सिकल सेल डिजीज से आदिवासी बन रहे एनीमिया का शिकार
देश की आदिवासी आबादी में बहुत व्यक्ति सिकल सेल डिजीज से पीड़ित हैं। इस बीमारी की उत्पत्ति मलेरिया परजीवी से बचाव की रणनीति के रूप में शरीर में हुई थी। इस बीमारी के लक्षणों में रक्त की लाल कोशिकाएं दराती जैसी शक्ल की हो जाती हैं और इनकी ऑक्सीजन वहन की क्षमता मर जाती है। इसकी वजह से लोग एनीमिया से पीड़ित होते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, जिन्हें यह बीमारी है उनमें से 35 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक पांच प्रतिशत की मृत्यु हो जाती है। हर साल 50 हज़ार ऐसे बच्चों का जन्म होता है, जिनमें जन्म के समय से ही इस बीमारी के चिह्न होते हैं। देश में सात करोड़ लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं, इसीलिए भारत सरकार से स्वास्थ्य मंत्रालय ने सन 2023 में गाइडलाइंस फॉर नेशनल प्रोग्राम फॉर प्रिवेंशन एंड मैनेजमेंट ऑफ़ सिकल सेल डिजीज बनाई।
इस बीमारी से छुटकारा पाने के लिए क्रिसपर जीन एडिटिंग टेक्नोलॉजी के अलावा कोई अन्य कारगर उपाय नहीं है, लेकिन यह तो मात्र दसेक से क्लिनिकल तौर से और हिंदुस्तान में एक-दो साल पहले से उपलब्ध हुई है। किसी-किसी अस्पताल में यह इलाज संभव है, क्योंकि इसके प्रोसीजर बहुत उच्च तकनीक वाले हैं और सभी डॉक्टर इसमें ट्रेंड नहीं हैं। इस टेक्नोलॉजी के आने से पहले लाक्षणिक इलाज ही संभव थी, लेकिन पूरी तरह से कारगर नहीं। सिकल सेल डिजीज (एससीडी) के लिए कुछ मानक चिकित्सा उपचार तय किए गए थे, परंतु भारत में सिकल सेल डिजीज (एससीडी) का कोई मानक हर्बल या पारंपरिक इलाज नहीं है।
चिकित्सकीय रूप से, एकमात्र स्थायी इलाज अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण है, जबकि मानक प्रबंधन दर्द के दौरों को रोकने के लिए हाइड्रोक्सीयूरिया जैसी दवाइयों पर निर्भर करता है। इसकी खुराक बहुत मंहगी है। हाइड्रोक्सीयूरिया, भ्रूण हीमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मानक दवा है, जो दर्दनाक वाहिका अवरोध के दौरों की आवृत्ति और गंभीरता को काफी कम कर देती है। दूसरा उपाय रक्ताधान अथवा ब्लड ट्रांसफ्युज़न हैं, जिसे तीव्र जटिलताओं, गंभीर एनीमिया के इलाज और स्ट्रोक की रोकथाम के लिए उपयोग किया जाता है।
तीसरा उपाय है, फोलिक एसिड सप्लीमेंट, जिसे नई लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन में सहायता के लिए प्रतिदिन निर्धारित किया जाता है। अस्थि मज्जा/स्टेम सेल प्रत्यारोपण वर्तमान में एकमात्र सिद्ध, संभावित रूप से उपचारात्मक उपचार है, जो आमतौर पर गंभीर मामलों के लिए आरक्षित है। भारत में पारंपरिक और वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियां आयुर्वेद, होम्योपैथी और जनजातीय/लोक चिकित्सा, कभी-कभी दीर्घकालिक दर्द के प्रबंधन या रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए अपनाई जाती हैं, हालांकि इनमें से कोई भी पारंपरिक उपचार अंतर्निहित आनुवंशिक दोष को ठीक करने या उलटने में सिद्ध नहीं हुआ है। पारंपरिक विकल्पों पर विचार करते समय चिकित्सक लक्षणों के प्रबंधन के लिए आयुर्वेद और होम्योपैथी सहायक उपचार प्रदान कर सकते हैं, लेकिन इनका उपयोग केवल आधुनिक चिकित्सा देखरेख के साथ पूरक उपचार के रूप में किया जाना चाहिए।
मध्य और पश्चिमी भारत (विशेष रूप से आदिवासी आबादी के बीच) में सिकल सेल एनीमिया की उच्च व्यापकता को देखते हुए, सरकार ने राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन शुरू किया है, जो व्यापक प्रारंभिक जांच, आनुवंशिक परामर्श और आधुनिक चिकित्सा देखभाल के मानकीकरण पर जोर देता है। सन 2023 के मिशन डॉक्यूमेंट में उन्नत अनुसंधान के बारे में यह कहा गया कि वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद का इंस्टिट्यूट फॉर जेनोमिक एंड इन्टीग्रेटिव बिलोग्य, सिकल सेल रोग के इलाज के लिए कोशिकाओं पर क्रिस्पर कैस-9 थेरेपी (क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिंड्रोमिक रिपीट) पर काम कर रहा है। मरीज़ों में आनुवंशिक बीमारियों को ठीक करने के लिए क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिंड्रोमिक रिपीट -एसोसिएटेड तरीकों की ज़बरदस्त सफलता ने, इन तरीकों को क्लिनिक तक लाने के लिए वैज्ञानिक निवेश को काफ़ी बढ़ावा दिया है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
