प्रसंगवश : काकोरी कांड के अमर क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
On

राम प्रसाद बिस्मिल क्रांतिकारी होने के साथ-साथ एक बेहतरीन कवि, शायर, कुशल बहुभाषी अनुवादक, इतिहासकार और साहित्यकार भी थे। बिस्मिल उनका उपनाम था, जो कि उर्दू भाषा का शब्द है, जिसका मतलब है आत्मिक रूप से आहत। राम प्रसाद बिस्मिल ने राम और अज्ञात नाम से भी लेखन किया।

 

cats
सुरेंद्र बीनू सिन्हा, लेखक

 

राम प्रसाद बिस्मिल क्रांतिकारी होने के साथ-साथ एक बेहतरीन कवि, शायर, कुशल बहुभाषी अनुवादक, इतिहासकार और साहित्यकार भी थे। बिस्मिल उनका उपनाम था, जो कि उर्दू भाषा का शब्द है, जिसका मतलब है आत्मिक रूप से आहत। राम प्रसाद बिस्मिल ने राम और अज्ञात नाम से भी लेखन किया।

स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम मुरलीधर और माता का नाम मूलमती था। उनके पिता रामभक्त थे, जिसके कारण उनका नाम राम प्रसाद रख दिया गया। बिस्मिल की जन्म कुंडली देखकर ज्योतिष ने यह भविष्यवाणी की थी कि यद्यपि संभावना बहुत कम है, किंतु यदि इस बालक का जीवन किसी प्रकार बचा रहा, तो इसे चक्रवर्ती सम्राट बनने से दुनिया की कोई भी ताकत रोक नहीं पाएगी।

हिंदी की वर्णमाला पढ़ने में बिस्मिल ने बचपन में रुचि नहीं दिखाई, जिसके बाद उनकी शुरुआती शिक्षा उर्दू में प्रारंभ की गई। मिडिल स्कूल की परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने के बाद उन्होंने अंग्रेजी पढ़ना शुरू किया। इसके साथ ही अपने एक पुजारी पड़ोसी द्वारा उन्हें पूजा-विधि का ज्ञान प्राप्त हुआ और उनकी विद्वता का प्रभाव भी बिस्मिल के व्यक्तित्व पर पड़ा।

उन्होंने अपने जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन किया और व्यायाम आदि को अपनाकर बुरी लतों को त्याग दिया। इसके बाद उनका मन पढ़ाई में पहले से बेहतर लगने लगा और वे अंग्रेजी में सिद्धहस्त हो गए। 19 वर्ष की आयु में बिस्मिल ने क्रांति के रास्ते पर अपना पहला कदम रखा। अपने 11 वर्ष के क्रांतिकारी जीवन में उन्होंने कई किताबें भी लिखीं और उन्हें प्रकाशित कर प्राप्त रकम का प्रयोग उन्होंने हथियार खरीदने में किया।

अपने भाई परमानंद की फांसी का समाचार सुनने के बाद बिस्मिल ने ब्रिटिश साम्राज्य का समूल नष्ट करने की प्रतिज्ञा की। मैनपुरी षड्यंत्र में शाहजहांपुर के छह युवक, जिनके लीडर राम प्रसाद बिस्मिल थे, शामिल थे। राम प्रसाद बिस्मिल काकोरी षड्यंत्र के हीरो थे। काकोरी षड्यंत्र ने देश के काफी लोगों का ध्यान खींचा। नौ अगस्त 1925 को लखनऊ के काकोरी नामक स्थान पर देशभक्तों ने ट्रेन से ले जाए जा रहे खजाने को लूटा।

गार्ड के डिब्बे में लोहे की तिजोरी को तोड़कर खजाना लेकर फरार हो गए। इस डकैती में अशफाक उल्ला खान, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्र लाहिड़ी, शचींद्रनाथ सान्याल, मन्मथनाथ गुप्त आदि शामिल थे। इस विषय में उन्होंने स्वयं लिखा है— ‘आज 6 दिसंबर 1927 ई. को निम्नलिखित पंक्तियों का उल्लेख कर रहा हूं, जबकि 19 दिसंबर 1927 ई. सोमवार (पौष कृष्ण पक्ष) की साढ़े छह बजे प्रातः काल इस शरीर को फांसी पर लटका देने की तिथि निश्चित हो चुकी है। अतः नियत सीमा पर इहलिला संवरण करनी होगी।’

सभी प्रकार से मृत्यु दंड को बदलने के लिए की गई दया प्रार्थनाओं के अस्वीकृत हो जाने के बाद बिस्मिल अपने महाप्रयाण की तैयारी करने लगे। अपने जीवन के अंतिम दिनों में गोरखपुर जेल में उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी। फांसी के तख्ते पर झूलने के तीन दिन पहले तक वह इसे लिखते रहे।  ऐसे बहादुर वीर को नमन और श्रद्धांजलि। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

संबंधित समाचार