संपादकीय : श्रुति-स्मृति की स्वरगाथा
तीजन बाई का निधन केवल भारतीय लोकसंगीत की एक युगांतकारी आवाज़ का मौन हो जाना नहीं है, बल्कि भारत की उस जीवंत सांस्कृतिक परंपरा की गहरी क्षति है, जिसमें ज्ञान पुस्तकों से अधिक स्मृति, वाणी और अनुभव के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता रहा है। उनके साथ मानो भारतीय लोकजीवन की वह सजीव पाठशाला भी विदा हुई, जो बिना किसी औपचारिक विश्वविद्यालय के महाभारत जैसे महाकाव्य को जन-जन तक पहुंचाती रही। इस अर्थ में उन्हें भारत की प्राचीन श्रुति-स्मृति परंपरा की सबसे सशक्त प्रतिनिधियों में गिना जाना चाहिए। तीजन बाई इस बात का जीवंत प्रमाण थीं कि ज्ञान का मूल्य केवल डिग्रियों से नहीं, बल्कि उसकी आत्मसात करने की क्षमता से तय होता है।
पांचवीं कक्षा तक औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने वाली इस लोकगायिका को महाभारत का विशाल आख्यान लगभग कंठस्थ था। यही नहीं, देश-विदेश के विश्वविद्यालयों ने उन्हें अनेक मानद डीलिट् उपाधियों से सम्मानित किया। यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए भी एक संदेश है कि लोकबुद्धि, अनुभव और परंपरागत ज्ञान किसी विश्वविद्यालय की चारदीवारी से कम महत्वपूर्ण नहीं होते।
उनकी दमदार आवाज़, ओजस्वी प्रस्तुति और अद्भुत अभिनय ने महाभारत को केवल सुनाया नहीं, बल्कि मंच पर जीवंत कर दिया। यही कारण है कि उनकी प्रस्तुतियां भाषा की सीमाएं पार कर फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, अमेरिका और अनेक देशों तक पहुंचीं। उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि यह भी रही कि उन्होंने पंडवानी की पुरुष-प्रधान कापालिक शैली में प्रस्तुति देकर सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी।
इसके कारण उन्हें सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ा, यह भारतीय समाज में प्रतिभा और समान अवसर के पक्ष में दिया गया सांस्कृतिक प्रतिरोध था। उन्होंने सिद्ध किया कि परंपरा का सम्मान तभी संभव है, जब उसमें परिवर्तन का साहस भी हो। तीजन बाई की कला मनोरंजन से कहीं आगे थी। उनके लिए महाभारत केवल युद्ध का आख्यान नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन था।
भीम, अर्जुन, कुंती, द्रौपदी और कृष्ण के प्रसंगों के माध्यम से वे साहस, न्याय, मातृत्व, कर्तव्य और नैतिकता का संदेश देती थीं। उनके गायन में लोक शिक्षा, लोक दर्शन और लोक संस्कार का अद्भुत संगम दिखाई देता था। इस दृष्टि से वे लोक कलाकार से अधिक लोक शिक्षक थीं। तीजन बाई जैसी ऊर्जस्वी प्रस्तुति, स्वर की गूंज और अभिनय का सम्मिलित प्रभाव विरल था, इसलिए उनके बाद कापालिक शैली का भविष्य केवल शिष्यों पर नहीं, बल्कि संस्थागत संरक्षण पर भी निर्भर करेगा।
आवश्यकता है कि सरकार लोककलाओं को केवल पुरस्कारों तक सीमित न रखे। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में लोकसंगीत के अध्ययन को बढ़ावा दिया जाए, डिजिटल अभिलेखागार बनें, वरिष्ठ लोक कलाकारों के प्रदर्शन का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण हो तथा युवा कलाकारों के लिए छात्रवृत्तियां और राष्ट्रीय प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाएं। समाज को भी यह समझना होगा कि लोककलाएं केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास की आधारशिला हैं।
तीजन बाई चली गईं, किंतु उनकी आवाज़ भारतीय लोकस्मृति में लंबे समय तक गूंजती रहेगी। उन्हें केवल महान लोकगायिका के रूप में याद करना पर्याप्त नहीं होगा। वे उस जीवित परंपरा की प्रहरी थीं, जिसने सिद्ध किया कि जब स्मृति, साधना और संस्कृति एक हो जाएं, तब लोककला इतिहास नहीं बनती— वह पीढ़ियों का भविष्य गढ़ती है।
