संपादकीय : मानसून एक परीक्षा

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Published By Deepak Mishra
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दस दिन देर से आने वाले मानसून का स्वागत है। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में मानसून की सक्रियता ने भीषण गर्मी और जल संकट से जूझ रहे इस क्षेत्र के लोगों को बड़ी राहत दी है। इस वर्ष जून में तकरीबन 60 फीसद कम वर्षा हुई, ऐसे में वास्तविक परीक्षा अब जुलाई और अगस्त की वर्षा की है, क्योंकि इन्हीं महीनों पर कृषि, पेयजल, जलाशयों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भविष्य निर्भर करता है।

क्षेत्रीय मौसम विभाग ने जुलाई में भी सामान्य से कम वर्षा की आशंका व्यक्त की है। यदि यह अनुमान सही सिद्ध होता है, तो कृषि, जल संसाधन और खाद्य सुरक्षा की चिंता और गहरी हो जाएगी। तय है कि इस वर्षा से पिछले दिनों के बारिश की कमी पूरी नहीं होगी। ये बारिश सांख्यिकीय औसत तो सुधार सकती है, किंतु मिट्टी में नमी, भू-जल पुनर्भरण और फसलों की समयबद्ध बुआई का नुकसान पूरी तरह नहीं भर पाएगी। 

खरीफ फसलों- विशेषकर धान, सोयाबीन, मक्का, दलहन, तिलहन और कपास की बुआई कई क्षेत्रों में पिछड़ गई है तथा कुल बोया गया रकबा भी प्रभावित हुआ है। यदि जुलाई में वर्षा का वितरण संतुलित रहा, तो बुआई का क्षेत्र बढ़ सकता है, किंतु देरी से बोई गई फसलों की उत्पादकता पर प्रभाव पड़ने की आशंका बनी रहेगी। लगातार और संतुलित वर्षा के बिना सूखते जलस्रोतों, तालाबों वगैरह का पर्याप्त पुनर्भरण संभव नहीं है, इसलिए वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण की योजनाओं को केवल कागजों से निकालकर धरातल पर उतारना समय की मांग है।

उत्तराखंड में अनेक स्थानों पर पहाड़ दरकने से ग्रामीण सड़कें बंद हो गईं और दर्जनों गांवों का संपर्क टूट गया। संवेदनशील ढलानों की वैज्ञानिक निगरानी, समय पर ड्रेनेज व्यवस्था, भूस्खलन-रोधी संरचनाएं, वैकल्पिक संपर्क मार्ग, मशीनों और राहत दलों की अग्रिम तैनाती तथा मौसम आधारित पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत बनाना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

मानसून के साथ शहरी और ग्रामीण चुनौतियां शासन क्षमता की परीक्षा लेने वाली हैं। शहरों में जलभराव, सीवर जाम, गंदगी और यातायात अव्यवस्था सामान्य दृश्य बन जाते हैं। गांवों में कच्चे रास्ते, जल निकासी, पशुधन की सुरक्षा और खेतों में जल प्रबंधन बड़ी समस्या बनते हैं। यदि नगर निकायों ने नालों की सफाई, पंपिंग व्यवस्था, जल निकासी और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन समय रहते नहीं किया, तो कुछ घंटों की वर्षा भी जनजीवन ठप कर सकती है। स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां भी दरपेश हैं, इस दौरान जलजनित रोग तेजी से फैलते हैं, सर्पदंश के मामले भी। जिला स्वास्थ्य विभागों एंटी-स्नेक वेनम तथा प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों, दवाओं की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी।
 
जांच किटों, फॉगिंग, स्वच्छ पेयजल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की तैयारी पहले से कितनी सुनिश्चित है, मालूम नहीं। किसानों को मौसम आधारित सलाह, गुणवत्तापूर्ण बीज, फसल बीमा और सिंचाई सहायता चाहिए, जबकि नागरिकों को स्वच्छता, सुरक्षित सड़कें, निर्बाध बिजली और स्वास्थ्य सुरक्षा। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के लिए यह समय अतिरिक्त सतर्कता का है, क्योंकि यहां एक ओर पहाड़ी आपदाएं हैं, तो दूसरी ओर विशाल मैदानी आबादी की चुनौतियां। उम्मीद है स्थानीय निकायों और नागरिकों की समय रहते समन्वित तैयारी इस मानसून को संकट नहीं, समृद्धि का संदेशवाहक बनाएंगे।

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