इथेनॉल : ऊर्जा आत्मनिर्भरता की जरूरत व आशंकाएं

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Edited By Deepak Mishra
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अमेरिका, ब्राज़ील, कनाडा, जर्मनी और अनेक अन्य देश वर्षों से विभिन्न अनुपातों में इथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग कर रहे हैं। भारत में भी 2013-14 में पेट्रोल में लगभग डेढ़ प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण की शुरुआत हुई।

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प्रो. ऋषभ मिश्रा,
आईआईटी कानपुर

भारत आज ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे तीन बड़े लक्ष्यों को एक साथ प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण की नीति इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर ऐसे अनेक वीडियो और दावे सामने आए हैं, जिनमें कहा गया कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से वाहनों के इंजन खराब हो रहे हैं, माइलेज कम हो रहा है तथा इससे वाहन मालिकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

दूसरी ओर, सरकार, पेट्रोलियम मंत्रालय और ऑटोमोबाइल उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ इन दावों को मिथक और भ्रामक जानकारी बताते हुए इथेनॉल मिश्रण को भारत के ऊर्जा भविष्य के लिए आवश्यक कदम मान रहे हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि भावनाओं और अफवाहों से ऊपर उठकर तथ्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर इस विषय को समझा जाए।

भारत अपनी कुल पेट्रोलियम आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों की जेब पर पड़ता है। हाल के वर्षों में वैश्विक संघर्षों और भू-राजनीतिक तनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा के लिए विदेशी स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता किसी भी देश के लिए जोखिमपूर्ण हो सकती है। ऐसे में जैव ईंधनों का उपयोग केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीतिक आवश्यकता भी बन गया है।

इथेनॉल एक जैव ईंधन है, जिसे मुख्यतः गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। इसके उपयोग से जीवाश्म ईंधनों की खपत कम होती है और कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है। यही कारण है कि अमेरिका, ब्राज़ील, कनाडा, जर्मनी और अनेक अन्य देश वर्षों से विभिन्न अनुपातों में इथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग कर रहे हैं। भारत में भी यह प्रक्रिया अचानक नहीं शुरू हुई, बल्कि इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया। वर्ष 2013-14 में पेट्रोल में लगभग डेढ़ प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण से शुरुआत हुई और धीरे-धीरे इसे बढ़ाकर ई-20 अर्थात 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण तक पहुंचाया गया।

फिर भी लोगों की चिंताएं पूरी तरह निराधार नहीं कही जा सकतीं। विशेष रूप से उन लोगों के मन में अधिक प्रश्न हैं, जिन्होंने वर्ष 2023 से पहले अपने वाहन खरीदे थे। तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि अधिक इथेनॉल वाले ईंधन के साथ पुराने इंजनों के कुछ पुर्जों, जैसे फ्यूल पाइप, गैसकेट और पेट्रोल टंकी के कुछ हिस्सों की अनुकूलता एक महत्वपूर्ण विषय है। इथेनॉल में नमी सोखने की क्षमता अधिक होती है और यह कुछ प्रकार के पदार्थों पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है, इसलिए पुराने वाहनों के संदर्भ में सावधानी और तकनीकी परीक्षण की आवश्यकता को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

वाहन निर्माताओं और परीक्षण एजेंसियों का दावा है कि व्यापक वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद यह पाया गया है कि भारत में चल रही अधिकांश गाड़ियां ई-20 ईंधन के साथ सुरक्षित रूप से संचालित हो सकती हैं। विशेष रूप से वर्ष 2023 के बाद निर्मित और बेचे गए सभी वाहनों को ई-20 अनुकूल बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। इससे स्पष्ट है कि सरकार और उद्योग जगत इस परिवर्तन के लिए पहले से तैयारी कर चुके थे।

माइलेज में कमी का प्रश्न भी चर्चा का प्रमुख विषय है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो इथेनॉल की ऊर्जा घनता पेट्रोल की तुलना में कम होती है। इसका अर्थ है कि समान मात्रा में इथेनॉल मिश्रित ईंधन से कुछ कम दूरी तय हो सकती है। विभिन्न अध्ययनों और उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार ई-20 ईंधन के उपयोग से ईंधन दक्षता में लगभग दो से चार प्रतिशत तक की कमी संभव है। यह कमी वास्तविक है, लेकिन सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावों की तरह अत्यधिक नहीं है। आधुनिक इंजनों की ट्यूनिंग और तकनीकी सुधारों के माध्यम से इस अंतर को काफी हद तक संतुलित किया जा सकता है।

इथेनॉल मिश्रण के आर्थिक लाभ भी महत्वपूर्ण हैं। भारत हर वर्ष अरबों डॉलर का कच्चा तेल आयात करता है। यदि देश में उत्पादित जैव ईंधनों का उपयोग बढ़ता है, तो विदेशी मुद्रा की बचत होगी। साथ ही गन्ना किसानों और कृषि क्षेत्र को एक नया बाजार प्राप्त होगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। यह पहल कृषि और ऊर्जा क्षेत्र के बीच एक नए आर्थिक संबंध को भी स्थापित करती है। पर्यावरणीय दृष्टि से भी इथेनॉल मिश्रण एक सकारात्मक कदम माना जाता है। जीवाश्म ईंधनों के दहन से निकलने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने में जैव ईंधन सहायक हो सकते हैं। भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कार्बन उत्सर्जन कम करने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के जो लक्ष्य निर्धारित किए हैं, उन्हें प्राप्त करने में इथेनॉल नीति उपयोगी साबित हो सकती है।

सरकार और उद्योग जगत की जिम्मेदारी केवल नीति लागू करने तक सीमित नहीं है। जनता के बीच जागरूकता बढ़ाना, पारदर्शी वैज्ञानिक आंकड़े उपलब्ध कराना तथा पुराने वाहनों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करना भी उतना ही आवश्यक है। यदि किसी विशेष श्रेणी के वाहनों में तकनीकी संशोधन की आवश्यकता है, तो उसके बारे में स्पष्ट जानकारी और उचित समाधान उपलब्ध कराया जाना चाहिए। अफवाहों का मुकाबला केवल खंडन से नहीं, बल्कि भरोसेमंद और पारदर्शी संवाद से किया जा सकता है।

भविष्य में डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिश्रण की तैयारी यह संकेत देती है कि भारत जैव ईंधनों के उपयोग को और अधिक व्यापक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह परिवर्तन ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़े संक्रमण का हिस्सा है, जिसमें पारंपरिक ईंधनों के साथ-साथ जैव ईंधन, विद्युत वाहन और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत समानांतर रूप से विकसित होंगे।

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