो जवाबदेही भी उसी अनुपात में तय होनी चाहिए। बड़ी संस्थागत विफलताओं में अक्सर ‘छोटी मछलियां’ पकड़ ली जाती हैं, जबकि वास्तविक जिम्मेदार बच निकलते हैं। राम मंदिर की प्रतिष्ठा का प्रश्न किसी व्यक्ति या पद से बड़ा है। आस्था की रक्षा तभी होगी, जब सत्य पूरी तरह सामने आए और जवाबदेही बिना किसी भेदभाव के तय हो।
