अयोध्या की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा
अयोध्या केवल भगवान श्रीराम की जन्मभूमि ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और सभ्यता का जीवंत केंद्र भी रही है। सदियों के उतार-चढ़ाव और ऐतिहासिक परिवर्तनों के बीच इसकी अनेक प्राचीन धरोहरें समय की धूल में ओझल होती चली गईं। वर्ष 1902 में गठित एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा ने इन विरासत स्थलों की खोज कर उन्हें नई पहचान देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। सभा द्वारा चिह्नित 148 तीर्थ स्थल आज भी अयोध्या की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा के साक्षी हैं। अब इन प्राचीन स्थलों के पुनर्जीवन और संरक्षण के प्रयास अयोध्या को उसके त्रेतायुगीन वैभव से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
सदियों से सनातन का केंद्र रही अयोध्या को नई पहचान सवा सौ साल पहले मिली, जब अंग्रेजी हुकूमत में साल 1902 में अंग्रेजों ने एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा का गठन किया। सभा ने बड़ा दुरूह कार्य किया। अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े स्थलों की खोज शुरू की। अयोध्या और उसके आसपास चार जिलों में फैले तीर्थ स्थलों को खोजा। उन पर प्रस्तर शिलालेख लगवाए। बहुत से ऐसे भी स्थल होंगे, जहां तक सभा की दृष्टि नहीं पहुंची और उन पर प्रस्तर शिला लेख नहीं लग पाए। सभा ने अयोध्या के 148 प्राचीन और ऐतिहासिक स्थलों को चिह्नित किया था। इन्हें अयोध्या की 84 कोसी परिक्रमा के तहत माना जाता है। बताते हैं कि इन स्थलों की खोज के लिए कई धार्मिक ग्रंथों का भी सहारा लिया गया था। ये 148 वह स्थान हैं, जिनकी पहचान आर्ष ग्रंथों में बताई गई है। तीन अन्य ऐसे स्थल तो अब भी हैं, जो उसी काल के हैं, लेकिन इन पर प्रस्तर शिलालेख नहीं लग पाए थे। त्रेतायुग में इन स्थल की महिमा, गरिमा और भव्यता आज से ज्यादा रही है। इन स्थलों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। केंद्र और प्रदेश की सरकार इसके लिए प्रयासरत है। प्रदेश सरकार से त्रेतायुग जैसी अयोध्या बनाने के लिए कार्य चल रहा है।
श्रीराम जानकी मंदिर के महंत सत्येंद्र दास वेदांती बताते है कि मुगल काल में जब हिंदुओं की आस्था से जुड़े स्थलों के अस्तित्व को समाप्त करने का प्रयास किया गया था। इसके बाद जब अंग्रेजों की सत्ता आई, तो लोगों के प्रयास से तत्कालीन सरकार के प्रशासकों से एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा का गठन किया गया। इसे पुनः जीवित करने का कार्य किया गया। वर्तमान सरकार इन सभी स्थलों का जीर्णोद्धार करा रही है।
ऐतिहासिक स्थल
अयोध्या के सांस्कृतिक सीमा 84 कोसी परिक्रमा के तहत 148 धार्मिक स्थानों को चिह्नित किया गया। इसमें श्रीराम जन्मभूमि के साथ लोमश मुनि, सीताकूप, सुमित्रा भवन, कैकयी भवन, रत्नमंडप, श्रीराम दुर्ग, हनुमानगढ़ी, रामसभा, दंतधावन कुंड, सुग्रीव किला, क्षीरसागर, क्षीरेश्वर नाथ, रुक्मणि कुंड, अंगद टीला, कुबेर टीला, वशिष्ठ कुंड, वामदेव आश्रम, सागर कुंड, गवाक्ष, दधि मुख, दुर्गेश्वर, शतवलि, गंधमादन, ऋषभ, शरभ, पनस, विभीषण मंदिर, विभीषण कुंड, सरमाजी, विघ्नेश, पिंडारक, मत्तगयंद, द्विविद, सप्तसागर, मैन्द, जामवंत किला, केशरी किशोर मंदिर, प्रमोदवन, रामघाट, सुग्रीव कुंड, हनुमान कुंड, स्वर्ण खनि कुंड, यज्ञवेदि, सरयू तिलोदकी संगम, सीताकुंड, अग्नि कुंड, विद्या कुंड, खरजू कुंड, मणि पर्वत, गणेश कुंड, दशरथ कुंड, कौशल्या कुंड, सुमित्रा कुंड, भरत कुंड, दुरर्सर, महाभरसर, बृहस्पति कुंड, धनयक्ष कुंड, उर्वशी कुंड, चुटकी देवी, विष्णु हरि, चक्रतीर्थ, ब्रम्हा कुंड, सुमित्रा घाट, कौशल्या घाट, कैकयी घाट, ऋणमोचन घाट, पापमोचन घाट, सहस्त्र धारा घाट, स्वर्गद्वार, चंद्र हरि, नागेश्वर नाथ, धर्महारि, जानकी घाट, वैतरणी, सूर्यकुंड, नर कुंड, नारायण कुंड, रति कुंड, कुसुमायुध कुंड, दुर्गा कुंड, गिरिजा कुंड, मंत्रेश्वर, सरोवर, शीतलादेवी, निर्मला कुंड, गुप्तार घाट, गुप्तहरि, चक्रहरि, यमस्थल, विघ्नेश्वर महादेव, योगिनी कुंड, शक्र कुंड, बंदी कुंड, मनोरमा, मखस्थान, रामरेखा, श्रृंगीऋषि, वाल्मीकि, विल्वहरिघाट, त्रिपुरारी, पुण्यहरि, राम कुंड, दुग्धेश्वर, भैरव कुंड, तमसा नदी, मांडव्याश्रम, श्रवण आश्रम, पाराशराश्रम, च्यवनाश्रम, गौतमाश्रम, पिशाचमोचन, मानस तीर्थ, गया कुंड, नंदीग्राम, कालिका देवी जटा कुंड, शत्रुघ्न कुंड, अजित कुंड, रमणकाश्रम, घृताची कुंड, सरयू घाघरा संगम, वराह क्षेत्र, जंबूतीर्थ, अगस्त्य, तुंडिलजी, गोकुलातीर्थ श्री कुंड, लक्ष्मी, स्वप्नेश्वरी, कुटिला वरस्रोत संगम, सरयू कुटिला संगम तीर्थ स्थल हैं। वर्तमान में इनमें से कई स्थल तो विलुप्त हो चुके हैं और कई विलुप्त होने के कगार पर हैं।
प्रस्तुति- सत्यप्रकाश, अयोध्या
