अमेजन का संकट और वैश्विक उदासीनता
अमेज़न को पृथ्वी के ‘फेफड़े’ कहा जाता है। यह क्षेत्र वैश्विक जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही जंगल आज आर्थिक हितों और संगठित अपराध के दबाव में लगातार सिकुड़ रहा है।
किसी युद्ध की कल्पना करते ही आंखों के सामने टैंक, लड़ाकू विमान, मिसाइलें और धधकते शहरों की तस्वीर उभरती है, लेकिन इक्कीसवीं सदी का एक ऐसा युद्ध भी है, जो बिना औपचारिक घोषणा के लगातार जारी है। इसमें न सेनाएं आमने-सामने हैं, न सीमाओं पर गोलाबारी हो रही है और न ही किसी देश ने युद्ध का एलान किया है। फिर भी इस संघर्ष में हर साल हजारों वर्ग किलोमीटर जंगल खत्म हो रहे हैं, नदियां प्रदूषित हो रही हैं, समुदाय विस्थापित हो रहे हैं और पर्यावरण की रक्षा करने वाले लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। यह युद्ध दक्षिण अमेरिका के अमेज़न वर्षावनों में चल रहा है।
अमेज़न को पृथ्वी के ‘फेफड़े’ कहा जाता है। विश्व के सबसे बड़े उष्णकटिबंधीय वर्षावनों में शामिल यह क्षेत्र वैश्विक जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। करोड़ों टन कार्बन को अपने भीतर समेटे यह वन केवल ब्राज़ील की संपत्ति नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा धरोहर है, लेकिन यही जंगल आज आर्थिक हितों और संगठित अपराध के दबाव में लगातार सिकुड़ रहा है। अमेज़न केवल दुनिया का सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय वर्षावन नहीं है। लगभग 67 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला यह वन पृथ्वी की जलवायु प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण आधार है। दुनिया के शेष उष्णकटिबंधीय वनों का लगभग आधा हिस्सा यहीं स्थित है।
वैश्विक स्तर पर ज्ञात जैव विविधता की लगभग 10 प्रतिशत प्रजातियां अमेज़न में पाई जाती हैं। करीब 4.7 करोड़ लोग, जिनमें 350 से अधिक आदिवासी समुदाय शामिल हैं, इसी पारिस्थितिकी तंत्र पर अपनी आजीविका और संस्कृति के लिए निर्भर हैं, इसलिए अमेज़न का संकट किसी एक देश का नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता का संकट है। लंबे समय तक जंगलों को विकास में बाधा माना जाता रहा। सड़कें, खनन, बड़े कृषि फार्म और औद्योगिक परियोजनाएं आर्थिक प्रगति के प्रतीक बन गईं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में यह स्पष्ट हुआ है कि प्रकृति की कीमत पर हासिल विकास अंततः समाज और अर्थव्यवस्था दोनों को असुरक्षित बना देता है।
ब्राज़ील के अमेज़न क्षेत्र में यही स्थिति दिखाई देती है। जंगलों को साफ कर कृषि भूमि बनाई जा रही है, खनिजों के दोहन के लिए बड़े पैमाने पर खनन हो रहा है और लकड़ी का अवैध कारोबार लगातार फैल रहा है। इन गतिविधियों के साथ भूमि पर कब्ज़े, हिंसा और संगठित अपराध का गठजोड़ भी मजबूत हुआ है। जहां जंगल कमज़ोर पड़ता है, वहां लोकतांत्रिक संस्थाएं भी कमज़ोर होती दिखाई देती हैं। ब्राज़ील के पास्टोरल लैंड कमीशन (CPT) के अनुसार हाल के वर्षों में देश में दर्ज ग्रामीण भूमि-संघर्षों में आधे से अधिक मामले अकेले अमेज़न क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। वर्ष 2024 में 2,185 भूमि-संघर्ष दर्ज किए गए, जिनमें 1,180 मामले अमेज़न क्षेत्र के थे। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है; यह प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की लड़ाई है।
कभी जंगल जीवन का आधार थे, आज वे पूंजी का आधार बनते जा रहे हैं। भूमि पर नियंत्रण का अर्थ अब केवल खेती नहीं रह गया है। उसके साथ खनिज संपदा, जल संसाधन, जैव विविधता, कार्बन बाज़ार, परिवहन मार्ग और स्थानीय राजनीतिक प्रभाव भी जुड़ गए हैं। इसी कारण जंगलों में अवैध खनन, लकड़ी की तस्करी, मादक पदार्थों के नेटवर्क और धन शोधन जैसी गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़ती जा रही हैं। पर्यावरण अपराध अब अलग-थलग अपराध नहीं रहे; वे संगठित आर्थिक तंत्र का हिस्सा बन चुके हैं।
यही वजह है कि अमेज़न के अनेक हिस्सों में राज्य की औपचारिक सत्ता से अधिक प्रभाव अपराधी समूहों का दिखाई देता है। नदियां परिवहन के प्राकृतिक मार्ग होने के कारण अवैध व्यापार की राह बन जाती हैं और जंगलों के भीतर बसे समुदाय सबसे अधिक असुरक्षित हो जाते हैं। जंगलों की रक्षा करने वाले लोग ही सबसे अधिक खतरे में हैं। आदिवासी समुदाय, नदी किनारे रहने वाले परिवार, वन उत्पादों पर निर्भर समाज और पर्यावरण कार्यकर्ता वर्षों से इन क्षेत्रों की रक्षा करते आए हैं। वे जंगल को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानते हैं, लेकिन जब जंगल आर्थिक हितों का केंद्र बन जाता है, तो यही समुदाय सबसे पहले निशाने पर आते हैं।
पर्यावरण कार्यकर्ता चिको मेंडेस की हत्या 1988 में हुई थी। वे रबर उत्पादक समुदायों और जंगलों के संरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे थे। उनकी हत्या ने दुनिया का ध्यान अमेज़न की ओर खींचा, लेकिन हिंसा रुकी नहीं। आज भी पर्यावरण रक्षकों की हत्या, धमकी और झूठे मुकदमे अनेक देशों में सामान्य घटना बन चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टें बताती हैं कि दुनिया भर में पर्यावरण और भूमि अधिकारों की रक्षा करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए सबसे जोखिम वाले क्षेत्रों में अमेज़न शामिल है।
अमेज़न का संकट केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है। जंगलों की कटाई से वातावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ती है। वर्षा चक्र प्रभावित होता है और सूखे तथा अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएं बढ़ने लगती हैं। दूसरी ओर, जब पानी और उपजाऊ भूमि की उपलब्धता घटती है, तो प्राकृतिक संसाधनों पर संघर्ष तेज़ हो जाता है। यानी जलवायु परिवर्तन और हिंसा एक-दूसरे को बढ़ाने वाले कारक बन चुके हैं।
पर्यावरण का विनाश केवल पारिस्थितिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का भी कारण बन रहा है। यह मान लेना आसान होगा कि अमेज़न का संकट केवल ब्राज़ील की नीतियों का परिणाम है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। दुनिया भर के बाज़ारों में पहुंचने वाला गोमांस, सोयाबीन, लकड़ी और खनिजों का एक हिस्सा उन इलाकों से आता है, जहां वनों की कटाई और भूमि संघर्ष जारी हैं। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
