मत्स्य विज्ञान में रोजगार और उद्यमिता की असीम संभावनाएं

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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भारत एक विशाल समुद्री तट, नदियों, झीलों, जलाशयों और तालाबों वाला देश है। यही कारण है कि मत्स्य क्षेत्र आज भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक बन चुका है। पिछले एक दशक में मत्स्य उत्पादन, जलीय कृषि, प्रसंस्करण तथा निर्यात के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आज भारत विश्व के प्रमुख मत्स्य उत्पादक देशों में अग्रणी स्थान रखता है तथा जलीय कृषि उत्पादन में भी उसका महत्वपूर्ण योगदान है। कृषि के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने वाले प्रमुख क्षेत्रों में मत्स्य क्षेत्र का स्थान निरंतर मजबूत हो रहा है। ऐसे समय में मत्स्य विज्ञान युवाओं के लिए रोजगार, स्वरोजगार और उद्यमिता का अत्यंत आकर्षक विकल्प बन सकता है।

बहुआयामी विज्ञान

मत्स्य विज्ञान केवल मछली पालन का विषय नहीं है। यह जल, जीव और आधुनिक प्रौद्योगिकी के समन्वय से विकसित एक बहुआयामी विज्ञान है। इसके अंतर्गत जल एवं मृदा परीक्षण, मत्स्य बीज उत्पादन, मछली, झींगा सहित अन्य जलीय जीवों का पालन, मत्स्य पोषण, मत्स्य रोग प्रबंधन, मत्स्य विविधता संरक्षण, जलाशय प्रबंधन, मत्स्य पकड़ने की आधुनिक तकनीक, मत्स्य प्रसंस्करण, गुणवत्ता नियंत्रण, कोल्ड-चेन, पैकेजिंग, मूल्य संवर्धित उत्पादों का निर्माण,जाल एवं नावों के प्रकार, उपयोग एवं निर्माण,विपणन तथा निर्यात तक की संपूर्ण श्रृंखला का अध्ययन किया जाता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में शिक्षित एवं प्रशिक्षित मानव संसाधन की मांग निरंतर बढ़ रही है।

रोजगार के अवसर

आज मत्स्य विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए सरकारी तथा निजी दोनों क्षेत्रों में रोजगार के व्यापक अवसर उपलब्ध हैं। राज्य मत्स्य विभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के संस्थान, कृषि एवं मत्स्य विश्वविद्यालय, अनुसंधान प्रयोगशालाएं, मत्स्य विकास निगम, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, निर्यात कंपनियां तथा बहुराष्ट्रीय संस्थान योग्य मत्स्य विशेषज्ञों की नियुक्ति करते हैं। मत्स्य विकास अधिकारी, मत्स्य निरीक्षक, वैज्ञानिक, अनुसंधान अधिकारी, हैचरी प्रबंधक, गुणवत्ता नियंत्रण अधिकारी, मत्स्य प्रसंस्करण विशेषज्ञ, परियोजना प्रबंधक तथा विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में शिक्षक के रूप में उत्कृष्ट करियर बनाया जा सकता है। वर्तमान समय में स्वरोजगार की दृष्टि से मत्स्य विज्ञान और भी अधिक संभावनाशील बन गया है। वैज्ञानिक तकनीकों के कारण सीमित भूमि और कम जल में भी लाभदायक मत्स्य पालन संभव हो गया है। बायोफ्लॉक तकनीक, पुनर्चक्रणीय जल प्रणाली (आरएएस), केज कल्चर, पेन कल्चर, झींगा पालन तथा एकीकृत मत्स्य कृषि जैसी आधुनिक प्रणालियां युवाओं को कम निवेश में अच्छा लाभ अर्जित करने का अवसर प्रदान कर रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक शिक्षित युवा पारंपरिक खेती के साथ मत्स्य पालन जोड़कर अपनी आय कई गुना बढ़ा सकते हैं।

आज मत्स्य विज्ञान केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ अनेक नए उद्योग विकसित हो रहे हैं। मत्स्य बीज उत्पादन, मत्स्य आहार निर्माण, मत्स्य जाल निर्माण,एक्वेरियम निमार्ण एवं रखरखाव, एक्वेरियम एवं अलंकरणीय मछली पालन, मत्स्य औषधियों, उपकरणों तथा सजावटी सामान का व्यापार, मत्स्य प्रसंस्करण इकाइयां, शीत भंडारण, ई-मार्केटिंग, मत्स्य परिवहन, मूल्य संवर्धित खाद्य पदार्थों का निर्माण तथा मत्स्य पर्यटन जैसे क्षेत्रों में भी स्वरोजगार की व्यापक संभावनाएं उपलब्ध हैं। महिला स्व-सहायता समूह भी मत्स्य प्रसंस्करण एवं विपणन के माध्यम से आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर सकती है।

सरकार की प्राथमिकता

भारत सरकार ने मत्स्य क्षेत्र के विकास को राष्ट्रीय प्राथमिकता प्रदान की है। प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना  के माध्यम से मत्स्य पालन, हैचरी स्थापना, बायोफ्लॉक इकाइयों, मत्स्य प्रसंस्करण, शीत भंडारण, विपणन तथा अवसंरचना विकास के लिए प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, बैंक ऋ ण एवं अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है। इन योजनाओं का उद्देश्य मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ युवाओं को उद्यमी बनाना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करना है। शैक्षणिक दृष्टि से भी यह विषय निरंतर विस्तार प्राप्त कर रहा है। विज्ञान संकाय विशेषकर प्राणीशास्त्र एवं जीवविज्ञान में रुचि रखने वाले विद्यार्थी बी.एफ.एस-सी., एम.एफ.एस-सी. तथा पी-एच.डी.,डी.एस-सी तक अध्ययन कर सकते हैं। देश के अनेक केन्द्रीय शोध संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, मत्स्य एवं अन्य महाविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अनुसंधान एवं रोजगार की सुविधाएं उपलब्ध हैं। मध्य प्रदेश जैसे भू-आवेष्ठित राज्यों में भी मत्स्य पालन तेजी से विकसित हो रहा है। प्रदेश की नदियां ,विशाल जलाशय, बांध और तालाब मत्स्य उत्पादन एवं मत्स्य संग्रहण की अपार संभावनाएं रखते हैं।


– डॉ. मनमोहन प्रकाश  

 

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