संपादकीय : रक्षा से प्रौद्योगिकी तक

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Published By Deepak Mishra
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा कूटनीतिक औपचारिकता से बढ़ कर रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, नवाचार और आपूर्ति श्रृंखलाओं के क्षेत्र में उभरती हुई एक नई सामरिक साझेदारी का संकेत है। दोनों देशों द्वारा अपनी साझेदारी को गहरा करते हुए व्यापार को पांच वर्षों में दोगुना करने, “इनोवेशन रोडमैप 2030” लागू करने तथा एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा पर संयुक्त कार्य समूह बनाने का जो निर्णय लिया गया वह स्वागत योग्य है। खास बात यह है कि दोनों देश “रणनीतिक स्वायत्तता” के पक्षधर हैं।

“भारत-फ्रांस इनोवेशन रोडमैप 2030” यात्रा की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह संकेत है कि भारत अब केवल विदेशी तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी प्रदाता बनना चाहता है। डिजिटल भुगतान, आधार, यूपीआई, अंतरिक्ष प्रक्षेपण, वैक्सीन उत्पादन और एआई अनुप्रयोगों में भारत की उपलब्धियों ने फ्रांस को प्रभावित किया है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा “भारत इनोवेट्स” कार्यक्रम में भारतीय नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र की प्रशंसा इसी पृष्ठभूमि में समझी जानी चाहिए।

द्विपक्षीय व्यापार को पांच वर्षों में दोगुना कर 16 अरब डॉलर से 32 अरब डॉलर तक ले जाना महत्वाकांक्षी अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं। इसके लिए भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को गति देनी होगी, रक्षा और एयरोस्पेस विनिर्माण में संयुक्त निवेश बढ़ाना होगा तथा सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और डिजिटल प्रौद्योगिकी में साझेदारी को विस्तार देना होगा। फ्रांस पहले से भारत में प्रमुख निवेशकों में शामिल है और एक हजार से अधिक फ्रांसीसी कंपनियां भारत में सक्रिय हैं। रक्षा क्षेत्र में लगभग ₹3.25 लाख करोड़ की लागत से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद पर हालांकि अंतिम समझौता अभी शेष है, लेकिन भारत द्वारा औपचारिक अनुरोध भेजे जाने के बाद परियोजना निर्णायक चरण में पहुंच गई है।

उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार लगभग 94 विमान भारत में “मेक इन इंडिया” के तहत निर्मित किए जा सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह पहली बार होगा जब राफेल का बड़े पैमाने पर उत्पादन फ्रांस के बाहर होगा। इससे भारतीय एयरोस्पेस उद्योग, निजी क्षेत्र और आपूर्ति श्रृंखला को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भारत और फ्रांस का प्रस्तावित ओपन मॉडल भी उल्लेखनीय है। इसका उद्देश्य कुछ बड़ी कंपनियों के स्वामित्व वाले एआई मॉडल्स के विकल्प के रूप में अधिक पारदर्शी, लोकतांत्रिक और बहुभाषी एआई पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है। भारत के लिए इसका विशेष लाभ यह होगा कि भारतीय भाषाओं, स्थानीय डेटा और सार्वजनिक उपयोग के अनुप्रयोगों के लिए एआई विकास की लागत कम होगी तथा स्टार्टअप को वैश्विक मंच मिलेगा।

अंतरिक्ष क्षेत्र में इसरो और सीएनएएस के बीच सहयोग भी पृथ्वी अवलोकन, समुद्री निगरानी, जलवायु अध्ययन और अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े संयुक्त मिशन भारत की तकनीकी क्षमता को और मजबूत करेगा। इससे भारतीय डीप-टेक स्टार्टअप को यूरोपीय निवेश, अनुसंधान नेटवर्क और वैश्विक बाजारों तक पहुंच मिलने की संभावना बढ़ेगी। यह यात्रा भारत को रक्षा, एआई, अंतरिक्ष और उन्नत प्रौद्योगिकी की वैश्विक शक्ति बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि घोषित योजनाएं समयबद्ध ढंग से लागू होती हैं, तो आने वाले दशक में यह साझेदारी भारत के आर्थिक और सामरिक उदय की प्रमुख आधारशिलाओं में से एक बन सकती है।

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