संपादकीय : समझौते पर साए

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Published By Deepak Mishra
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अमेरिका स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में अमेरिका और ईरान के बीच, पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखने वाले जिस ऐतिहासिक अंतरिम समझौते की तैयारी है, उसके लिए कूटनीतिक मेज के सजने से पहले बारूदी हलचल और धमकियों के दौर में तेजी यह दर्शाती है कि इस समझौते की राह जितनी आकर्षक दिख रही है, धरातल पर उसकी नींव उतनी ही नाजुक और विरोधाभासों से घिरी हुई है। इजराइल द्वारा लेबनान पर ताजा हमले, ईरान द्वारा लेबनान से इजरायली सैनिकों की वापसी की नई शर्त और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को 28 लाख करोड़ रुपये देने से साफ इनकार करने ने मामले में नया पेच आ गया है।

समझौते की इस दहलीज पर वाशिंगटन ने तेल अवीव को पूरी तरह अलग-थलग छोड़ दिया है। अमेरिका द्वारा इजरायली रक्षा मंत्री बेन ग्वीर को वीजा न देना और नेतन्याहू को व्हाइट हाउस में मिलने का समय न देना यह साफ करता है कि हेनरी किसिंजर की वह उक्ति आज भी प्रासंगिक है-“अमेरिका का कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, केवल उसके हित होते हैं”। इजरायल अब हताशा में अपने दम पर स्वतंत्र सैन्य कदम उठा रहा है, क्योंकि ट्रंप प्रशासन अब सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे खाड़ी देशों के सुर में सुर मिलाते हुए ईरान से व्यापारिक व रणनीतिक शांति चाहता है, ताकि वैश्विक तेल बाजार को ब्रेंट क्रूड के 79 डॉलर प्रति बैरल के निचले स्तर पर लाकर राहत दी जा सके।  

 आगे की कूटनीतिक वार्ताओं में पाकिस्तान की भूमिका बेहद सीमित और कतर की भूमिका सर्वाधिक होने की उम्मीद है। पाकिस्तान केवल बयानबाजी तक सीमित है, जबकि कतर और ओमान जैसे देश अमेरिका-ईरान के बीच ‘बैक-चैनल डिप्लोमेसी’ और मध्यस्थता के असली रणनीतिक केंद्र रहे हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का यह कहना सही है कि अमेरिका का अतीत में समझौते फाड़ने का इतिहास रहा है। यदि शुक्रवार को इस समझौते पर हस्ताक्षर हो भी जाते हैं, तो अगले 60 दिनों की वार्ता के दौरान दोनों पक्षों का इससे पीछे हटना पूरी तरह मुमकिन है। यूरेनियम संवर्धन, प्रतिबंध हटाने और ईरान के ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’ हमास और हिजबुल्लाह को फिर से हथियार मिलने के खतरों पर दोनों पक्षों में इतनी गहरी खाई है कि 60 दिनों की इस मियाद में यह कभी भी टूट सकती है।

भारतीय संदर्भ में, पश्चिम एशिया में शांति हमारे आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए संजीवनी है, हमारी ऊर्जा सुरक्षा और लाखों प्रवासी इसी क्षेत्र पर निर्भर हैं। इस ऊहापोह वाली स्थिति में भारत को ‘सक्रिय तटस्थता’ और ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति अपनानी होगी। भारत को जहां एक तरफ अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ आर्थिक साझेदारी को बढ़ाने के साथ चाबहार बंदरगाह के हितों को सुरक्षित रखने के लिए ईरान के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को स्वतंत्र रूप से मजबूत रखना होगा। इजरायल के साथ अपने रक्षा संबंधों को बिना प्रभावित किए, इस बहुध्रुवीय संकट में एक संतुलित और विश्वसनीय वैश्विक मध्यस्थ की भूमिका के लिए खुद को तैयार रखना चाहिए, क्योंकि पश्चिम एशिया की इस बारूदी शांति में केवल वही टिकेगा, जिसके संबंध हर धड़े से मजबूत होंगे।