पुरातात्विक धरोहरों को समेटे अवध विश्वविद्यालय का संग्रहालय 

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Published By Anjali Singh
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कौशल संग्रहालय की स्थापना विश्वविद्यालय परिसर में सन् 1998 में उत्तर प्रदेश शासन के उच्च शिक्षा अनुभाग चार के आदेश के तहत पुरातात्विक संग्रहालय के रूप में की गई थी। अवध क्षेत्र की प्राचीन पुरातात्विक धरोहरों को समेटे संग्रहालय में कल तीन गैलरी और दो सुसज्जित बरामदे हैं। संग्रहालय की पहली गैलरी में क्षेत्रीय सर्वेक्षण अयोध्या, सुल्तानपुर, अंबेडकर नगर और आसपास के जनपदों के पुरातन स्थलों से प्राप्त कल अवशेषों को प्रदर्शित किया गया है। इसमें छठवीं शताब्दी की भगवान ऋ षभदेव की प्राचीन प्रतिमा के साथ नवीं शताब्दी के उमा महेश, 10 वीं और 11 वीं शताब्दी के सूर्य, विष्णु, गणेश, कुबेर आदि के साथ 17 वीं शताब्दी के हनुमान की प्रतिमा प्रदर्शित है। इस संग्रहालय में लगभग 50 हजार वर्ष पूर्व का हस्त कुठार (हैंड एक्स) भी संरक्षित है।

संग्रहालय की वीथिका में सिंधु सभ्यता व खरोठी लिपि भी प्रागैतिहासिक काल का सूक्ष्म पाषाण उपकरण (माइक्रो लिथ) के साथ इसी वीथिका में सिंधु सभ्यता की लिपि के साथ ब्राह्मी तथा खरोष्ठी लिपि के पैनल प्रदर्शित किए गए हैं। इसी गैलरी में भगवान ऋ षभ देव की काष्ठ प्रतिमा प्रदर्शित है। दूसरी अनुकृति वीथिका गैलरी राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली तथा राजकीय संग्रहालय लखनऊ के प्रमुख अवशेषों के मॉडल प्रदर्शित किए गए है। यह गैलरी इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में भारतीय कला विषयक महत्वपूर्ण प्रतिमाओं को संजोए है। इसमें हड़प्पा मोहनजोदड़ो से प्राप्त पुराअवशेषों, जिसमें नृत्य की मुद्रा में बालिका, पुरोहित प्रतिमा तथा सेलखड़ी (चूना पत्थर) से बनी मोहरों के मॉडल और साथ में सिंधु घाटी सभ्यता के अनेक पुरावशेषों को प्रदर्शित किया गया है। राज्य संग्रहालय लखनऊ से प्राप्त विष्णु, शिवा ओलीकितेश्वर तथा कुबेर की प्राचीन प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। 

मौर्य, शुंग और कुषाण काल के बर्तनों के अवशेष बढ़ा रहे हैं शोभा 

संग्रहालय के वीथिका सहायक डॉ. देशराज उपाध्याय ने बताया कि तीसरी गैलरी में सर्वेक्षण से प्राप्त मृणमय (टेराकोटा) की मूर्तियों तथा प्राचीन मिट्टी के बर्तनों के अवशेष हैं, जो क्रमशः मौर्य काल, शुंगकाल, कुषाण काल एवं गुप्त काल से संबंधित है। यह अवशेष अंबेडकर नगर के सुरूरपुर, अयोध्या, विरायता सुल्तानपुर तथा रेहट बीकापुर के पुरास्थलों से प्राप्त हुए हैं। 

कौशल संग्रहालय के सभी अवशेष अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शोध ग्रंथ में प्रकाशित हो चुके हैं। भारत की प्रतिष्ठित शोध ग्रंथ इंडियन जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजी 2018 में प्रकाशित किया गया हैं। संग्रहालय में प्रदेश जनपद अन्य राज्यों के बड़ी संख्या में शोध छात्र एवं संस्थाएं पुरातात्विक तत्वों को जानने के लिए कौशल संग्रहालय का शैक्षिक भ्रमण करते हैं। इतिहास एवं पुरातत्व विभाग कि यह धरोहर अपनी प्राचीन विरासत को संजोए हुए हैं। 

विश्वविद्यालय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान के लिए कृत संकल्पित 

विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. बिजेंद्र सिंह ने कौशल संग्रहालय को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए संरक्षित एवं प्रासंगिक बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। यह संग्रहालय गौरवशाली इतिहास, समृद्ध संस्कृति और अवध क्षेत्र की जीवंत विरासत का जीवंत दस्तावेज है। प्रागैतिहासिक काल से लेकर मध्यकाल तक की अमूल्य धरोहरों को अपने भीतर समेटे यह संग्रहालय शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं के लिए ज्ञान का एक अनमोल केंद्र है। इस ऐतिहासिक अनमोल धरोहर को आधुनिक तकनीकों के माध्यम से और अधिक संरक्षित, सुसज्जित  तथा प्रासंगिक बनाया जाएगा। इस संग्रहालय को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर एक विशिष्ट पहचान दिलाने और वैश्विक शोध के मानकों के अनुरूप विकसित करने के लिए हम पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। हम चाहते हैं कि देश-विदेश के शोधार्थी यहां आएं और अवध की इस छिपी हुई पुरातात्विक संपदा से पूरी दुनिया परिचित हो सके। समन्वयक डॉ. राजेश कुमार सिंह ने अयोध्या की इस विरासत को संजोने का संकल्प लिया है।


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