विज्ञान को चाहिए राजनीतिक संरक्षण नियंत्रण नहीं

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Edited By Deepak Mishra
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विज्ञान का इतिहास बताता है कि कोई भी वैज्ञानिक क्रांति राजनीतिक और सामाजिक समर्थन के बिना संभव नहीं हुई। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को आधुनिक भारत का आधार माना था।

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राजेश श्रीनेत, वरिष्ठ पत्रकार

‘विज्ञान संगठित ज्ञान है और बुद्धि संगठित जीवन।’ प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक इमैनुअल कांट का यह कथन स्पष्ट करता है कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित गतिविधि नहीं, बल्कि सभ्यता के विकास का आधार है। दूसरी ओर राजनीति समाज की सामूहिक आकांक्षाओं को नीतियों में बदलने की कला है, इसलिए विज्ञान और राजनीति का संबंध स्वाभाविक भी है और अपरिहार्य भी।

समस्या तब उत्पन्न होती है, जब राजनीति विज्ञान का संरक्षक बनने के बजाय उसका नियंता बनने लगती है, तब वैज्ञानिक सत्य का स्थान राजनीतिक सुविधा लेने लगती है और ज्ञान की स्वतंत्रता सत्ता की प्राथमिकताओं के अधीन हो जाती है। भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि विज्ञान में राजनीतिक दखल कहां तक आवश्यक है और कहां से वह राष्ट्रीय हित के बजाय राष्ट्रीय क्षति का कारण बनने लगता है।

विज्ञान का इतिहास बताता है कि कोई भी वैज्ञानिक क्रांति राजनीतिक और सामाजिक समर्थन के बिना संभव नहीं हुई। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को आधुनिक भारत का आधार माना था। उनका प्रसिद्ध कथन था कि ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण केवल प्रयोगशाला की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति है।’

इसी सोच का परिणाम था कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन तथा अनेक राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की स्थापना हुई। आज भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियां, चंद्रयान और मंगलयान जैसी सफलताएं इस बात का प्रमाण हैं कि जब राजनीति दीर्घकालिक दृष्टि अपनाती है और विज्ञान को संसाधन उपलब्ध कराती है, तब उसका परिणाम केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास के रूप में सामने आता है।

इसी प्रकार कोविड-19 महामारी ने यह सिद्ध किया कि विज्ञान और राजनीति का सहयोग समाज के लिए कितना आवश्यक है। भारतीय वैज्ञानिकों ने अल्प समय में स्वदेशी वैक्सीन विकसित की और सरकार ने व्यापक टीकाकरण अभियान चलाकर उसे जन-जन तक पहुंचाया। यदि वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रशासनिक इच्छा शक्ति का यह समन्वय न होता, तो महामारी से होने वाली मानवीय और आर्थिक क्षति कहीं अधिक गंभीर होती। इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति का दायित्व विज्ञान को दिशा देना नहीं, बल्कि उसकी क्षमता को समाज तक पहुंचाने का माध्यम बनना है।

किन्तु इस सकारात्मक पक्ष के साथ एक गंभीर संकट भी जुड़ा हुआ है। अमेरिकी खगोलशास्त्री कार्ल सेगन ने चेतावनी दी थी, ‘जब समाज विज्ञान को समझना बंद कर देता है, तब वह अंधविश्वास और सत्ता के छल का शिकार हो जाता है।’ यह चेतावनी आज पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है। यदि वैज्ञानिक निष्कर्षों का मूल्यांकन प्रयोगों के बजाय राजनीतिक लाभ के आधार पर होने लगे, तो विज्ञान का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। लोकतंत्र में सरकार बदल सकती है, विचार धाराएं बदल सकती हैं, लेकिन वैज्ञानिक सत्य किसी राजनीतिक दल का समर्थक नहीं होता। वह केवल प्रमाणों का समर्थक होता है।

भारत में समय-समय पर वैज्ञानिक संस्थानों की स्वायत्तता, नियुक्तियों और अनुसंधान की प्राथमिकताओं को लेकर बहस होती रही है। यह बहस केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भी है। यदि किसी वैज्ञानिक संस्था का नेतृत्व योग्यता के स्थान पर राजनीतिक निकटता से प्रभावित दिखाई देता है, तो सबसे पहले जनता का विश्वास कमजोर होता है। विज्ञान का आधार विश्वसनीयता है और विश्वसनीयता का आधार स्वतंत्रता। स्वतंत्रता समाप्त होते ही विज्ञान प्रचार का साधन बन सकता है।

पर्यावरण नीति इस संघर्ष का सबसे स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है। वैज्ञानिक दशकों से चेतावनी देते रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण और जैव विविधता का क्षरण मानव सभ्यता के लिए गंभीर चुनौती हैं। इसके बावजूद अनेक बार विकास परियोजनाओं के मूल्यांकन में वैज्ञानिक रिपोर्टों की तुलना में राजनीतिक और आर्थिक हितों को प्राथमिकता दी जाती है। दिल्ली तथा उत्तर भारत का वायु प्रदूषण इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। वैज्ञानिक समाधान वर्षों से उपलब्ध हैं, लेकिन राजनीतिक समन्वय के अभाव और तात्कालिक लाभ की राजनीति के कारण समस्या लगातार बनी हुई है। इससे स्पष्ट होता है कि विज्ञान की उपेक्षा अंततः समाज को ही महंगी पड़ती है।

विज्ञान और राजनीति के संबंधों पर विचार करते समय प्रसिद्ध जीव विज्ञानी रिचर्ड डॉकिंस का यह कथन भी उल्लेखनीय है कि ‘विज्ञान की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह प्रमाण बदलने पर अपना निष्कर्ष बदल सकता है।’ राजनीति में यह लचीलापन प्रायः नहीं होता। वहां स्वीकारोक्ति को कई बार कमजोरी समझा जाता है। परिणामस्वरूप वैज्ञानिक तथ्यों और राजनीतिक आग्रहों के बीच टकराव उत्पन्न हो जाता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक संस्थानों को सरकार के प्रति उत्तरदायी तो होना चाहिए, लेकिन राजनीतिक रूप से आश्रित नहीं।

भारतीय संविधान भी इस दिशा में स्पष्ट संकेत देता है। अनुच्छेद 51(क) प्रत्येक नागरिक से वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन की भावना विकसित करने की अपेक्षा करता है। यह केवल नागरिकों का दायित्व नहीं, बल्कि राज्य की भी नैतिक जिम्मेदारी है कि वह वैज्ञानिक चेतना को प्रोत्साहित करे। यदि शासन व्यवस्था स्वयं अप्रमाणित दावों, छद्म विज्ञान या भावनात्मक प्रचार को वैज्ञानिक तथ्यों के समकक्ष प्रस्तुत करने लगे, तो संविधान की मूल भावना कमजोर होती है।

इसलिए राजनीति की भूमिका स्पष्ट और सीमित होनी चाहिए। सरकार अनुसंधान के लिए वित्त उपलब्ध कराए, राष्ट्रीय प्राथमिकताएं तय करे, वैज्ञानिक शिक्षा को प्रोत्साहित करे और शोध संस्थानों को वैश्विक स्तर की सुविधाएं प्रदान करे। इसके विपरीत वैज्ञानिक निष्कर्षों, आंकड़ों की व्याख्या, शोध की दिशा, विशेषज्ञों की नियुक्ति तथा अकादमिक स्वतंत्रता में उसका हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिए। लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और वैज्ञानिक स्वायत्तता का यही संतुलन किसी भी आधुनिक राष्ट्र की पहचान है।

वस्तुतः प्रश्न विज्ञान और राजनीति के संघर्ष का नहीं, बल्कि दोनों के दायित्वों की मर्यादा का है। राजनीति यदि विज्ञान को नियंत्रित करने का प्रयास करेगी, तो वह अल्पकालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों का त्याग करेगी, लेकिन यदि वह विज्ञान को स्वतंत्रता, संसाधन और संस्थागत सुरक्षा प्रदान करेगी, तो वही विज्ञान आर्थिक विकास, सामाजिक कल्याण, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे सशक्त आधार बनेगा। 

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