बोधकथा  : दीपक की असली लौ

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Edited By Anjali Singh
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एक छोटे से गांव में अर्जुन नाम का एक युवक रहता था। वह बहुत मेहनती था, लेकिन हर छोटी-बड़ी असफलता के बाद निराश हो जाता। उसे लगता कि भाग्य हमेशा उसका साथ नहीं देता। धीरे-धीरे उसने प्रयास करना भी कम कर दिया। गांव के बाहर एक वृद्ध साधु रहते थे। लोग अपनी समस्याएं लेकर उनके पास जाते और संतोष के साथ लौटते। एक दिन अर्जुन भी उनके पास पहुंचा और बोला, “गुरुदेव, मैं मेहनत करता हूं, फिर भी सफलता नहीं मिलती। शायद मेरा भाग्य ही खराब है।” साधु मुस्कुराए। उन्होंने पास रखा एक छोटा-सा मिट्टी का दीपक उठाया और उसमें तेल डालकर बाती जलाई। फिर अर्जुन से पूछा, “बताओ, इस दीपक की रोशनी किससे है- मिट्टी से, तेल से या बाती से?”अर्जुन ने कुछ देर सोचा और बोला, “इन तीनों से।”

साधु ने धीरे से दीपक का तेल निकाल दिया। कुछ ही क्षणों में लौ बुझ गई। फिर उन्होंने कहा, “देखो, केवल सुंदर दीपक होने से प्रकाश नहीं होता। केवल बाती भी कुछ नहीं कर सकती। तेल भी अकेला व्यर्थ है। जब तीनों मिलकर अपना-अपना कार्य करते हैं, तभी उजाला फैलता है।” अर्जुन ध्यान से सुन रहा था। साधु बोले, “मनुष्य का जीवन भी इसी दीपक की तरह है। प्रतिभा मिट्टी का दीपक है, परिश्रम तेल है और धैर्य बाती है। यदि धैर्य समाप्त हो जाए, तो प्रतिभा और परिश्रम भी अपना प्रभाव खो देते हैं। जो लोग बीच रास्ते में हार मान लेते हैं, वे अपनी ही लौ बुझा देते हैं।”

अर्जुन की आंखें खुल गईं। उसने समझ लिया कि असफलता अंत नहीं, बल्कि स्वयं को और बेहतर बनाने का अवसर है। वह फिर पूरे उत्साह से अपने काम में जुट गया। इस बार उसने केवल मेहनत ही नहीं की, बल्कि हर कठिनाई का धैर्यपूर्वक सामना भी किया। कुछ वर्षों बाद वही युवक गांव का सबसे सफल किसान और सम्मानित व्यक्ति बन गया, जब लोग उसकी सफलता का रहस्य पूछते, तो वह मुस्कुराकर केवल इतना कहता, “दीपक की लौ को जलाए रखने के लिए तेल भी चाहिए और बाती भी। जीवन में सफलता के लिए परिश्रम के साथ धैर्य बनाए रखना सबसे आवश्यक है।” कथा से सीख मिलती है कि प्रतिभा और परिश्रम तभी फल देते हैं, जब उनके साथ धैर्य और निरंतर प्रयास भी जुड़ें हो।