निरंतर बदलता रहा है मन 

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम है कि वह खुद को वही मान लेता है, जो बदलता रहता है, जैसे शरीर, भावनाएं या विचार। जब बदलने वाली चीजों को हम अपनी पहचान मान लेते हैं, तो दु:ख हमारी नियति बन जाता है, जबकि सच यह है कि हम शरीर नहीं हैं, मन नहीं हैं और भावनाएं भी नहीं हैं। वास्तव में हम वह चेतना हैं, जो इन सबको देख रही है।

चेतना शुद्ध जागरूकता है, जो हमें किसी चीज के होने का अहसास कराती है, जबकि मन विचारों, यादों और भावनाओं का एक ऐसा प्रवाह है, जिसे इस चेतना के माध्यम से अनुभव किया जाता है। इस तरह चेतना स्थिर और शाश्वत है, जबकि मन पल-पल बदलता रहता है। आपका मन बचपन में अलग था और बुढ़ापे में अलग होता है, लेकिन आपकी चेतना स्वयं के होने का भाव हमेशा वही रहता है।

यदि मन वह सब कुछ है, जिसका अनुभव किया जाता है, तो चेतना उस सब कुछ का अनुभव कराती है, जिसका अनुभव किया जाता है। यही अपरिवर्तनीय तत्व चेतना है। मन निरंतर बदलता रहता है, परंतु जो इस परिवर्तन से अवगत होता है, वह नहीं बदलता। यदि मन किसी फिल्म की सामग्री है, तो चेतना वह पर्दा है, जिस पर फिल्म चलती है। इस बात को ऐसे समझा जा सकता है, जब आप सिनेमाघर में बैठकर फिल्म देखते हैं, तो पर्दे पर कभी प्रेम, कभी हंसी-खुशी तो कभी दुख या आग और हिंसा के दृश्य होते हैं, लेकिन क्या पर्दा जलता और फटता है, क्या पर्दा कभी रोता या हंसता है।

वास्तव में पर्दा केवल देखने का आधार है। इसी तरह हमारे भीतर की चेतना भी पर्दे की तरह ही है। भावनाएं और विचार फिल्म की तरह आते-जाते रहते हैं, लेकिन हम उनसे आहत या जख्मी तभी होते हैं, जब हम खुद को फिल्म समझ लेते हैं। इसी तरह आसमान पर बादल आते-जाते हैं। कभी काले-भूरे या सफेद, लेकिन क्या इनका आसमान पर कोई असर होता है, नहीं। इसी तरह चेतना पर भी कोई भाव कभी स्थायी छाप नहीं छोड़ता।

मन और चेतना को लेकर दार्शनिक कहते हैं कि यह आपकी परिभाषा पर निर्भर करता है। उनके अनुसार मन वह हिस्सा है, जो आपका नहीं है, यह दी गई वस्तु जैसा है। इस तरह मन का अर्थ है, वह जो बनाया गया है, जो समाज ने तुम्हारे भीतर भर दिया है, जबकि वह तुम नहीं हो। चैतन्य तुम्हारा स्वभाव है, मन बस एक परिधि है, जिसे समाज द्वारा, तुम्हारी संस्कृति या शिक्षा द्वारा तुम्हारे आसपास एक परिधि के रूप में निर्मित किया गया है। मन का अर्थ संस्कार है।

इसी क्रम में आचार्य रजनीश का कथन है कि तुम्हारे पास एक हिंदू मन हो सकता है, पर तुम्हारे पास एक हिंदू चेतना नहीं हो सकती। तुम्हारे पास एक ईसाई मन हो सकता है, पर तुम्हारे पास एक ईसाई चेतना नहीं हो सकती। चेतना एक होती है, वह बंट नहीं सकती। 

न्यूरोसाइंस के प्रयोगों (जैसे लिबेट का प्रयोग) से पता चलता है कि आपके निर्णय लेने से पहले ही आपका अवचेतन मन फैसला ले चुका होता है। आपको बस बाद में यह भ्रम होता है कि ‘यह फैसला मैंने लिया’। इसी तरह हमें लगता है कि हमारा ‘मैं’ या ‘अहंकार’ एक सिंगल इकाई है, लेकिन दिमाग के अलग-अलग हिस्से (यादें, भावनाएं, दृश्य) अलग-अलग काम करते हैं और अंत में एक कहानी बुनकर आपको ‘एक होने’ का अहसास कराते हैं।

वैज्ञानिक यह तो समझ सकते हैं कि दिमाग के न्यूरॉन्स कैसे सिग्नल भेजते हैं, लेकिन भौतिक न्यूरॉन्स मिलकर एक ‘अंदरूनी जीवंत अनुभव’ या भावना (जैसे लाल रंग को देखकर कैसा महसूस होता है) कैसे पैदा करते हैं, यह आज भी विज्ञान के लिए एक अनसुलझा भ्रम है। इसके मुकाबले भारतीय दर्शन जैसे अद्वैत वेदांत और बौद्ध धर्म हजारों सालों से यह कहता चला आ रहा है कि मन और विचार लगातार बदलते रहते हैं, इसलिए वे स्थायी सत्य नहीं, बल्कि एक भ्रम (माया) हैं। सच्ची चेतना वह साक्षी है, जो इस पूरे भ्रम को बिना जुड़े हुए देखती है। भगवद्गीता और भारतीय दर्शन में इसकी स्पष्ट व्याख्या की गई है।

नमिता त्रिपाठी, जबलपुर