क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं हम जब भी अपने आसपास देखते हैं, तो हमें इंसान, तरह-तरह के पशु-पक्षी, कीड़े-मकौड़े, पेड़-पौधे, नदियां और पहाड़ ही नजर आते हैं। अमूमन हम इंसानों को लगता है कि बस यही हमारी दुनिया है, यही पूरी सृष्टि है और इसके बाहर कुछ भी नहीं, लेकिन क्या कभी आपने रात में आसमान के टिमटिमाते तारों को देखकर सोचा है कि इस असीम आकाश में क्या सिर्फ हम ही हैं? क्या वाकई इस पूरे कॉसमॉस या ब्रह्मांड में हम अकेले हैं? कभी गौर से सोचिए, यह सब कुछ अपने आप कैसे चल रहा है? पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा अद्भुत नियमितता से करती है, मौसम समय पर बदलते हैं और हर जीव का जीवन-चक्र एक निश्चित व्यवस्था का पालन करता है। 

दूसरी ओर, जब पृथ्वी के भीतर थोड़ी-सी भी असंतुलित हलचल होती है, तो भूकंप, सुनामी और ज्वालामुखी जैसी आपदाएं पूरी सभ्यताओं को पल भर में तबाह कर देती हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि यह पूरी पृथ्वी अनंत अंतरिक्ष में अपनी धुरी पर इतनी सटीकता से कैसे गतिमान है? आखिर कौन-सी सर्वोच्च शक्ति इस विराट व्यवस्था को संतुलित रखे हुए है? इतिहास बताता है कि मनुष्य आज इस रहस्य को समझने का प्रयास कर रहा है, जबकि भारतीय दर्शन इसे बहुत पहले ही परमात्मा की व्यवस्था के रूप में स्वीकार कर चुका है। 

कोई उसे ईश्वर कहता है, कोई परमेश्वर, कोई गॉड, कोई ‘ओम्’ की अनंत ध्वनि-नाम भले अलग हों, पर वह परम सत्ता एक ही है। यही प्रश्न आधुनिक विज्ञान को भी लगातार आकर्षित करता रहा है। स्टीफन हॉकिंग जैसे वैज्ञानिकों से लेकर आज के खगोलशास्त्री ‘मल्टीवर्स’ जैसी अवधारणाओं पर शोध कर रहे हैं, जिनके अनुसार हमारे ब्रह्मांड के अतिरिक्त भी असंख्य समानांतर ब्रह्मांड हो सकते हैं। रोचक बात यह है कि जिन रहस्यों तक विज्ञान अब पहुंचने का प्रयास कर रहा है, उनके संकेत भारत के प्राचीन ग्रंथों में पहले से मिलते हैं। श्रीमद्भागवत पुराण में समय की जो सूक्ष्म और विराट गणना दी गई है, वह आश्चर्यचकित करती है। मनुष्यों का एक वर्ष देवताओं के एक दिन-रात के बराबर माना गया है। चार युग मिलकर एक चतुर्युग बनाते हैं, 71 चतुर्युग एक मन्वंतर और 14 मन्वंतर मिलकर ब्रह्मा का एक दिन, अर्थात एक कल्प बनता है, जिसकी अवधि 4 अरब 32 करोड़ मानव वर्ष बताई गई है।

इस विराट सृष्टि के सामने मनुष्य का अहंकार कितना छोटा है, इसका एहसास यही ज्ञान कराता है। हम धन, शक्ति और प्रतिष्ठा पर गर्व करते हैं, जबकि ब्रह्मांड की तुलना में हमारी पृथ्वी धूल के कण समान है और उस पर रहने वाला मनुष्य उससे भी सूक्ष्म। आधुनिक विज्ञान ‘बिग बैंग’, ‘बिग क्रंच’ और ‘ब्लैक होल’ जैसी अवधारणाओं के माध्यम से सृष्टि के रहस्यों को समझने का प्रयास कर रहा है, वहीं भारतीय अध्यात्म इन्हें सृष्टि के सृजन, विस्तार और महाप्रलय के प्रतीक रूप में देखता है। यह दृष्टि मनुष्य के अहंकार को समाप्त कर उसे यह स्मरण कराती है कि इस अनंत ब्रह्मांड का वास्तविक संचालक वही एक परम चेतना है, जिसकी व्यवस्था के सामने हम सब अत्यंत क्षुद्र हैं।
 

वैभव साहू, बरेली, उत्तर प्रदेश