कैंची से भगत सिंह को ‘नया रूप’ देने वाले डॉ. गया प्रसाद कटियार

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Published By Anjali Singh
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कानपुर की बिल्हौर तहसील के खजुरी खुर्द गांव के फिरोजपुर के एक छोटे से दवाखाने में कैंची चलाकर भारत के क्रांतिकारी इतिहास की दिशा बदल दी। उसी कैंची ने सरदार भगत सिंह के केश और दाढ़ी को नया रूप दिया, ताकि अंग्रेजी हुकूमत उन्हें पहचान न सके। वह कैंची डॉ. गया प्रसाद कटियार के हाथों में थी-एक चिकित्सक, क्रांतिकारी और लाहौर षड्यंत्र केस के ऐसे नायक, जिन्हें इतिहास ने अपेक्षित स्थान नहीं दिया।

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डॉ. गया प्रसाद को क्रांति की प्रेरणा विरासत में मिली थी। उनके दादा चौधरी महादीन कटियार ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठाए थे। दादा की वीरगाथाएं सुनते-सुनते बालक गया प्रसाद के मन में विदेशी शासन के प्रति गहरा प्रतिरोध जन्म लेने लगा। हाईस्कूल के बाद उन्होंने चिकित्सा की शिक्षा प्राप्त की, लेकिन उनका मन राष्ट्रसेवा और क्रांति की ओर आकृष्ट था। कानपुर की मजदूर सभा और आर्य समाज के माध्यम से उनका संपर्क गणेश शंकर विद्यार्थी और हरिहरनाथ शास्त्री जैसे राष्ट्रवादी नेताओं से हुआ। यही संपर्क आगे चलकर उन्हें हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के केंद्रीय नेतृत्व तक ले गया।

17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत राय पर हुए बर्बर लाठीचार्ज के प्रतिशोध में अंग्रेज पुलिस अधिकारी जे.पी. सांडर्स को दंडित करने का निर्णय लिया जा चुका था। किंतु संगठन के सामने एक बड़ी चुनौती थी- भगत सिंह की पहचान। केश और दाढ़ी वाले एक युवा सिख क्रांतिकारी को पुलिस आसानी से पहचान सकती थी।

ऐसे समय में फिरोजपुर में ‘डॉ. बी.एस. निगम’ के नाम से दवाखाना संचालित कर रहे डॉ. गया प्रसाद को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। सुखदेव के सहयोग से उन्होंने अपने दवाखाने के एक सुरक्षित कमरे में भगत सिंह के केश और दाढ़ी स्वयं काटी। कैंची की हर कतरन के साथ एक परंपरा टूट रही थी, लेकिन राष्ट्रहित में एक नए त्याग की परंपरा जन्म ले रही थी। इसके बाद भगत सिंह आधुनिक वेशभूषा में ‘बलवंत सिंह’ के रूप में लाहौर की सड़कों पर निकले और सांडर्स वध की ऐतिहासिक योजना सफल हुई। उस भवन को पंजाब सरकार ने राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित किया है।

क्रांतिकारी जीवन की राह में डॉ. गया प्रसाद के लिए सबसे बड़ी व्यक्तिगत चुनौती उनका वैवाहिक जीवन था। उन्होंने अपनी पत्नी रज्जो देवी से स्पष्ट शब्दों में कहा-“मैं क्रांतिकारी बनकर मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने जा रहा हूं। समझ लो कि तुम विधवा हो चुकी हो।” कहा जाता है कि उन्होंने स्वयं पत्नी से माथे का सिंदूर पोंछने को कहा था।

उस दिन के बाद रज्जो देवी अपने पति का चेहरा दोबारा नहीं देख सकीं। वे जीवनभर एक ‘सुहागिन विधवा’ की तरह जीती रहीं और अंततः शिवराजपुर के बैरी गांव में विरह और प्रतीक्षा के बीच इस संसार से विदा हो गईं। स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं के ऐसे मौन और अनदेखे बलिदानों को इतिहास में आज भी पर्याप्त स्थान नहीं मिला है।

डॉ. गया प्रसाद के लिए चिकित्सकीय पेशा केवल जीविका का साधन नहीं था, बल्कि क्रांतिकारी गतिविधियों का सुरक्षित आवरण भी था। उन्होंने देश के विभिन्न नगरों में अलग-अलग नामों से क्लीनिक संचालित किए। बाहर मरीजों का उपचार होता था और भीतर क्रांति की योजनाएं बनती थीं। 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा फेंके गए बमों के निर्माण की व्यवस्था भी उनकी देखरेख में हुई थी। बम निर्माण की तकनीक उन्होंने यतींद्रनाथ दास से सीखी थी, जबकि निशानेबाजी का प्रशिक्षण चंद्रशेखर आजाद से प्राप्त किया था। HSRA के केंद्रीय कार्यालय का संचालन भी लंबे समय तक उनके हाथों में रहा।

सांडर्स वध के बाद 15 मई 1929 को सहारनपुर में डॉ. गया प्रसाद, शिव वर्मा और जयदेव कपूर हथियारों सहित गिरफ्तार कर लिए गए। डॉ. राम लाल गिरफ्तारी के समय उन्होंने अपनी जेब में रखे महत्वपूर्ण पत्रों को निगल लिया, ताकि वे अंग्रेजों के हाथ न लग सकें। इन पत्रों में चंद्रभानु गुप्ता, मोहनलाल सक्सेना और अन्य सहयोगियों से जुड़े वे संदेश थे, जिनमें चंद्रशेखर आजाद की योजनाओं का उल्लेख था।

डॉ. गया प्रसाद ने लाहौर षड्यंत्र केस की अदालती कार्यवाही में भाग लेने से स्पष्ट इंकार कर दिया। 7 अक्टूबर 1930 को उन्हें बिना गवाहों की जिरह और बिना प्रभावी सुनवाई के आजीवन कारावास तथा कालापानी की सजा सुना दी गई। इसके साथ ही शुरू हुआ उनका 17 वर्षों का लंबा कारावास- लाहौर, रावलपिंडी, मुल्तान, कोलकाता, बेलारी, राजमहेंद्रि और अंडमान सहित 11 जेलों का कठिन सफर।

अंडमान की सेल्यूलर जेल में उन्होंने छह वर्षों से अधिक समय बिताया। वहां उन्होंने 46 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल की, जिसे उस समय विश्व की सबसे लंबी राजनीतिक भूख हड़तालों में गिना गया। 10 फरवरी 1993 को यह महान क्रांतिकारी इस दुनिया से विदा हो गया। अपने अंतिम साक्षात्कारों में उन्होंने कहा था- “आजादी के बाद के भारत का जो स्वरूप हमने सोचा था, उसका एक कोना भी पूरा नहीं हो पाया। गोरे चले गए, काले आ गए।”

डॉ. शाह आलम राना, दस्तावेजी लेखक