संस्कृति और आस्था का प्रतीक शंख

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Published By Anjali Singh
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हिंदू धर्म में शंख को अत्यंत पवित्र, मंगलकारी तथा धन-धान्य और आरोग्य प्रदान करने वाला माना गया है। किसी भी पूजा, आरती, हवन या यज्ञ का शुभारंभ और समापन शंखध्वनि से किया जाता है। मान्यता है कि शंख की ध्वनि वातावरण को शुद्ध करती है तथा नकारात्मक ऊर्जा का नाश करती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने शंखचूड़ नामक राक्षस का वध किया था। इसी कारण शिव पूजा में शंख का प्रयोग वर्जित माना गया है।

शिवलिंग पर शंख के जल से रुद्राभिषेक भी नहीं किया जाता। दूसरी ओर समुद्र मंथन से निकले 18 रत्नों में शंख आठवां रत्न था और उसी मंथन से देवी लक्ष्मी भी प्रकट हुई थीं। इसलिए शंख को लक्ष्मी का भाई कहा गया है। भगवान विष्णु के चार आयुधों-शंख, चक्र, गदा और पद्म में शंख का विशेष स्थान है।

वैज्ञानिक दृष्टि से शंख मोलस्क वर्ग का समुद्री जीव है। सीपी, घोंघा और कौड़ी भी इसी वर्ग के जीव हैं। ये समुद्र, कैलाश मानसरोवर तथा कुछ पर्वतीय जलाशयों में पाए जाते हैं। जीव के मरने के बाद उसका कठोर खोल शंख के रूप में प्राप्त होता है। हालांकि कई स्थानों पर जीवित प्राणियों से भी शंख निकालने की बात कही जाती है, जो उचित नहीं मानी जाती। मुख्य रूप से शंख तीन प्रकार के बताए गए हैं- दक्षिणावर्त, गणेश शंख तथा वामावर्त शंख। 


इनमें दक्षिणावर्त शंख सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का प्रसिद्ध पांचजन्य शंख दक्षिणावर्त था, जिसका उपयोग उन्होंने महाभारत युद्ध में किया। अर्जुन के शंख का नाम देवदत्त, युधिष्ठिर का अनंतविजय, भीम का पौण्ड्र, नकुल का सुघोष और सहदेव का मणिपुष्पक था। भीष्म पितामह के शंख को गंगनाद कहा गया है। इसके अतिरिक्त हीरा शंख, मोती शंख आदि अनेक प्रकार भी वर्णित हैं। शंख को पूजा घर में लाल या पीले स्वच्छ वस्त्र में लपेटकर रखना चाहिए।

उपयोग से पहले उसे स्वच्छ जल से धोना उचित माना गया है। जिन घरों में प्रतिदिन पूजा होती है, वहां देवप्रतिमाओं के साथ शंख की भी धूप, दीप और नैवेद्य से पूजा की जाती है। पुराणों में कहा गया है कि जिस घर में शंख रहता है, वहां आरोग्य, समृद्धि और लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है तथा कलह कम होते हैं। लोकमान्यताओं के अनुसार स्त्रियों द्वारा शंख बजाने से परहेज करने की बात कही गई है। 

वहीं यह भी माना जाता है कि नियमित रूप से शंख बजाने से पुरुषों के फेफड़े, हृदय और श्वसन तंत्र को लाभ मिलता है तथा स्नायु मजबूत होते हैं। हालांकि इन दावों की आधुनिक चिकित्सा द्वारा पूर्ण पुष्टि उपलब्ध नहीं है। रात्रि में शंख बजाना भी वर्जित माना गया है।

बद्रीनाथ मंदिर में शंख बजाने की परंपरा नहीं है। मान्यता है कि जब तुलसी रूप में लक्ष्मीजी तपस्या कर रही थीं, उसी समय शंखचूड़ का वध हुआ था। उनकी तपस्या में बाधा न आए, इसलिए वहां शंखध्वनि नहीं की जाती। यह भी विश्वास है कि तेज गर्जन या आकाशीय बिजली की आशंका के समय शंख बजाने से भय कम होता है। शंख और कौड़ी दोनों ही हिंदू परंपरा में अत्यंत पवित्र माने गए हैं। घर में कभी भी टूटा-फूटा शंख नहीं रखना चाहिए। बाजार में असली और नकली शंख दोनों मिलते हैं, इसलिए खरीदते समय उसकी सही पहचान करना आवश्यक है।

शिवचरण चौहान