सावधान ! तेजी से बढ़ रही भारतीयों की 'हृदय आयु', वजह है मोटापा, चिकित्सकों ने जताई चिंता
चिकित्सकों का कहना है कि आपका दिल उससे कहीं बूढ़ा हो सकता है जितना आप सोचते हैं। उन्होंने आगाह किया है कि भारत में मोटापा बढ़ने के कारण, कई लोगों की हृदय आयु (कार्डियक एज) उनकी असल उम्र से काफी ज्यादा हो सकती है, जिससे कम उम्र में ही हृदय रोगों का खतरा बढ़ सकता है।
नई दिल्ली। चिकित्सकों का कहना है कि आपका दिल उससे कहीं बूढ़ा हो सकता है जितना आप सोचते हैं। उन्होंने आगाह किया है कि भारत में मोटापा बढ़ने के कारण, कई लोगों की हृदय आयु (कार्डियक एज) उनकी असल उम्र से काफी ज्यादा हो सकती है, जिससे कम उम्र में ही हृदय रोगों का खतरा बढ़ सकता है।
यह चिंता राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (एनएफएचएस-6) के नतीजों के बाद सामने आई है, जिनसे पता चला है कि भारतीय वयस्कों में मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ रही है। सर्वेक्षण में पाया गया कि 2023-24 में 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 30.7 प्रतिशत महिलाएं अधिक वजन या मोटापे की शिकार थीं, जबकि एनएफएचएस-5 (2019-21) में यह अनुपात 24 प्रतिशत था। वहीं, पुरुषों में यह अनुपात 22.9 प्रतिशत से बढ़कर 27.3 प्रतिशत हो गया।
जानकारों का कहना है कि इस बदलाव और साथ ही मधुमेह व उच्च रक्तचाप के बढ़ते मामलों की वजह से दिल की बीमारियों की आशंका बढ़ सकती है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली में हृदयरोग के प्रोफेसर डॉ. नीतीश नाइक ने कहा कि हृदयरोग के जोखिम को ऐसे तरीके से समझाने के लिए 'हृदय आयु' का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है जिसे लोग आसानी से समझ सकें।
डॉ. नाइक ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा, ''हृदय आयु जरूरी नहीं कि किसी व्यक्ति की असल उम्र (क्रोनोलॉजिकल एज) के बराबर ही हो। यह अलग-अलग जोखिम कारकों के आधार पर हृदय के स्वस्थ या अस्वस्थ होने का आकलन है।'' उन्होंने कहा कि मोटापे, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और बिना ज्यादा शारीरिक गतिविधि वाली जीवनशैली वाले 35 वर्ष के व्यक्ति में दिल की बीमारी का जोखिम उतना ही हो सकता है, जितना किसी अधिक उम्र के व्यक्ति में होता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, ज्यादा वजन और मोटापा गैर-संचारी रोगों के लिए प्रमुख जोखिम कारकों में से हैं। इनमें हृदय रोग और आघात शामिल हैं, जो दुनिया भर में मौत के प्रमुख कारण बने हुए हैं। 'हृदय एवं फेफड़ा रोग संस्थान अनुसंधान केंद्र' के प्रमुख डॉ. राहुल चंदोला ने कहा कि मोटापा 'कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ' (दिल और फेफड़ों की सेहत) का एक मुख्य कारक है और यह भारत समेत पूरी दुनिया में एक बड़ी समस्या है।
उन्होंने कहा कि निष्क्रिय जीवनशैली, दफ्तरों में लंबे समय तक बैठे रहना, अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों का सेवन और तनाव मोटापे को बढ़ावा देते हैं हृदय आयु के बारे में बताते हुए डॉ. चंदोला ने कहा कि यह दिल और रक्त वाहिकाओं की सेहत का पैमाना है। यह किसी व्यक्ति की उम्र के वर्षों की संख्या के बजाय उस अंग की शारीरिक स्थिति को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि अगर 70 या 80 साल के व्यक्ति की दिल और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी सेहत अच्छी हो, तो उसका दिल काफी कम उम्र का हो सकता है। इसी तरह, अगर कई जोखिम कारक मौजूद हों, तो कम उम्र के व्यक्ति की हृदय आयु ज्यादा हो सकती है। डॉ. नाइक ने कहा कि अनेक भारतीय इस बात से अनजान हैं कि हृदय संबंधी क्षति अक्सर लक्षण दिखाई देने से कई वर्ष पहले ही शुरू हो जाती है।
उन्होंने कहा, ''लोग अक्सर केवल शरीर के वजन पर ध्यान देते हैं, जबकि चयापचय (मेटाबॉलिक) स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मोटापा चुपचाप रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है, इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ा सकता है और रक्तचाप में वृद्धि कर सकता है। लक्षण सामने आने तक हृदय और रक्त वाहिकाओं को गंभीर क्षति पहुंच चुकी हो सकती है।''
क्या बोले डॉ. एच. एस. इस्सर
सफदरजंग अस्पताल में हृदय रोग विभाग के प्रमुख डॉ. एच. एस. इस्सर ने कहा कि शरीर में ज्यादा वसा, खासकर पेट के आसपास, 'क्रोनिक इन्फ्लेमेशन' (लंबे समय तक रहने वाली सूजन) को बढ़ावा देता है, रक्तचाप बढ़ाता है, कोलेस्ट्रॉल का स्तर खराब करता है। ये सभी चीजें रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं और दिल को ज्यादा मेहनत करने पर मजबूर करती हैं।
डॉ. इस्सर ने कहा कि पेट की वसा विशेष रूप से खतरनाक होती है क्योंकि यह महत्वपूर्ण अंगों को घेर लेती है और चयापचय संबंधी विकारों को बढ़ावा देती है। 'सीताराम भरतिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एंड रिसर्च' में मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. अनिल गुर्टू ने कहा, ''कैलेंडर के हिसाब से हमारी उम्र कुछ और हो सकती है, लेकिन दिल की उम्र कुछ और हो सकती है। इसलिए, भले ही कैलेंडर के अनुसार हम 40 साल के हों, लेकिन हमारे दिल की उम्र 60 साल से ज्यादा हो सकती है।''
