तप से ग्वाला बने गोपाला सिद्ध
नाथनगरी के नाम से पहचाने जाने वाले बरेली में वैसे तो नाथ मंदिरों की लंबी श्रृंखला है। इनमें प्राचीन गोपाला सिद्ध मंदिर ऐसा है, जहां माथा झुकाए बिना सावन में चालीसा करने वाले शिवभक्त कांवड़ियों की साधना पूरी नहीं मानी जाती। पूरे साल सुदूर इलाकों से श्रृद्धालु मनोकामना पूरी होने के लिए यहां आकर पूजन-अर्चन करते हैं। सावन में आस्था का सैलाब उमड़ता है और मेले में हजारों-लाखों की संख्या में लोग जुटते हैं।
मान्यताओं के अनुसार, बरेली में बुखारा-फरीदपुर मार्ग पर स्थित गोपाला सिद्ध मंदिर सैकड़ों साल पुराना है। कहा जाता है कि जिस जगह पर आज मंदिर है, प्राचीन समय में वहां रामगंगा नदी का मुहाना हुआ करता था। नदी बिल्कुल मंदिर के किनारों को छूकर बहती थी। उस समय में नदी किनारे मंदिर जैसा कुछ नहीं था। रामगंगा किनारे आने वाले गोपाल नामक ग्वाला को इस जगह कुछ ज्ञान हुआ और उसने सब काम छोड़कर तप-साधना शुरू कर दी।
लंबी तपस्या के बाद उसे एक दिन माता की आवाज सुनाई दी और गोपाल ग्वाला से कहा कि तुम्हारी साधना पूर्ण हो गई है और सिद्ध बन गए हो। आवाज सुनकर भी गोपाला ने ध्यान नही तोड़ा और अचानक वह सिद्ध होकर शिवलिंग में परिवर्तित हो गए। आसपास के गांववालों को इसकी जानकारी हुई तो देवस्थल पर जुटने लगे और पूजा-अर्चना शुरू कर दी। जैसे-जैसे ग्वाहा सिद्ध की खबर दूर-दराज तक फैलती गई तो आस्था केन्द्र पर सैलाब उमड़ता ही चला गया।
मंदिर के महंत नारायण गिरि बताते हैं कि बाद में इलाके के लोगों ने पहले सिद्ध सिद्ध पीठ को गोपाला सिद्ध पर पहले छोटी मठिया निर्माण कराया था तो आपसी सहयोग से विशाल मंदिर में बदल गया। मान्यता है गोपाला सिद्ध मंदिर में आकर पूजा करने वालों की हर मनोकामना पूरी होती है। इसलिए, शहर और जिला ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों से भी भक्त यहां पहुंचते हैं। गोपाला सिद्ध मंदिर में पिछले 40 साल से हर सोमवार आकर पूजा-अर्चना करने वाले जेल सिपाही रहे बिहारीपुर बाबा रागिया गिरी बताते हैं कि उन्हें यहां बहुत शांति मिलती है। सांसारिक जीवन छोड़ साधु जीवन जी रहे हैं। आधी-बारिश हो या कुछ भी परेशानी मगर गोपाला सिद्ध पहुंचना नहीं भूलते।
हर सोमवार को लगता है मंदिर में मेला
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गोपाला सिद्ध मंदिर पर वैसे तो बड़ी संख्या में श्रृद्धालओं के पहुंचने का क्रम जारी रहता है, मगर सोमवार को यहां भक्ति का मेला लगता है। सुबह से ही दूरदराज से भक्तों का रेला आना शुरू हो जाता है। मंदिर परिसर में मेले का माहौल रहता है। परिवार बच्चों के मुंडन संस्कार और भंडारा भी यहां आकर कराते हैं। सिद्ध देवस्थल की पहचान रखने वाले गोपाला सिद्ध मंदिर के बारे में कहा जाता है कि वहां आकर बाबा की भक्ति करने वालों की मनोकामना जरूर पूरी होती है। श्रावण माह में चालीसा करने वाले शिवभक्तों का चालीसा पूरा तब तक नहीं माना जाता, जब तक कि वह गोपाला सिद्ध मंदिर में माथा टेकने नहीं आते, जो लोग श्रावण माह में बरेली के धोपेश्वरनाथ, अलखनाथ, त्रिपटीनाथ, बनखंडीनाथ आदि आदि मंदिरों में पूरे चालीस दिन भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए चालीसा करते हैं। वह अनुष्ठान और साधना की पूर्ति के लिए गोपाला सिद्ध पहुंचकर माथा जरूर टेकते हैं।
श्रावण मास में उमड़ेंगे लाखों श्रद्धालु
सावन के महीने में गोपाला सिद्ध मंदिर पर आस्था का सैलाब उमड़ता दिखेगा। सुदूर इलाकों से शिवभक्त यहां पहुंचकर भोले की भक्ति करेंगे। सावन के महीने में यहां रोज हजारों की संख्या में भक्त पहुंचते देखे जाते है। इस लिहाज से पूरे सावन लाखों शिवभक्तों की आवक रिकॉर्ड की जाती है। पूरे सावन यहां मेले का माहौल रहता है।
