देश का आर्थिक विकास और नई चुनौतियां
आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक विकास का सबसे बड़ा आधार भारत बन सकता है, लेकिन इसी समय बढ़ता सरकारी कर्ज, जलवायु परिवर्तन, जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव जैसी कई चुनौतियां भी सामने खड़ी हैं।
वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ
किसी भी परिवार की आय यदि लगातार कम होती जाए और खर्च बढ़ते जाएं, तो एक समय ऐसा आता है, जब उसे अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लेना पड़ता है। शुरुआत में यह कर्ज राहत देता है, लेकिन यदि उससे कमाई बढ़ाने वाले काम न किए जाएं तो धीरे-धीरे वही कर्ज बोझ बन जाता है। यही बात किसी देश की अर्थव्यवस्था पर भी लागू होती है। कर्ज अपने आप में बुरा नहीं होता, लेकिन यदि उसका सही उपयोग न हो और साथ ही नई आर्थिक चुनौतियां सामने आ जाएं, तो भविष्य में वित्तीय दबाव बढ़ सकता है। आज भारत के सामने भी कुछ ऐसे ही संकेत दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें समय रहते समझना बेहद जरूरी है।
भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। मजबूत घरेलू बाजार, डिजिटल क्रांति, तेजी से विकसित होता बुनियादी ढांचा, बढ़ता विनिर्माण और युवा आबादी भारत की सबसे बड़ी ताकत हैं। दुनिया की कई प्रमुख संस्थाएं मानती हैं कि आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक विकास का सबसे बड़ा आधार भारत बन सकता है, लेकिन इसी समय बढ़ता सरकारी कर्ज, जलवायु परिवर्तन, संभावित अल-नीनो, बढ़ती बिजली की मांग, जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, निर्यात की अनिश्चितता और कृषि क्षेत्र की चुनौतियां भी हमारे सामने खड़ी हैं।
यह स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है कि भारत इस समय किसी कर्ज संकट में नहीं है। सरकार लगातार वित्तीय अनुशासन बनाए रखने का प्रयास कर रही है। केंद्रीय बजट 2026-27 में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 4.3 प्रतिशत रखा गया है, जबकि पिछले वर्ष का संशोधित अनुमान 4.4 प्रतिशत था। यह दर्शाता है कि सरकार धीरे-धीरे वित्तीय संतुलन की दिशा में आगे बढ़ रही है।
फिर भी चिंता की बात यह है कि यदि भविष्य में आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ती है और दूसरी ओर सरकारी कर्ज तथा उस पर ब्याज का बोझ लगातार बढ़ता रहता है, तो सरकार के पास विकास कार्यों पर खर्च करने की क्षमता सीमित हो सकती है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार भारत का कुल सार्वजनिक कर्ज देश की GDP के लगभग 83 प्रतिशत के बराबर है। यह स्तर अभी चिंता का कारण नहीं माना जाता, लेकिन यह जरूर बताता है कि उधार लिए गए धन का उपयोग बहुत सोच-समझकर करना होगा।
यदि कर्ज का उपयोग सड़क, रेलवे, बंदरगाह, सिंचाई, जल संरक्षण, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान और उद्योग जैसे क्षेत्रों में किया जाता है, तो यही निवेश भविष्य में रोजगार और आय बढ़ाता है, लेकिन यदि उधार का बड़ा हिस्सा केवल सरकारी खर्च पूरे करने में लगने लगे, तो आने वाले वर्षों में विकास की गति प्रभावित हो सकती है। इस समय जलवायु परिवर्तन भी आर्थिक जोखिमों को बढ़ा रहा है। लगातार बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएं खेती को प्रभावित कर सकती हैं। यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो फसल उत्पादन घट सकता है। इससे खाद्य पदार्थ महंगे होंगे, किसानों की आय कम होगी और ग्रामीण क्षेत्रों की खरीद क्षमता प्रभावित होगी। जब गांवों में मांग कम होती है, तो उसका असर शहरों के उद्योगों और व्यापार पर भी पड़ता है।
भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत आधार सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग यानी एमएसएमई हैं। यह क्षेत्र देश की GDP में लगभग 30.1 प्रतिशत, विनिर्माण उत्पादन में 35.4 प्रतिशत और कुल निर्यात में लगभग 45.7 प्रतिशत का योगदान देता है। करोड़ों लोगों को रोजगार देने वाला यही क्षेत्र सबसे पहले महंगे कर्ज, कमजोर मांग, बढ़ती ऊर्जा लागत और भुगतान में देरी का असर झेलता है। यदि एमएसएमई कमजोर पड़ते हैं, तो इसका प्रभाव रोजगार, उत्पादन और बैंकिंग व्यवस्था तक पहुंचता है।
ऊर्जा सुरक्षा भी आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रही है। एयर कंडीशनर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन, शहरीकरण और औद्योगिक विस्तार के कारण बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर, बिजली उत्पादन में अभी भी जीवाश्म ईंधनों की बड़ी हिस्सेदारी है। यदि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल या गैस की कीमतें बढ़ती हैं या पश्चिम एशिया में तनाव गहराता है, तो भारत का आयात बिल बढ़ेगा। इससे महंगाई बढ़ सकती है और आम परिवारों का मासिक बजट प्रभावित हो सकता है।
इसके साथ ही दुनिया में बढ़ते व्यापारिक तनाव और भू-राजनीतिक संघर्ष भारत के निर्यात पर भी असर डाल सकते हैं। यदि वैश्विक मांग कमजोर होती है, तो भारतीय उद्योगों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। मार्च 2026 तक भारत का बाहरी कर्ज लगभग 762.8 अरब अमेरिकी डॉलर था, हालांकि यह GDP का लगभग 20.8 प्रतिशत है और फिलहाल सुरक्षित स्तर पर माना जाता है, फिर भी बदलती वैश्विक परिस्थितियों में इस पर लगातार नजर रखना जरूरी है। यदि उद्योगों की आय घटती है और एमएसएमई कमजोर होते हैं, तो इसका असर बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर भी पड़ सकता है। ऋण चुकाने में कठिनाई बढ़ने से खराब ऋण (NPA) बढ़ सकते हैं और नए निवेश की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। इसका सीधा असर रोजगार और आर्थिक विकास पर दिखाई देगा।
इन चुनौतियों का समाधान भी हमारे पास है। सरकार को वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हुए पूंजीगत निवेश बढ़ाना होगा। जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, सिंचाई व्यवस्था, अक्षय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, घरेलू विनिर्माण, अनुसंधान, कौशल विकास और निर्यात प्रतिस्पर्धा को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। साथ ही सरकारी खर्च की गुणवत्ता सुधारना और कर आधार को मजबूत करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
