सोशल मीडिया पर आशंकाओं और संकोच का बाजार
डिजिटल दुनिया में लोगों की कमजोरियों, आशंकाओं और सामाजिक संकोच को मुनाफे के अवसर में बदल दिया गया है। सोशल मीडिया पर ‘मर्दाना कमजोरी’ के नाम पर विज्ञापनों और उत्पादों का विशाल कारोबार चल रहा है।
शिक्षाविद्
डिजिटल क्रांति ने समाज को अभूतपूर्व सुविधाएं प्रदान की हैं। आज स्वास्थ्य संबंधी जानकारी, विशेषज्ञों की सलाह और चिकित्सा सेवाएं कुछ क्लिक की दूरी पर उपलब्ध हैं, लेकिन इसी डिजिटल दुनिया का एक दूसरा चेहरा भी है, जहां लोगों की कमजोरियों, आशंकाओं और सामाजिक संकोच को मुनाफे के अवसर में बदल दिया गया है। सोशल मीडिया पर यदि कोई क्षेत्र सबसे तेज़ी से फैल रहा है, तो वह है ‘मर्दाना कमजोरी’ के नाम पर चल रहा विज्ञापनों और उत्पादों का विशाल कारोबार। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, शॉर्ट वीडियो प्लेटफ़ॉर्म और मैसेजिंग ऐप्स पर ऐसे विज्ञापनों की बाढ़ है, जो कुछ दिनों में पुरुषत्व बढ़ाने, वैवाहिक जीवन सुधारने या चमत्कारी शक्ति देने का दावा करते हैं।
यह केवल एक व्यावसायिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान, स्वास्थ्य साक्षरता और डिजिटल नियमन से जुड़ा गंभीर विषय है। यह उद्योग पुरुषों की उस झिझक का लाभ उठाता है, जो उन्हें यौन स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर खुले रूप से चर्चा करने से रोकती है। विज्ञापन पहले भय पैदा करते हैं, फिर उसी भय का समाधान बेचते हैं। यही इस पूरे कारोबार का सबसे बड़ा व्यापारिक मॉडल है।
भारतीय समाज में यौन स्वास्थ्य आज भी खुलकर चर्चा का विषय नहीं बन पाया है। अधिकांश पुरुष ऐसी समस्याओं पर परिवार या चिकित्सक से बात करने में संकोच महसूस करते हैं। इस संकोच का फायदा उठाकर सोशल मीडिया पर स्वयंभू विशेषज्ञ, बिना प्रमाण वाले वैद्य, इन्फ्लुएंसर और कई कंपनियां ऐसे उत्पाद बेचती हैं, जिनकी प्रभावशीलता के ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होते। ‘सात दिन में असर’, ‘100 प्रतिशत गारंटी’, ‘गुप्त फार्मूला’, ‘हज़ारों लोगों ने पाया लाभ’ जैसे दावे आकर्षक लग सकते हैं, लेकिन ये अक्सर वैज्ञानिक चिकित्सा के मानकों पर खरे नहीं उतरते।
इन विज्ञापनों की भाषा भी ध्यान देने योग्य होती है। वे सीधे उत्पाद नहीं बेचते, बल्कि पहले व्यक्ति के आत्मविश्वास पर सवाल उठाते हैं। संदेशों में यह संकेत दिया जाता है कि यदि कोई विशेष उत्पाद नहीं लिया गया, तो वैवाहिक जीवन प्रभावित होगा, सम्मान कम हो जाएगा या पुरुषत्व अधूरा रह जाएगा। इस प्रकार एक सामान्य स्वास्थ्य चिंता को सामाजिक प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान से जोड़ दिया जाता है। परिणामस्वरूप अनेक लोग बिना किसी चिकित्सकीय परामर्श के ऐसे उत्पाद खरीद लेते हैं।
सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म इस समस्या को और बढ़ा देते हैं। यदि किसी व्यक्ति ने एक बार ऐसे विज्ञापन को देखा या उस पर क्लिक किया, तो प्लेटफ़ॉर्म उसे बार-बार इसी प्रकार की सामग्री दिखाने लगते हैं। धीरे-धीरे उपयोगकर्ता को यह भ्रम होने लगता है कि यह समस्या बहुत सामान्य है और अधिकांश लोग ऐसे उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं। यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव कई बार अनावश्यक चिंता भी पैदा कर सकता है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यौन स्वास्थ्य केवल दवाओं से जुड़ा विषय नहीं है। अनेक मामलों में तनाव, अवसाद, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हार्मोन संबंधी असंतुलन, धूम्रपान, शराब का सेवन, नींद की कमी और अस्वस्थ जीवनशैली जैसी स्थितियां भी भूमिका निभाती हैं। ऐसे मामलों में केवल तथाकथित ‘शक्ति बढ़ाने वाली’ दवा लेना समस्या का समाधान नहीं होता। सही निदान और प्रमाण-आधारित चिकित्सा ही उचित मार्ग है।
सोशल मीडिया पर चल रहे इस कारोबार में एक और चिंता नकली समीक्षाओं और झूठे अनुभवों की है। अनेक विज्ञापनों में ऐसे लोगों के कथित अनुभव दिखाए जाते हैं, जिनकी सत्यता की पुष्टि करना कठिन होता है। डॉक्टरों जैसी वेशभूषा पहनाकर विज्ञापन प्रस्तुत किए जाते हैं, जिससे आम व्यक्ति भ्रमित हो सकता है। कई बार ‘आयुर्वेदिक’, ‘हर्बल’ या ‘प्राकृतिक’ जैसे शब्दों का उपयोग यह धारणा बनाने के लिए किया जाता है कि उत्पाद पूरी तरह सुरक्षित है, जबकि प्राकृतिक होना अपने आप में सुरक्षा या प्रभावशीलता की गारंटी नहीं है।
यहां यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि आयुर्वेद भारत की एक समृद्ध और वैज्ञानिक चिकित्सा परंपरा है, जिसके अपने सिद्धांत, शोध और योग्य चिकित्सक हैं। समस्या आयुर्वेद नहीं, बल्कि उसके नाम पर बिना पर्याप्त प्रमाण, बिना गुणवत्ता नियंत्रण या भ्रामक दावों के साथ उत्पाद बेचने की प्रवृत्ति है, इसलिए किसी भी चिकित्सा पद्धति में योग्य और पंजीकृत चिकित्सक से सलाह लेना आवश्यक है।
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। यदि वे वित्तीय धोखाधड़ी, फर्जी निवेश योजनाओं और अन्य भ्रामक विज्ञापनों पर निगरानी रख सकते हैं, तो स्वास्थ्य संबंधी विज्ञापनों के लिए भी अधिक कठोर सत्यापन व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। स्वास्थ्य से जुड़े दावों का वैज्ञानिक आधार, आवश्यक अस्वीकरण और नियामक मानकों का पालन सुनिश्चित करना प्लेटफ़ॉर्मों की सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए।
