संपादकीय : शांति की कीमत
सौ दिनों से अधिक चले संघर्ष में हजारों लोगों की जान गई, अरबों डॉलर की संपत्ति नष्ट हुई और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर संकट मंडराने लगा था। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित शांति समझौते पर हस्ताक्षर को मानवता और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों के लिए राहत की बात है। इस समझौते को किसी पक्ष की जीत या हार के रूप में देखने की बजाए यदि क्षेत्र में स्थिरता लौटती है, तो वास्तविक विजेता शांति होगी। किंतु इतना अवश्य कहा जाएगा कि यह बहुत महंगी पड़ी है। सबसे बड़ी बात यह कि दीर्घकालिक भरोसे से जुड़े प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं। अमेरिका को अपने उद्देश्यों में बहुत सीमित और मिश्रित सफलता ही मिली है। कई अमेरिकी अखबार इसे ट्रंप की विफलता का दस्तावेज बता रहे हैं। ईरान में सत्ता परिवर्तन, शासन को कमजोर करने अथवा पूर्ण परमाणु समझौते जैसी महत्वाकांक्षी अमेरिकी अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं। यही कारण है कि परमाणु कार्यक्रम पर अंतिम निर्णय को 60 दिनों की वार्ता पर छोड़ दिया गया है। ईरान ने अभी तक संवर्धित यूरेनियम या बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर निर्णायक रियायत नहीं दी है।
ट्रंप द्वारा ईरान के सीमित मिसाइल अधिकारों को स्वीकार करना भी अमेरिकी लक्ष्य का अधूरा होना है। ईरान के दृष्टिकोण से देखें, तो यह समझौता उसकी महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता प्रतीत होता है। यदि प्रतिबंधों में ढील मिलती है, अवरुद्ध संपत्तियों तक पहुंच बहाल होती है और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग बढ़ता है, तो तेहरान को बड़ी राहत मिलेगी। कथित 28 लाख करोड़ रुपये के पैकेज अथवा हर्जाने अगर उसे मिल जाता है, तो यह उसकी बड़ी जीत होगी। हालांकि वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रतिबंधों में कितनी और कैसी ढील दी जाती है। इजराइल का प्रश्न अभी भी सबसे बड़ी अनिश्चितता से भरा हुआ है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू इस समझौते के प्रति पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखते। यदि भविष्य में चुनावे फायदे के मद्देनजर लेबनान, गाजा या ईरान से जुड़े मोर्चों पर नेतन्याहू तनाव पैदा करते हैं, तो वर्तमान शांति प्रक्रिया फिर से संकट में पड़ सकती है। इसलिए इस समझौते के बावजूद किसी भी पक्ष द्वारा आगे सैन्य कार्रवाई न करने की पूर्ण गारंटी आज कोई नहीं दे सकता।
भारत के लिए यह समझौता अत्यंत सकारात्मक संकेत लेकर आया है। तेल कीमतों में नरमी से आयात बिल कम हो सकता है, रुपये को समर्थन मिल सकता है और महंगाई पर दबाव घट सकता है। खाड़ी देशों में कार्यरत लाखों भारतीयों के रोजगार और सुरक्षा की स्थिति भी बेहतर हो सकती है। साथ ही चाबहार बंदरगाह और भारत-ईरान संपर्क परियोजनाओं को नई गति मिलने की संभावना बढ़ेगी। कुल मिलाकर यह समझौता हमें याद दिलाता है कि युद्ध की सबसे बड़ी कीमत आम लोग चुकाते हैं और शांति का सबसे बड़ा लाभ भी उन्हें ही मिलता है, लेकिन पश्चिम एशिया के इतिहास को देखते हुए यह भी सच है कि शांति केवल दस्तावेजों से नहीं टिकती; उसे भरोसे, संयम और सतत संवाद से जीवित रखना पड़ता है। इसलिए इस समझौते का स्वागत अवश्य होना चाहिए, पर उसकी स्थिरता की असली परीक्षा अगले कुछ महीनों में होगी।
