फीफा विश्वकप गोल की गुंज से दुनिया गुंजायमान
फुटबाल को ‘खेलों का राजा’ यूं ही नहीं कहा जाता। यह एक खेल ही नहीं, वरन वैश्विक जुनून, उत्साह का तूफान व भावनाओं का जीवंत उत्सव भी है। फुटबाल मात्र 90 मिनट का पावर गेम ही नहीं, बल्कि रणनीति, मानसिक दृढ़ता व जज्बे का युद्ध भी है। एक गोल की खुशी, हार का दर्द और किसी अंडरडॉग टीम का मैदान पर उतरने वाले 11 खिलाड़ी योद्धा होते हैं, जहां प्रत्येक सेकंड का निर्णय, पास और टैकल हार या जीत की दिशा तय करते हैं। करीब डेढ़ घंटे तक लगातार दौड़ते रहना, कभी-कभी स्प्रिंट लगाना व शारीरिक टक्कर झेलना फुटबालरों की सहनशक्ति की परीक्षा लेता है। यह कहना प्रासंगिक कि विश्व कप का प्रत्येक मैचन ‘करो या मरो’ की जंग जैसा ही होता है।
फुटबाल भाषा, धर्म, संस्कृति और भौगोलिक सीमाओं को पार कर पूरे विश्व को एकता के सूत्र में भी बांधता है। इस खेल की दीवानगी का आलम यह कि वर्तमान में पूरा विश्व गोल-गोल की गुंज से गुंजायमान हो चला है। यूएसए, कनाडा और मैक्सिको की मेजबानी में हो रहे 23 वें फीफा विश्व कप में पहली बार दुनिया की सर्वश्रेष्ठ 48 टीमें शिरकत कर रही हैं। दुनिया के चार देश अर्थात केप वर्डे, कुरासाओ, जॉर्डन व उज्बेकिस्तान पहली बार डेब्यू कर रहे हैं। विश्वकप में खेले जाने वाले 104 मैचों को दुनियाभर के करीब छह अरब दर्शक टीवी, मोबाइल, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और स्टेडियमों में बैठकर देखेंगे। यानी चार साल पहले कतर में खेले गए वर्ल्ड कप आयोजन से एक अरब ज्यादा दर्शक मैचों का लुत्फ उठा रहे हैं।
इस खेल महाकुंभ में वर्तमान में मैचों को देख रहे दर्शकों में ‘फुटबाल मैनिया’ का रंग सिर चढ़कर बोलता दिख रहा है। इससे पहले के सात विश्व कप आयोजनों के दौरान दुनिया की सर्वश्रेष्ठ 32 टीमों के बीच ही मुकाबला होता था। जान लें, वर्ष 1930 में उरुग्वे में पहले विश्व कप में 13 टीमों ने ही हिस्सा लिया था। सही मायने में खेलों का यदि सबसे बड़ा इवेंट माना जाए, तो फीफा विश्वकप से महत्वपूर्ण कोई अन्य हो ही नहीं सकता।
वर्ल्ड कप में शिरकत करने को क्वालीफाइंग मैच साल भर चलते रहते हैं। लैटिन अमेरिकी देशों के अलावा, उत्तर अमेरिकी, यूरोप, अफ्रीका, एशिया-ओशियाना के देश विश्व कप खेलने को जूझते ही रहते हैं। उक्त महाद्वीपों की टाप टीमों को ही इस महा-मुकाबले में भाग लेने का सौभाग्य मिल पाता है। स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख स्थित फेडरेशन इंटरनेशनल डी फुटबॉल एसोसिएशन (फीफा) के मुख्यालय से वैश्विक फुटबाल गतिविधियों का संचालन और प्रशासनिक क्रियान्वयन होता है। वर्तमान में 211 राष्ट्रीय फुटबॉल संघ इसके सदस्य हैं। फुटबाल के जादुगर ब्राजील के पेले ने तीन विश्व कप जीतकर इस खेल को कला का दर्जा दिलाया।
अर्जेंटीना के डिएगो माराडोना की ‘जादुई ड्रिब्लिंग’ को भला कोई फुटबाल प्रेमी कैसे भूल सकता है। अपना छठा विश्व कप खेल रहे अर्जेंटीना के लियोनल मेसी (39) व पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो (41) का जादू इस बार के विश्वकप में भी देखने को मिल रहा है। फ्रांस के किलियन एम्बाप्पे (28) तथा ब्राजील के नेमार का जलवा इस विश्वकप में भी बरकरार होता दिख रहा है।
फीफा विश्वकप-2026 का जुनून भारत में भी देखा जा रहा है। करोड़ों भारतीय इस टूर्नामेंट से भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं, लेकिन हर चार वर्ष में एक प्रश्न प्रत्येक फुटबाल प्रेमी की जेहन में कौंधता है कि करीब 96 बरस बीत जाने के बाद भी आखिर भारत फीफा विश्वकप में आज तक क्यों नहीं खेल पाया? एक अरब 40 करोड़ की जनसंख्या वाला देश आज फीफा रैंकिंग में 139 वें और एशियाई देशों में 26 वें स्थान पर क्यों लुढ़का हुआ है? वर्ष 1951 और 1962 में भारत ने एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था। वर्ष 1964 में एशिया कप में भारत उपविजेता था। वर्ष 1956 मेलबर्न ओलंपिक में भारत चौथे स्थान पर रहा।
1950 से 1960 के दशक के बीच ओलंपिक के लिए लगातार क्वॉलीफाई करने वाला भारत आज निचले पायदान पर क्यों पहुंच गया है? यह सच है कि भारतीय फुटबाल टीम वर्ष 1950 में ब्राजील में खेले जाने वाले वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने वाली थी, लेकिन यह दुर्भाग्य ही रहा कि अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ ने टीम को वहां नहीं भेजा। एक आंकड़े के अनुसार विश्वकप-2026 में खेल रहे देशों अर्थात कतर की जनसंख्या 28.6 लाख, काबोवर्डे की 5.25 लाख, पनामा की 45.2 लाख, बोस्निया- हर्जेगोविना की 31.6 लाख, क्रोएशिया की 38.7 लाख तथा कैरेबियन देश कुराकाओ की कुल जनसंख्या मात्र 1.56 लाख ही है।
यह त्रासदी ही है कि विश्व की सर्वाधिक आबादी वाला देश भारत करीब 96 वर्ष में भी फीफा विश्व कप में भाग नहीं ले पाया है। हमारे लिए यही संतोषप्रद कि भारतीय मूल के निशान वेलुपिल्लई ऑस्ट्रेलिया, तहसीन मोहम्मद जमशेद कतर, सरप्रीत सिंह न्यूजीलैंड तथा सैमुअल मौटौसामी कांगो देश के लिए फीफा विश्व कप में खेल रहे हैं।
फुटबाल पावर व स्किल का गेम माना जाता है। दुनिया के बेहतरीन फुटबालर आठ से दस वर्ष की उम्र से स्ट्रक्चर्ड अकादमियों में ढलते हैं। वहीं भारत में उत्तम प्रशिक्षकों, स्काउटिंग तथा आधारभूत सुविधाओं का अभाव है। हमारे देश में फुटबाल को बढ़ावा देने वाली कई संस्थाएं हैं। बजट भी खूब लुटाया जाता है, किंतु उसका अंशमात्र भी खिलाड़ियों तक पहुंच पाता, तो हमें आज यह दिन न देखना पड़ता। खैर करीब 35 दिनों तक दुनिया फुटबाल के मैदान पर सिमटी दिखेगी। भाग ले रहे 48 देश और 1248 फुटबालरों का एक ही लक्ष्य। विश्व कप की चमचमाती ट्रॉफी अपने देश के नाम करने का।
