शिक्षकों के संकट से जूझती देश की शिक्षा व्यवस्था
असिस्टेंट प्रोफेसर, शाहजहांपुर
जरा कल्पना कीजिए कि कोई विशाल इमारत निरंतर नई-नई मंजिलों के साथ ऊंचाई की ओर बढ़ रही हो, किंतु उसी समय यह पता चले कि उसकी नींव ही कमजोर पड़ने लगी है, ऐसी स्थिति में उस इमारत का विस्तार भले ही आकर्षक दिखाई दे, किंतु उसकी स्थिरता, सार्थकता और भविष्य दोनों संदेह के घेरे में आ जाते हैं।
भारतीय शिक्षा व्यवस्था भी वर्तमान में काफी हद तक ऐसे ही द्वंद्व से गुजरती हुई प्रतीत होती है। एक ओर नई शिक्षा नीति, डिजिटल शिक्षण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कौशल विकास और विकसित भारत जैसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य हैं, वहीं दूसरी ओर विद्यालयों में शिक्षकों की कमी जैसी बुनियादी चुनौती लगातार गहराती दिखाई दे रही है। भारत आज उस दौर में खड़ा है, जहां वह स्वयं को ज्ञान व कौशल आधारित अर्थव्यवस्था एवं विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
नई शिक्षा नीति, डिजिटल शिक्षा, कौशल विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसे शब्द आज केवल नीतिगत दस्तावेजों तक ही सीमित नहीं हैं, अपितु देश की विकास यात्रा के प्रमुख आधार बन चुके हैं। इन सभी महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के बीच यदि विद्यालयों की मूलभूत स्थिति पर दृष्टि डाली जाए, तो अनेक ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जो हमारी शिक्षा व्यवस्था की चुनौतीपूर्ण वास्तविक तस्वीर को उजागर करते हैं।
शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (यू-डाइस प्लस) 2025-26 रिपोर्ट भी ऐसी ही एक चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करती है। रिपोर्ट का सबसे विचारणीय तथ्य यह है कि देश में आज भी एक लाख से अधिक विद्यालय ऐसे हैं, जहां केवल एक ही शिक्षक कार्यरत है। यद्यपि संतोषजनक बात यह है कि पिछले वर्ष की तुलना में इसमें कमी दर्ज की गई है, फिर भी यह संख्या इतनी बड़ी है कि इसे यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता। यह उस भारत का चित्र है, जो विकसित भारत बनने का सपना तो देख रहा है, लेकिन उसके लाखों बच्चों का भविष्य आज भी एक अकेले शिक्षक के कंधों पर टिका हुआ है।
वस्तुतः यह तथ्य केवल विद्यालयों में शिक्षकों की कमी का संकेत नहीं देता, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, समान अवसर, सामाजिक न्याय और संवैधानिक दायित्वों पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। संविधान ने प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार दिया है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम भी प्रत्येक विद्यालय में निर्धारित छात्र-शिक्षक अनुपात सुनिश्चित करने की बात करता है। नई शिक्षा नीति भी विद्यार्थी केंद्रित, गतिविधि आधारित और अनुभवात्मक शिक्षा पर बल देती है। किंतु जब किसी विद्यालय में पहली से पांचवीं अथवा आठवीं तक की कक्षाओं को पढ़ाने के लिए केवल एक शिक्षक उपलब्ध हो, तब इन सभी आदर्शों का वास्तविक क्रियान्वयन नितांत असंभव हो जाता है।
एक शिक्षक को केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले व्यक्ति के रूप में ही नहीं देखा जा सकता, अपितु वह एक व्यापक भूमिका का स्वामी है। वह बच्चों के व्यक्तित्व का निर्माता, उनके सपनों का मार्गदर्शक और समाज का रचनाकार होता है। किंतु जब उसी शिक्षक पर अनेक कक्षाओं का शिक्षण, कार्यालयी कार्य, अभिलेखों का संधारण, सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन आदि विभिन्न गैर-शिक्षण जिम्मेदारियां भी डाल दी जाती हैं, तब उससे उत्कृष्ट शिक्षण की अपेक्षा करना कहीं न कहीं अन्याय प्रतीत होता है।
एकल शिक्षक विद्यालयों की वास्तविकता को देखें, तो वह समझ सकता है कि यह समस्या केवल शिक्षकों की संख्या तक सीमित नहीं है। एक शिक्षक को एक ही समय में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को अलग-अलग विषय पढ़ाने पड़ते हैं। जरा सोचिए कि वह एक ही समय पर पहली कक्षा के बच्चों को वर्णमाला सिखा रहा होता है, तो वहीं तीसरी कक्षा के बच्चे उसी के निर्देशन में गणित का अभ्यास कर रहे होते हैं और पांचवीं के विद्यार्थी विज्ञान की पुस्तक खोलकर उसकी प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।
ऐसे वातावरण में किसी भी कक्षा को पूरा समय नहीं मिल पाता, नतीजा यह होता है कि शिक्षक की प्रतिभा विद्यार्थियों को गढ़ने का कार्य सफलतापूर्वक न कर पाने पर विवश हो जाती है। परिणामस्वरूप बच्चों की शंकाएं अधूरी रह जाती हैं, अभ्यास कमजोर रह जाता है और सीखने की प्रक्रिया धीरे-धीरे औपचारिकता बनकर रह जाती है। ऐसी दशा में शिक्षा केवल उपस्थिति दर्ज कराने तक सीमित हो जाती है। यह स्थिति विशेष रूप से ग्रामीण, पर्वतीय, सीमावर्ती और आदिवासी क्षेत्रों में अधिक दिखाई देती है।
हालांकि रिपोर्ट का सकारात्मक पक्ष यह है कि विद्यालय छोड़ने की दर में कमी आई है। शून्य नामांकन वाले विद्यालयों की संख्या घटी है, महिला शिक्षकों की भागीदारी बढ़ी है और बालिकाओं का नामांकन भी बढ़ा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2025-26 में 100843 विद्यालय ऐसे हैं, जो केवल एक शिक्षक के जिम्मे हैं, जबकि 2024-25 में यह संख्या 1,04,125 था। इसी तरह शून्य नामांकन का आंकड़ा 2025-26 में 5663 रहा है, जबकि 2024-25 में यह आंकड़ा 7993 था। शिक्षकों की संख्या के बारे में यदि बात की जाए, तो वर्ष 2022-23 की तुलना में 2025-26 में शिक्षकों की संख्या में 8.3 फीसदी की वृद्धि हुई है। महिला शिक्षकों की भागीदारी भी वर्ष 2025-26 में 54.9 प्रतिशत रही है एवं यही कारण है कि बालिकाओं का नामांकन भी बढ़कर 48.4 फीसदी हो गया है।
ये सारे संकेत बताते हैं कि सरकार की अनेक योजनाएं सही दिशा में काम कर रही हैं। किंतु केवल बच्चों का विद्यालय तक पहुंचना पर्याप्त नहीं है। यदि विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण ही उपलब्ध न हो, तो नामांकन के आंकड़े भविष्य नहीं बदल सकते। आवश्यकता है कि शिक्षकों की कमी को एक गंभीर चुनौती के रूप में देखते हुए इसके समाधान पर दूरदर्शितापूर्वक विचार किया जाए ताकि भावी विकसित भारत का महल एक सशक्त नींव पर खड़ा हो।
