मॉय फर्स्ट राइड : जान बची तो लाखों पाए

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Published By Anjali Singh
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जिंदगी में कुछ ऐसे वाकये और घटनाएं होती हैं, जो सदैव जेहन में याद रहती हैं। यौवन की दहलीज पर किसी वाहन को चलाना सीखना और फिर उससे जुड़ी कोई दुर्घटना हो जाए, तो उसे कैसे भुलाया जा सकता है। उस अनुभव को याद करना आज भी उत्साह, घबराहट, दर्द और संतोष का मिला-जुला अहसास कराता है।

सबकी तरह मैंने भी सबसे पहले साइकिल चलाना सीखा। तब मैं कक्षा आठ में था, जब ताऊजी ने मुझे हरे रंग की हरक्यूलिस साइकिल खरीदकर दी थी। मेरा निर्मला स्कूल घर से लगभग चार किलोमीटर दूर था, इसलिए साइकिल आवागमन का सबसे अच्छा साधन बन गई। उससे पहले मैं सिटी बस से स्कूल जाया करता था। स्कूल से लेकर बीएससी तक की पढ़ाई के दौरान मेरा अधिकांश सफर साइकिल पर ही बीता।

पढ़ाई पूरी होने के बाद बेंगलुरु की एक दवा कंपनी में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (एमआर) की नौकरी मिल गई। भागदौड़ वाली इस नौकरी में दोपहिया वाहन की जरूरत थी। उस समय स्कूटर ज्यादा प्रचलन में थे और मोटरसाइकिलें कम दिखाई देती थीं। स्कूटर चलाना सीखने में मेरे चचेरे भाई गिरीश चंद्र नौगांई और मित्र राजेंद्र लाल साह उर्फ ‘राजू लाला’ ने बहुत मदद की। राजू की दुकान थी, इसलिए सभी उन्हें इसी नाम से पुकारते थे। आज वे इस दुनिया में नहीं हैं। कुछ दिन अभ्यास करने के बाद मैंने बजाज कंपनी का काले रंग का चेतक स्कूटर खरीद लिया। 

नया स्कूटर खरीदे हुए अभी एक सप्ताह ही हुआ था कि बिना हेलमेट पहने अकेले नैनीताल जाने निकल पड़ा। उस समय यह अनुभव नहीं था कि पहाड़ी रास्तों पर वाहन चलाना मैदानी इलाकों से बिल्कुल अलग और कहीं अधिक जोखिम भरा होता है। नया स्कूटर और नया जोश था, इसलिए गति भी कुछ तेज थी। ज्योलीकोट तक सफर ठीक रहा, लेकिन बल्दियाखान से आगे, नैनीताल से लगभग पांच किलोमीटर पहले एक मोड़ पर अचानक सामने से रोडवेज की बस आ गई। एक पल के लिए समझ ही नहीं आया कि क्या करूं। बस तो निकल गई, लेकिन घबराहट में मैं स्कूटर पर नियंत्रण खो बैठा और ब्रेक लगाना भी भूल गया। स्कूटर सड़क किनारे पैराफिट से टकराकर पलट गया और मैं लगभग दस-पंद्रह फीट नीचे खाई में जा गिरा।

कुछ देर तक होश नहीं रहा। जब संभला तो खुद को झाड़ियों के बीच पाया। हाथ-पांव छिल गए थे और खून निकल रहा था। किसी तरह सड़क तक पहुंचा। उस समय ट्रैफिक बहुत कम होता था, इसलिए किसी ने मुझे गिरते हुए नहीं देखा। थोड़ी देर सड़क किनारे बैठा रहा। फिर स्कूटर सीधा किया और तभी हिंदी का वह मुहावरा याद आया- “जान बची तो लाखों पाए।” सचमुच उस दिन उसका वास्तविक अर्थ समझ में आया। किसी तरह घर पहुंचा और राजू लाला को साथ लेकर स्कूटर वर्कशॉप में ठीक कराने दे आया।  आज भी जब कभी नैनीताल जाता हूं और उस मोड़ से गुजरता हूं, तो यह घटना अनायास ही याद आ जाती है। लगता है, जैसे यह सब कल की ही बात हो।
      

-दीपक नौगाई, हल्द्वानी