प्रेम गीतों के सशक्त हस्ताक्षर किशन सरोज
हिंदी गीत कविता की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनका जिक्र आते ही मन में एक अपनापन-सा उतर आता है। कवि किशन सरोज उन्हीं रचनाकारों में शुमार हैं। उन्होंने कविता को केवल शब्दों की सजावट नहीं बनाया, बल्कि उसे इंसानी जज़्बात, रिश्तों की गर्माहट और समाज की धड़कनों से जोड़ दिया। उनके गीत पढ़ते या सुनते हुए लगता है जैसे कोई अपना आदमी जिंदगी की दास्तान सुना रहा हो।
कितने ही युवा कवि ये कहते हुए खुद को सौभाग्यशाली बताते हैं कि उन्हें थोड़ा ही सही मगर इस महान कवि के साथ काफी वक्त गुजारने का मौका मिला। उन्होंने बताया कि कि किशन सरोज नवगीत आंदोलन के उन अहम हस्ताक्षरों में रहे, जिन्होंने पारंपरिक गीतों की मिठास को बरकरार रखते हुए उन्हें बदलते दौर की बेचैनियों और सवालों से जोड़ा।
उनकी कविता में गांव की मिट्टी की सोंधी महक भी मिलती है और शहर की भागदौड़ का सच भी। वे प्रेम लिखते हैं तो उसमें दिखावा नहीं, अपनापन होता है। वे दर्द लिखते हैं तो उसमें शिकायत कम और जिंदगी को समझने की कोशिश ज्यादा दिखाई देती है। उनकी भाषा उनकी सबसे बड़ी ताकत है। कवि रोहित राकेश कहते हैं कि उनकी रचनाएं पढ़ते हुए पाठक को किसी शब्दकोश की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि हर पंक्ति सीधे दिल तक पहुंचती है।
किशन सरोज की कविता में प्रकृति केवल दृश्य नहीं, बल्कि भावों की साथी बनकर आती है। पेड़, नदी, धूप, चांद, बारिश और ऋतुएं उनके यहां जीवन के प्रतीक बन जाती हैं। वहीं सामाजिक विसंगतियों पर भी उनकी नज़र बेहद पैनी रही। बदलते मानवीय रिश्ते, टूटते पारिवारिक मूल्य, अकेलापन और समय की विडंबनाएं उनके गीतों में पूरी शिद्दत से दर्ज होती हैं, लेकिन वे निराशा नहीं फैलाते। उनके शब्द हमेशा उम्मीद का एक छोटा-सा दिया जलाए रखते हैं। रोहित कहते हैं कि मंचीय कविता में भी उनकी प्रस्तुति बेहद सधी हुई होती थी। वे ऊंचे स्वर या अभिनय के सहारे नहीं, बल्कि शब्दों की ताक़त और भावों की गहराई से श्रोताओं को बांध लेते थे।
रेडियो पर सुनते थे पिता की कविताएं
पिता की यादे ताजा करते हुए उनके सबसे छोटे बेटे सचिन सक्सेना बताते हैं कि सबसे छोटे थे, जिस वक्त पिता की कवि सम्मेलनों के मंच पर धूम मचती थी तब उनके स्कूली दिन थे। पिता के साथ कभी किसी कवि सम्मेलनों में जाना नहीं हुआ मगर रेडियो और टीवी पर आने वाले उनके कार्यक्रम सुनना अच्छा लगता था। अक्सर रिकॉर्डिंग के लिए आकाशवाणी रामपुर जाना होता था। साल 2020 में निधन से काफी पहले ही उन्होंने मंचों से दूरी बना ली थी। मगर आज भी उनकी कविताएं सुनते या पढ़ते हैं तो आज भी प्रासंगिक लगती हैं।
किशन सरोज ने 400 से ज्यादा लिखे गीत
कवि किशन सरोज का जन्म 19 जनवरी 1939 में यूपी जिला बरेली के बल्लिया ग्राम में हुआ। किशन सरोज ने 400 के आसपास प्रेमगीत लिखे। 1986 में उनका पहला गीत संग्रह 'चंदन वन डूब गया' प्रकाशित हुआ। लंबे अंतराल के बाद 2006 में 'बना न चित्र हवाओं का' नाम से गीत-गजल संग्रह प्रकाशित हुआ। 2004 में उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में 'साहित्य भूषण' सम्मान से भी सम्मानित किया गया।
