ई-कचरे के समाधान की दिशा में बड़ी उपलब्धि

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Published By Deepak Mishra
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प्रमोद भार्गव, वरिष्ठ पत्रकार

 

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया आज ई-कचरे के बढ़ते संकट से जूझ रही है। ऐसे समय में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के शोधकर्ताओं ने “मेक इन इंडिया” पहल के अंतर्गत एक स्वदेशी प्रायोगिक संयंत्र विकसित किया है, जो प्रतिवर्ष 100 टन इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का प्रसंस्करण करने में सक्षम है। यह संयंत्र विशेष रूप से प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (पीसीबी) के उपचार के लिए डिजाइन किया गया है और इसे भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के तिरुचिरापल्ली स्थित परिसर में स्थापित किया गया है।

पीसीबी इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के सबसे खतरनाक और धातु-संपन्न घटकों में गिने जाते हैं। इनमें तांबा, सीसा और टिन जैसी धातुएं पर्याप्त मात्रा में होती हैं। यदि इनका उचित प्रबंधन न किया जाए तो ये मिट्टी और भूजल में रिसकर लंबे समय तक पर्यावरण तथा जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं। भारत हर वर्ष लगभग 50 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न कर रहा है। ऐसे में आईआईटी मद्रास की यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अनुपयोगी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से मूल्यवान धातुएं निकालकर उन्हें पुनः उपयोग योग्य बनाती है और इस प्रक्रिया में प्रदूषण भी नहीं फैलता।

आईआईटी मद्रास के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग के प्राध्यापक एस. पुष्पावनम और वाई.बी.जी. वर्मा का कहना है कि बढ़ती ई-कचरा चुनौती के बीच यह संयंत्र साफ-सुथरे तरीके से धातु पुनर्प्राप्ति का ऐसा मॉडल है, जिसे बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता है। यह “मेक इन इंडिया”, सर्कुलर इकोनॉमी और महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षा जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप है। इसकी विशेषता यह है कि पूरी प्रक्रिया एकमात्र अम्ल के प्रयोग से पूरी हो जाती है तथा इसमें उच्च स्तरीय स्वचालित सुरक्षा उपाय किए गए हैं।

उल्लेखनीय है कि यह संयंत्र पूरी तरह भारतीय कंपनियों द्वारा निर्मित है। इस उपलब्धि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि पर्यावरणीय निगरानी संस्था बासेल एक्शन नेटवर्क (बीएएन) की रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका से लाखों टन खराब इलेक्ट्रॉनिक सामग्री एशिया और पश्चिमी एशिया के विकासशील देशों में भेजी जा रही है।

इनमें कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट, मोबाइल और अन्य आईटी उपकरण शामिल हैं। इन उपकरणों में सीसा, कैडमियम और पारा जैसी मूल्यवान लेकिन विषैली धातुएं होती हैं। जैसे-जैसे नए मॉडल बाजार में आ रहे हैं, पुराने गैजेट तेजी से बेकार हो रहे हैं और ई-कचरे का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनआईटीएआर के अनुसार वर्ष 2022 में वैश्विक स्तर पर 6.2 करोड़ मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ था।

अनुमान है कि 2030 तक इसकी मात्रा बढ़कर 8.2 करोड़ मीट्रिक टन हो जाएगी। रिपोर्ट के अनुसार हर महीने हजारों कंटेनरों में लगभग 33 हजार मीट्रिक टन इस्तेमाल किया गया ई-कचरा विकसित देशों से बाहर भेजा जाता है। इन खेपों की आपूर्ति करने वाली कंपनियां अक्सर स्वयं पुनर्चक्रण नहीं करतीं, बल्कि कचरे को गरीब देशों के बंदरगाहों पर उतार देती हैं।

परिणामस्वरूप वहां जल, वायु और भूमि प्रदूषण की गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं। ई-कचरे का बड़ा हिस्सा कबाड़ बाजारों तक पहुंच जाता है, जहां मजदूर बिना किसी सुरक्षा उपकरण के उसे जलाकर या पिघलाकर धातुएं अलग करते हैं। इस प्रक्रिया से निकलने वाला विषाक्त धुआं मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक होता है। यही कारण है कि दुनिया में पुनर्चक्रण की तुलना में ई-कचरे की मात्रा कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही है।

इस समस्या के समाधान के लिए बायो-हाइड्रोमेटलर्जिकल तकनीक को काफी प्रभावी माना जा रहा है। इसमें ई-कचरे को बारीक पीसकर जीवाणुओं के साथ रखा जाता है। जीवाणुओं में मौजूद एंजाइम धातुओं को ऐसे यौगिकों में बदल देते हैं कि उन्हें अलग करना आसान हो जाता है। इस प्रक्रिया में विभिन्न प्रकार के बैक्टीरिया और फफूंदों का उपयोग कर तांबा, सीसा और टिन जैसी धातुओं को अलग किया जाता है। यह पारंपरिक तकनीकों की तुलना में अधिक सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल मानी जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि एक औसत स्मार्टफोन में लगभग 30 मिलीग्राम सोना होता है, जो उसके सर्किट बोर्ड और अन्य आंतरिक भागों में मौजूद रहता है। यही कारण है कि विश्व की बड़ी कंपनियां अब इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के पुनर्चक्रण पर विशेष ध्यान दे रही हैं। यदि ई-कचरे के ऐसे संयंत्र बड़े पैमाने पर स्थापित किए जाएं तो न केवल पर्यावरणीय संकट कम होगा, बल्कि युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

साथ ही भारत इस स्वदेशी तकनीक का निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित करने में भी सक्षम होगा। स्पष्ट है कि आईआईटी मद्रास द्वारा विकसित यह संयंत्र केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि ई-कचरे के बढ़ते वैश्विक संकट के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पर्यावरण संरक्षण, संसाधनों के पुनः उपयोग और सतत विकास की अवधारणा को मजबूत आधार प्रदान करता है। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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