संपादकीय : त्रिभाषा की चुनौती
संपादकीय: त्रिभाषा की चुनौती- सीबीएसई की नीति, सुप्रीम कोर्ट का नजरिया और शिक्षा प्रणाली की वास्तविकता
अमृत विचार संपादकीय: सीबीएसई के त्रिभाषा सूत्र, राष्ट्रीय शिक्षा नीति और सर्वोच्च न्यायालय के हालिया दृष्टिकोण पर पढ़ें सटीक विश्लेषण।
भारत में भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति और राजनीति का संवेदनशील विषय है। ऐसे में सीबीएसई के त्रिभाषा सूत्र और इस पर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया दृष्टिकोण को मात्र 'हिंदी बनाम अंग्रेजी' के विवाद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका मूल उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति की उस भावना को लागू करना है, जो विद्यार्थियों को बहुभाषी और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना चाहती है। न्यायालय का हस्तक्षेप भी इसी बात को रेखांकित करता है कि भाषाई नीति संवैधानिक मूल्यों, छात्रों के हितों के लिए उचित और अनुकूल तो है, पर तीसरी भाषा का पाठ्यक्रम उसे नवीं कक्षा से आरंभ करने के बजाए शुरुआती कक्षाओं से ही लागू करना चाहिए।
वास्तव में त्रिभाषा सूत्र के तीन स्पष्ट स्तर हैं, पहला- मातृभाषा में बौद्धिक विकास; दूसरा, किसी अन्य भारतीय भाषा के जरिए राष्ट्रीय व सांस्कृतिक जुड़ाव; और तीसरा, वैश्विक अवसरों के लिए अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषा का ज्ञान। वैज्ञानिक शोध भी मानते हैं कि मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा बच्चों की मौलिक समझ और रचनात्मकता को मजबूत करती है। बहुभाषी विद्यार्थी भविष्य के वैश्विक रोजगार बाजार में अधिक सक्षम साबित होते हैं। आज एआई, अनुवाद, कूटनीति, पर्यटन और डिजिटल अर्थव्यवस्था में बहुभाषिकता एक बड़ी ताकत है। ऐसे में सरकारी दावे 'भाषाई मुक्ति' का अर्थ अंग्रेजी से पूर्णतः दूरी बनाना नहीं, बल्कि केवल अंग्रेजी की निर्भरता से आगे बढ़कर अपनी भाषाओँ में भी सक्षम होना है, हालांकि व्यावहारिक चुनौतियां बहुत बड़ी हैं। यदि अंग्रेजी को सामान्य 'विदेशी भाषा' मानकर इसकी भूमिका को कमतर किया गया, तो यह हमारे छात्रों के हित में नहीं होगा। आज उच्च शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और न्यायपालिका की मुख्य कार्यभाषा अंग्रेजी ही है, इसलिए यदि कोई छात्र अंग्रेजी, हिंदी और एक क्षेत्रीय भाषा चुनता है, तो उसे त्रिभाषा सूत्र की मूल भावना के अनुरूप ही माना जाना चाहिए। ऐसा न हो कि अन्य विदेशी भाषाएं जैसे जापानी, फ्रेंच या जर्मन उसे चौथी भाषा के तौर पर उसी स्कूल या उससे बाहर अलग से व्यय कर के सीखनी पड़े। इससे छात्रों, अभिभावकों पर अतिरिक्त शैक्षणिक और आर्थिक बोझ पड़ेगा। सबसे बड़ी चिंता इसके क्रियान्वयन की है। कक्षा छह से तीन भाषाएं पढ़ाने का विचार तभी सफल होगा, जब पर्याप्त प्रशिक्षित शिक्षक, गुणवत्तापूर्ण पाठ्य पुस्तकें और बुनियादी ढांचा तैयार हो। बिना ठोस तैयारी के इस नीति को थोपने से इसका मूल उद्देश्य ही कमजोर हो जाएगा। यह आशंका कि त्रिभाषा सूत्र सांस्कृतिक वर्चस्व थोपने का माध्यम है, केवल राजनीतिक लचीलेपन से दूर हो सकती है।
यदि राज्यों और विद्यार्थियों को भारतीय भाषाओं के चयन की पूरी स्वतंत्रता मिले, तो यह विवाद स्वतः समाप्त हो जाएगा। कुल मिलाकर भारत को एक ऐसी व्यावहारिक बहुभाषा नीति चाहिए, जो हमारी मातृभाषा की जड़ों को मजबूत करे, अन्य भारतीय भाषाओं से जुड़ाव बढ़ाए और अंग्रेजी के माध्यम से वैश्विक अवसरों के द्वार भी खुले रखे। शिक्षा का उद्देश्य भाषाई संघर्ष पैदा करना नहीं, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना है, जो अपनी जड़ों से जुड़ी हो और दुनिया से आत्मविश्वास के साथ संवाद कर सके। संभव है सरकार और शिक्षा शास्त्री इस बारे में गंभीरता और उदारता से सोचेंगे।
