बायो-सीएनजी बदल सकती है देश की आर्थिक तस्वीर

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Published By Deepak Mishra
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ऊर्जा आत्मनिर्भरता अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुकी है। ऐसे समय में भारत के गांवों और खेतों में उपलब्ध गोबर और अन्य जैविक अपशिष्ट देश की ऊर्जा तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है।

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रजत मेहरोत्रा,
वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ

भारत लंबे समय से ऊर्जा आयात पर निर्भर रहा है। देश अपनी पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिसके कारण हर वर्ष अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में अस्थिरता और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुकी है। ऐसे समय में भारत के गांवों और खेतों में उपलब्ध एक संसाधन देश की ऊर्जा तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है— गोबर और अन्य जैविक अपशिष्ट।

बायो-सीएनजी या कंप्रेस्ड बायो गैस (CBG) एक ऐसा स्वच्छ ईंधन है, जिसे गोबर, कृषि अवशेष, चीनी मिलों के प्रेसमड, नगर निगम के जैविक कचरे तथा सीवेज स्लज जैसे जैविक पदार्थों से तैयार किया जाता है। यह गुणवत्ता और उपयोग के मामले में पारंपरिक सीएनजी के समान होती है तथा वाहनों, उद्योगों और गैस वितरण नेटवर्क में प्रयोग की जा सकती है। भारत दुनिया के सबसे बड़े पशुधन आबादी वाले देशों में शामिल है। इसके अलावा देश में प्रतिवर्ष विशाल मात्रा में कृषि अवशेष और जैविक कचरा उत्पन्न होता है। यदि इन संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जाए, तो न केवल स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, बल्कि पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान भी किया जा सकता है।

केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में SATAT (Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation) योजना शुरू की थी। इस पहल का उद्देश्य जैविक अपशिष्ट से बायो-सीएनजी उत्पादन को बढ़ावा देना और इसे आयातित प्राकृतिक गैस के विकल्प के रूप में विकसित करना है। सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य देशभर में लगभग 5,000 सीबीजी संयंत्र स्थापित करना और 15 मिलियन मीट्रिक टन वार्षिक उत्पादन क्षमता विकसित करना है।

जनवरी 2026 तक उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार देश में लगभग 132 परिचालित सीबीजी संयंत्र कार्यरत हैं, जिनकी संयुक्त उत्पादन क्षमता लगभग 920 टन प्रतिदिन है। यह संख्या सरकार के दीर्घकालिक लक्ष्य की तुलना में अभी काफी कम है, लेकिन यही अंतर भविष्य की विशाल संभावनाओं को भी दर्शाता है। बायो-सीएनजी का सबसे बड़ा लाभ विदेशी मुद्रा बचत के रूप में सामने आ सकता है।

भारत बड़ी मात्रा में एलएनजी और प्राकृतिक गैस का आयात करता है। यदि बायो-सीएनजी उत्पादन को बड़े स्तर पर बढ़ाया जाता है, तो आयातित गैस पर निर्भरता कम होगी और विदेशी मुद्रा की बचत होगी, हालांकि बचत की वास्तविक मात्रा अंतर्राष्ट्रीय गैस कीमतों और उत्पादन स्तर पर निर्भर करेगी, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि दीर्घकाल में यह बचत अरबों डॉलर के स्तर तक पहुंच सकती है।

यह पहल केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। ग्रामीण भारत के लिए भी यह एक आर्थिक अवसर है। किसान गोबर और कृषि अवशेषों की बिक्री से अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं। बायोगैस उत्पादन के बाद बचने वाला डाइजेस्टेट एक उत्कृष्ट जैविक उर्वरक होता है, जो रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है। इससे कृषि लागत कम होने और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने की संभावना बढ़ती है। पर्यावरणीय दृष्टि से भी बायो-सीएनजी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

खुले में सड़ने वाला गोबर और जैविक कचरा बड़ी मात्रा में मीथेन गैस उत्सर्जित करता है, जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली ग्रीनहाउस गैस मानी जाती है। जब इन्हीं अपशिष्टों का उपयोग बायोगैस उत्पादन में किया जाता है, तो मीथेन को ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। इससे प्रदूषण घटता है, स्वच्छता बढ़ती है और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ भारत के प्रयासों को मजबूती मिलती है, हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। गोबर और अन्य जैविक कचरे का संग्रहण, परिवहन और प्रसंस्करण एक जटिल प्रक्रिया है। 

छोटे किसानों और बिखरे हुए पशुधन से पर्याप्त मात्रा में फीडस्टॉक एकत्र करना आसान नहीं है। इसके अतिरिक्त, संयंत्रों की स्थापना के लिए पूंजी निवेश, तकनीकी दक्षता, गैस की खरीद की दीर्घकालिक व्यवस्था तथा पाइपलाइन एवं वितरण नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाओं की भी आवश्यकता होती है। भारत के कई राज्यों में इस दिशा में सकारात्मक प्रयास शुरू हो चुके हैं।

मध्य प्रदेश का इंदौर बायो-सीएनजी संयंत्र, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक में संचालित विभिन्न सीबीजी परियोजनाएं तथा गोबरधन मिशन के अंतर्गत विकसित मॉडल इस क्षेत्र की संभावनाओं को प्रदर्शित करते हैं। निजी क्षेत्र और स्टार्टअप कंपनियां भी अब इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रही हैं।


आज जब भारत ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है, तब बायो-सीएनजी एक ऐसी तकनीक बनकर उभर रही है, जो इन तीनों उद्देश्यों को एक साथ पूरा कर सकती है। गोबर और जैविक कचरे को समस्या के बजाय संसाधन के रूप में देखने की आवश्यकता है।

यदि सरकार, उद्योग, किसान और स्थानीय निकाय मिलकर इस दिशा में प्रभावी कदम उठाएं, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में नई ऊंचाइयों को छू सकता है, बल्कि विदेशी ऊर्जा पर निर्भरता कम कर एक मजबूत और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ा सकता है। वास्तव में, बायो-सीएनजी केवल एक ईंधन नहीं, बल्कि भारत के लिए ‘वेस्ट टू वेल्थ’ से ‘वेस्ट टू नेशनल वेल्थ’ की यात्रा का प्रतीक बन सकती है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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